कॉकरोच अब किस दिशा में बढ़ेंगे

जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन खत्म हो चुका है और धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया है;

By :  Deshbandhu
Update: 2026-08-06 22:06 GMT

जंतर-मंतर पर पेपर लीक के खिलाफ आंदोलन खत्म हो चुका है और धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा भी हो गया है। इस बीच प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की ज्यादती को लेकर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दाखिल की गई हैं, जिन पर सुनवाई चल रही है। इस तरह देखा जाए तो कॉकरोच जनता पार्टी ने मोदी सरकार के नुमाइंदों के साथ मिलकर जो समझौता किया था और महीने भर से ऊपर चला आंदोलन खत्म हुआ था, तो अब कॉकरोच जनता पार्टी किस दिशा में आगे बढ़ेगी। क्या वह किसी राजनैतिक दल में तब्दील होगी, या फिर शिक्षा व्यवस्था के जो अनसुलझे सवाल हैं, उन्हें उठाएगी, या उसकी भूमिका बस यहीं तक सीमित थी, ऐसे कई सवालों पर जवाब मिलने अब शुरु हो गए हैं।

बुधवार और गुरुवार दो दिनों तक कॉकरोच जनता पार्टी की बैठक चली और अब अभिजीत दिपके ने गुरुवार को अपने अगले कदम के बारे में बताया है। दिपके के मुताबिक सीजेपी अब देश भर में एक नयी मुहिम छेड़ रही है, जिसका नाम होगा 'क्या बोलती पब्लिक'। इस मुहिम की घोषणा करते हुए दिपके ने कहा कि इसका मुख्य उद्देश्य आम लोगों की समस्याओं को समझना और उनके लिए काम करना होगा। बकौल, दिपके इस अभियान का सबसे पहला ध्यान शिक्षा क्षेत्र पर होगा, धीरे-धीरे इसे अन्य मुद्दों पर भी केंद्रित किया जाएगा। उन्होंने कहा कि शिक्षा पर सबसे पहले ध्यान इसलिए दिया गया है क्योंकि स्कूल, कॉलेज और कोचिंग की बढ़ती फीस की वजह से कई परिवार अपने बच्चों को बेहतर शिक्षा उपलब्ध नहीं करवा पाते। उन्होंने कहा, देश की शिक्षा व्यवस्था में सुधार हमारा पहला मुद्दा होगा। इस पर हमें काम करना है। हमारा मानना है कि देश में शिक्षा महंगी हो गई है। पहली कक्षा के लिए सालाना फीस 1 लाख रुपए से लेकर 2 लाख रुपए के बीच है। इसके अलावा कई जगह डोनेशन भी चलता है। दिपके ने सवाल उठाया कि देश में लोगों की आय इतनी कम है। आखिर वह कैसे अपने बच्चों को इतनी फीस देकर पढ़ा पाएंगे? कॉलेज और कोचिंगों की महंगी फीस कई परिवारों को कर्ज के जाल में फंसा रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि कॉकरोच पार्टी छात्रों के और तमाम परिवारों के इस आर्थिक बोझ को कम करना चाहती है। अभिजीत दिपके ने भीम राव अंबेडकर का जिक्र करते हुए कहा कि शिक्षा पर सभी का अधिकार है। शिक्षा को सभी के लिए उपलब्ध होना चाहिए। लेकिन आज के समय में शिक्षा केवल एक मुनाफे का धंधा बन चुकी है।

अभिजीत दिपके की ये बातें भारतीय राजनीति के लिए देजा वू पल समान लग रही हैं। फ्रेंच भाषा से लिए गए इस शब्द का अर्थ है पहले से देखा या महसूस किया हुआ। ज्यादा नहीं बस डेढ़ दशक पहले 26 नवंबर 2012 को आम आदमी पार्टी बनी थी। अरविंद केजरीवाल की बनाई यह पार्टी इंडिया अगेंस्ट करप्शन नाम के अभियान से ही निकली थी। आम आदमी पार्टी ने भी जनता पर पकड़ बनाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य, बिजली, पानी जैसे बुनियादी मुद्दों पर ही जोर दिया। और इसमें कोई संदेह नहीं कि जब दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार बनी तो चाहे सरकारी स्कूल हों या मोहल्ला क्लिनिक की अवधारणा इनसे लाखों लोगों की जिंदगी में सहूलियत बढ़ी। दिल्ली के सरकारी स्कूलों में बहुत हद तक आप सरकार ने सुधार किया था। फरवरी 2020 में जब ट्रंप भारत के दौरे पर थे, तो अमेरिका की प्रथम महिला मेलानिया ट्रंप ने एक सरकारी स्कूल का दौरा भी किया था।

आम आदमी पार्टी ने अपने गठन के वक्त यही दावा किया था कि वह राजनीति में बदलाव करेगी और मौजूदा चलन से हटकर काम करके दिखाएगी। लेकिन राजनैतिक मजबूरी कहें या महत्वाकांक्षा, आम आदमी पार्टी भी अब उसी रवैये पर चलती है जैसे बाकी राजनैतिक दल। भाजपा के विरोध में आम आदमी पार्टी ने इंडिया गठबंधन का हिस्सा बनना मंजूर किया और उसी कांग्रेस से हाथ मिलाया, जिसकी मुखालफत वो करती रही है। लेकिन अब उसे इस गठबंधन में सहजता महसूस नहीं हुई तो वह अलग भी हो गई है। भविष्य में आम आदमी पार्टी क्या अकेले ही रहेगी या फिर किसी गठबंधन का हिस्सा बनेगी यह कहना कठिन है।

ठीक ऐसे ही अब कॉकरोच जनता पार्टी का हाल भी दिख रहा है। 'क्या बोलती पब्लिक' में जिस पब्लिक पर जोर दिया जा रहा है, वह आम आदमी ही है। बेशक अभिजीत दिपके ने अभी कहा है कि वह राजनीतिक पार्टी नहीं बनेंगे। बल्कि स्थानीय स्तर पर सुधार करने के लिए एक 'प्रेशर ग्रुप' यानी दबाव बनाने वाले समूह की तरह काम करेंगे। और जनता के बीच जाकर जानेंगे कि लोग देश के मौजूदा हालात के बारे में क्या सोचते हैं और उन्हें किन मुद्दों का सामना करना पड़ रहा है। लेकिन बिना राजनैतिक आधार के क्या वे केवल प्रेशर ग्रुप बनाकर उस लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे, जिसके लिए कॉकरोच जनता पार्टी बनी है। बेशक मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की टिप्पणी से आहत होकर उसके लिए दिए गए जवाबी तंज में कॉकरोच जनता पार्टी बनी है। लेकिन जंतर-मंतर पर पेपर लीक के विरोध में आंदोलन खड़ा करने में उसकी ही भूमिका रही है। बाद में वामदल के छात्र संगठन इस आंदोलन में शामिल हुए तो इसमें नए आयाम जुड़े और फिर लगभग विपक्ष के हर दल के नेता ने जंतर-मंतर पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। यह आंदोलन सीजेपी तक शामिल नहीं रहा, लेकिन यह भी सच है कि आंदोलनकारियों की तरफ से सरकार से समझौता सीजेपी ने ही किया। ऐसे हालात में भले ही अभी सीजेपी राजनैतिक दल में तब्दील नहीं होगी। लेकिन वो उन्हीं मुद्दों को उठाने की बात कर रही है, जिनके समाधान लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा बनकर ही तलाशा जा सकता है। अब सीजेपी क्या विपक्षी मोर्चे का अघोषित हिस्सा बनकर काम करेगी, क्या शिक्षा, बेरोजगारी, पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट जैसे मुद्दों के अलावा वह अपनी विचारधारा स्पष्टता के साथ जनता के सामने रख पाएगी, या वाकई सामाजिक आंदोलन की तरह ही काम करेगी और पूरी तरह राजनीति से अलग रहेगी, इन सारे सवालों के जवाब निकट भविष्य में मिल जाएंगे, ऐसी उम्मीद है।

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