'मेरा रंग बदल दिया गया था...', समीरा रेड्डी ने फिल्‍म इंडस्ट्री के ब्यूटी स्टैंडर्ड्स पर उठाए सवाल

समीरा रेड्डी ने एक इंटरव्यू में बताया कि साल 2002 में रिलीज हुई उनकी डेब्यू फिल्म 'मैंने दिल तुझको दिया' के दौरान उनके चेहरे का रंग दो से तीन शेड तक हल्का कर दिया गया था। अभिनेत्री के मुताबिक, मेकअप के जरिए उन्हें अधिक गोरा दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि उनका चेहरा अस्वाभाविक और धूसर (ग्रे) दिखाई देने लगा।;

Update: 2026-07-19 09:19 GMT

मुंबई: हिंदी सिनेमा में आज जहां हर उम्र, रंग और व्यक्तित्व की अभिनेत्रियों को केंद्र में रखकर फिल्में बनाई जा रही हैं, वहीं एक समय ऐसा भी था जब हीरोइनों के लिए सुंदरता के कुछ तयशुदा मानक माने जाते थे। अभिनेत्री समीरा रेड्डी ने हाल ही में इन्हीं पुराने ब्यूटी स्टैंडर्ड्स पर खुलकर बात करते हुए बताया कि करियर की शुरुआत में उन्हें भी रंगभेद जैसी मानसिकता का सामना करना पड़ा था। समीरा ने कहा कि उनकी पहली फिल्म के दौरान उनके प्राकृतिक रंग को बदलकर स्क्रीन पर अलग तरीके से दिखाया गया, जिससे उन्हें लंबे समय तक असहज महसूस करना पड़ा।

पहली फिल्म में बदल दिया गया था त्वचा का रंग

समीरा रेड्डी ने एक इंटरव्यू में बताया कि साल 2002 में रिलीज हुई उनकी डेब्यू फिल्म 'मैंने दिल तुझको दिया' के दौरान उनके चेहरे का रंग दो से तीन शेड तक हल्का कर दिया गया था। अभिनेत्री के मुताबिक, मेकअप के जरिए उन्हें अधिक गोरा दिखाने की कोशिश की गई, लेकिन इसका परिणाम यह हुआ कि उनका चेहरा अस्वाभाविक और धूसर (ग्रे) दिखाई देने लगा। उन्होंने कहा कि चेहरे और शरीर के रंग में अंतर छिपाने के लिए पूरे शरीर पर भारी मेकअप करना पड़ता था, जो उनके लिए शारीरिक और मानसिक दोनों स्तर पर चुनौतीपूर्ण अनुभव था।

रंगभेद की मानसिकता पर जताई नाराजगी

समीरा रेड्डी ने समाज में व्याप्त रंगभेद और महिलाओं को लेकर बनाई गई सुंदरता की धारणाओं पर भी सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि केवल फिल्म इंडस्ट्री ही नहीं, बल्कि आम परिवारों में भी कई लड़कियों को उनके रंग और शरीर को लेकर ताने सुनने पड़ते हैं। अभिनेत्री ने कहा कि अक्सर माता-पिता या ससुराल पक्ष तक यह कह देते हैं कि लड़की सांवली है या मोटी है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर सुंदरता की यह परिभाषा किसने तय की है और क्यों महिलाओं को ऐसे मानकों के आधार पर आंका जाता है।

खुद को स्वीकारने में लगे दो दशक

समीरा रेड्डी ने स्वीकार किया कि अपने वास्तविक व्यक्तित्व को अपनाने और असुरक्षाओं से बाहर निकलने में उन्हें करीब 20 साल का समय लगा। उन्होंने कहा कि लंबे समय तक वह भी समाज और इंडस्ट्री द्वारा बनाए गए सौंदर्य मानकों के दबाव में रहीं, लेकिन समय के साथ उन्होंने स्वयं को उसी रूप में स्वीकार करना सीख लिया। उनके अनुसार, आत्मविश्वास और आत्मस्वीकृति किसी भी बाहरी सुंदरता से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है और यही संदेश वह आज की पीढ़ी को देना चाहती हैं।

बदल रहा है हिंदी सिनेमा का नजरिया

बीते कुछ वर्षों में हिंदी फिल्म उद्योग में सुंदरता को लेकर सोच में उल्लेखनीय बदलाव देखने को मिला है। अब फिल्मों में केवल पारंपरिक ग्लैमर ही नहीं, बल्कि प्रतिभा, अभिनय क्षमता और किरदार की जरूरत को अधिक महत्व दिया जा रहा है। महिला प्रधान फिल्मों और विविध विषयों पर बनने वाली कहानियों ने अभिनेत्रियों के लिए नए अवसर पैदा किए हैं। ऐसे माहौल में समीरा रेड्डी का यह बयान उन पुराने दौर की याद दिलाता है, जब कलाकारों को स्क्रीन पर फिट बैठाने के लिए उनके प्राकृतिक व्यक्तित्व में बदलाव किए जाते थे।

14 साल बाद अभिनय में वापसी

समीरा रेड्डी ने लंबे अंतराल के बाद हाल ही में फिल्म 'आखिरी सवाल' के जरिए अभिनय की दुनिया में वापसी की है। करीब 14 वर्षों तक फिल्मों से दूर रहने के बाद उन्होंने फिर से कैमरे का रुख किया। इस दौरान वह सोशल मीडिया पर भी महिलाओं के आत्मविश्वास, मातृत्व, मानसिक स्वास्थ्य और बॉडी पॉजिटिविटी जैसे मुद्दों पर खुलकर अपनी बात रखती रही हैं। उनका मानना है कि आज की पीढ़ी को बाहरी सुंदरता की बजाय आत्मसम्मान और आत्मविश्वास को प्राथमिकता देनी चाहिए। उनका यह अनुभव न केवल फिल्म उद्योग की बदलती तस्वीर को सामने लाता है, बल्कि समाज में मौजूद रंगभेद और बॉडी शेमिंग जैसी मानसिकताओं पर भी गंभीर सवाल खड़े करता है।

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