H-1B वीजा धारकों की बढ़ सकती हैं मुश्किलें, ग्रीन कार्ड का रास्ता बंद करने का प्रस्ताव अमेरिकी संसद में पेश
अमेरिका में H-1B वीजा प्रणाली में बड़े बदलाव का प्रस्ताव पेश किया गया है। नए विधेयक में ग्रीन कार्ड का रास्ता कठिन बनाने, वीजा अवधि घटाने और OPT कार्यक्रम समाप्त करने की बात कही गई है। इसका सबसे अधिक असर भारतीय पेशेवरों और छात्रों पर पड़ सकता है।;
वॉशिंगटन। अमेरिका में एच-1बी वीजा को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है। अमेरिकी कांग्रेस में रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय द्वारा पेश किए गए एक नए विधेयक ने भारतीय पेशेवरों और छात्रों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। प्रस्तावित कानून में एच-1बी वीजा प्रणाली में व्यापक बदलाव करने की मांग की गई है, जिसमें ग्रीन कार्ड तक पहुंच को सीमित करना, वीजा अवधि कम करना और विदेशी छात्रों के लिए रोजगार संबंधी सुविधाओं में कटौती जैसे प्रावधान शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि यह विधेयक कानून का रूप लेता है, तो अमेरिका में काम करने और स्थायी निवास पाने का सपना देख रहे हजारों भारतीयों के लिए राह पहले से अधिक कठिन हो सकती है।
क्या है नया विधेयक?
रिपब्लिकन सांसद चिप रॉय ने “अमेरिकन व्हाइट-कॉलर वर्कर जॉब्स एक्ट” नामक विधेयक अमेरिकी कांग्रेस में पेश किया है। उनका तर्क है कि पिछले कई दशकों से एच-1बी वीजा कार्यक्रम का दुरुपयोग हो रहा है और इससे अमेरिकी नागरिकों के रोजगार के अवसर प्रभावित हुए हैं।
विधेयक में दावा किया गया है कि कई कंपनियां कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त कर रही हैं, जिससे अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों को प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है। प्रस्ताव के अनुसार, वर्तमान लॉटरी आधारित चयन प्रणाली को समाप्त कर योग्यता और अधिक वेतन के आधार पर वीजा आवंटन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
ग्रीन कार्ड का रास्ता हो सकता है मुश्किल
इस प्रस्ताव का सबसे चर्चित पहलू एच-1बी वीजा धारकों के लिए ग्रीन कार्ड प्राप्त करने की प्रक्रिया से जुड़ा है। वर्तमान व्यवस्था में एच-1बी वीजा पर काम कर रहे लोग स्थायी निवास यानी ग्रीन कार्ड के लिए आवेदन कर सकते हैं।
हालांकि नए विधेयक में “ड्यूल इंटेंट” नीति समाप्त करने का सुझाव दिया गया है। इसका मतलब यह होगा कि वीजा धारकों को यह साबित करना पड़ेगा कि उनका उद्देश्य अमेरिका में स्थायी रूप से बसना नहीं है। यदि यह प्रावधान लागू होता है तो एच-1बी वीजा से ग्रीन कार्ड तक पहुंचने का रास्ता काफी जटिल हो सकता है।
विदेशी छात्रों के लिए भी बढ़ सकती है चुनौती
विधेयक में ऑप्शनल प्रैक्टिकल ट्रेनिंग (OPT) कार्यक्रम को समाप्त करने का भी प्रस्ताव रखा गया है। यह कार्यक्रम विदेशी छात्रों को पढ़ाई पूरी करने के बाद अमेरिका में सीमित अवधि तक काम करने की अनुमति देता है।
हर साल हजारों भारतीय छात्र अमेरिकी विश्वविद्यालयों से स्नातक और परास्नातक डिग्री हासिल करने के बाद इसी कार्यक्रम के तहत कार्य अनुभव प्राप्त करते हैं। ऐसे में OPT समाप्त होने से भारतीय छात्रों के करियर विकल्पों पर सीधा असर पड़ सकता है।
वीजा अवधि घटाने और फीस बढ़ाने का प्रस्ताव
प्रस्तावित कानून के तहत एच-1बी वीजा की अधिकतम अवधि छह वर्ष से घटाकर दो वर्ष करने की बात कही गई है। इसके अलावा वीजा चयन प्रक्रिया में उन कंपनियों को प्राथमिकता देने का सुझाव दिया गया है जो अधिक वेतन देने को तैयार हों।
अमेरिका में कानूनी आव्रजन कार्यक्रमों को लेकर पहले से ही सख्त रुख अपनाया जा रहा है। हाल के वर्षों में वीजा आवेदन शुल्क बढ़ाने और जांच प्रक्रिया को कड़ा करने के कई कदम उठाए गए हैं। नए विधेयक को कुछ अमेरिकी तकनीकी कर्मचारियों और आव्रजन सुधार समर्थक संगठनों का समर्थन भी मिल रहा है।
भारतीय पेशेवरों पर क्या होगा असर?
भारत उन देशों में शामिल है जहां से सबसे अधिक संख्या में पेशेवर एच-1बी वीजा के माध्यम से अमेरिका जाते हैं। आईटी, इंजीनियरिंग, डेटा साइंस, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और तकनीकी क्षेत्रों में कार्यरत बड़ी संख्या में भारतीय इस वीजा प्रणाली पर निर्भर हैं।
यदि यह प्रस्ताव आगे बढ़ता है तो भारतीय पेशेवरों और छात्रों के लिए अमेरिका में नौकरी हासिल करना, लंबे समय तक काम करना और स्थायी निवास प्राप्त करना पहले की तुलना में अधिक चुनौतीपूर्ण हो सकता है। हालांकि फिलहाल यह केवल एक प्रस्तावित विधेयक है और इसे कानून बनने से पहले कांग्रेस की विभिन्न समितियों तथा दोनों सदनों की मंजूरी सहित कई संवैधानिक प्रक्रियाओं से गुजरना होगा।
फिर भी इस प्रस्ताव ने भारतीय छात्र समुदाय, तकनीकी पेशेवरों और वैश्विक रोजगार बाजार से जुड़े लोगों के बीच नई बहस और चिंता को जन्म दे दिया है।