विविधता की कृषि संस्कृति का जवाब नहीं
छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा विविधता वाला राज्य है। यहां कृषि की कई पद्धतियां हैं, जिसे किसानों ने सैकड़ों सालों से विकसित किया है
- बाबा मायाराम
आज के जलवायु बदलाव के दौर में देसी बीजों का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक तो इनमें तुलनात्मक रूप से संकर बीजों की अपेक्षा प्रतिकूल मौसम को सहने की क्षमता होती है, और दूसरे इसके साथ लागत भी कम आती है। संकर बीजों के साथ रासायनिक खाद से लेकर कीटनाशकों का खर्च जुड़ जाता है, जबकि देसी बीजों की खेती आत्मनिर्भरता की ओर ले जाती है। क्योंकि इसमें बीज, गोबर खाद और श्रम सभी किसान का होता है, इसलिए लागत बहुत कम हो जाती है।
छत्तीसगढ़ सबसे ज्यादा विविधता वाला राज्य है। यहां कृषि की कई पद्धतियां हैं, जिसे किसानों ने सैकड़ों सालों से विकसित किया है। कृषि संस्कृति से जुड़े कई तीज-त्यौहार भी हैं। सांस्कृतिक विविधता भी छत्तीसगढ़ की एक प्रमुख पहचान है। आज इस कॉलम में खेती से जुड़ी इन्हीं विविधताओं पर चर्चा करना उचित रहेगा, जिससे खेती को समग्रता से जाना समझा जा सकें।
छत्तीसगढ़ सांस्कृतिक रूप से समृद्ध प्रदेश हैं, यहां इसके कई रूप रंग हैं। अक्ति त्यौहार पर गांवों में किसान चना, तिवरा, मसूर, उड़द और महुआ को भूनकर लाई बनाते हैं, ठाकुरदेव की पूजा करते हैं। इसी मौके पर धान के दानों को छिड़ककर नागर के लोहे से जोता जाता है। किसान घरों से धान बीज बांस की टोकरियों में लेकर खेत जाते हैं और सांकेतिक रूप से धान को बोते हैं। यह पारंपरिक रीति है, सालों से कर रहे हैं। यह बीजों के आदान- प्रदान, बीजों की विविधता और संरक्षण का किसानों का तरीका है। देसी बीजों के साथ पारंपरिक ज्ञान व किसानों की आत्मनिर्भरता जुड़ी हुई है, जिसे फिर से पुनर्जीवित किया जा रहा है।
देसी बीजों के संरक्षण व संवर्धन के इस काम में प्रेरक संस्था ने अग्रणी भूमिका निभाई है। संस्था ने धान के देसी किस्मों का संग्रह किया है। संस्था के भिलाई स्थित वसुंधरा केन्द्र में 4 सौ देसी धान की किस्मों का संग्रह है। इन किस्मों में जवाफूल, विष्णुभोग, बादशाह भोग, सोनामासुरी, पोरासटका, साठिया, लायचा, डाबर, दूबराज, मासुरी इत्यादि हैं। इनमें कई किस्मों में औषधि गुण भी हैं। सुगंधित किस्में भी हैं।
छत्तीसगढ़ के कई जिलों में जैविक खेती का सिलसिला शुरू हुआ है। जिसमें धमतरी, कोंडागांव, बस्तर, कबीरधाम, राजनांदगांव, जांजगीर-चापा, बिलासपुर और कोरबा शामिल है। गरियाबंद विकासखंड आदिवासी बहुल है। यहां के बाशिन्दे कमार, भुंजिया और गोंड आदिवासी हैं। मुझे कुछ समय पहले धवलपुर व उसके आसपास कई गांवों में प्रेरक संस्था के रोहिदास यादव ले गए थे।
प्रेरक संस्था के निदेशक रामगुलाम सिन्हा बतलाते हैं कि छत्तीसगढ़ में गजब की जैव विविधता पाई जाती है। यहां बिना सिंचाई वाली फसलें, दलहन, तिलहन, फल, फूल, कंद-मूल, मशरूम और अन्य संग्रहीत अनाज इत्यादि हैं। छत्तीसगढ़ में धान की हजारों प्रजातियां हैं, और किसानों की कई देसी खेती पद्धतियां हैं, जो किसानों ने कई बरसों में विकसित की हैं।
वे बताते हैं कि लेकिन अब सिर्फ एकल खेती की ओर मुड़ती जा रही है, जो ज्यादा पानी-बिजली वाली, ज्यादा ऊर्जा खपत वाली, ज्यादा रासायनिक व कीटनाशक वाली है। यानी ज्यादा लागत वाली है और पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने वाली है। इसलिए हमने जंगल क्षेत्र में धान की खेती के साथ, मिश्रित खेती, पशुपालन, सब्जी-बाड़ी, जंगलों की विविधता से टिकाऊ आजीविका कैसे बने, इसका प्रयास किया है।
प्रेरक संस्था के कार्यकर्ता रोहिदास यादव ने बतलाया कि हमने खेती से टिकाऊ आजीविका में सुधार के लिए प्राथमिकता दी। इसके लिए किसानों को देसी बीजों के संरक्षण व संवर्धन के लिए इस इलाके में 3 देसी बीज बैंक बनाए हैं। इन बीज केन्द्रों में धान की कई किस्में व अन्य अनाजों व सब्जियों के बीज संग्रहीत किए गए हैं। यहां धान की देसी किस्मों में कुसुमकली, कालाजीरा, श्याम सुंदर, सांबा मासुरी, बासमती, पटेल सुपर, सफरी, साठिया, भाटा सफरी, लाल धान, बासाभोग इत्यादि बीज हैं।
वे आगे बताते हैं कि इन बीज बैंकों से किसानों को बीज दिए जाते हैं। पौधों को कीट प्रकोप से बचाने के लिए जैव कीटनाशक बनाने का प्रशिक्षण दिया गया है। इसे गोबर, गोमूत्र, गुड़, बेसन और पानी मिलाकर जीवामृत बनाया जाता है, जो जैव खाद के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। खेत में इसका छिड़काव किया जाता है। स्थानीय तौर पर उपलब्ध विभिन्न पत्तियों नीम, करंज, सीताफल, भुईनीम, बेसरम आदि के घोल से तैयार कर लेते हैं। पंचपर्णी, सप्तपर्णी जैव कीटनाशक बनाते हैं, जो. कीटों से रक्षा के लिए तम्बाकू काडा भी काफी कारगर है। इसी प्रकार, देसी गोबर खाद को अच्छी तरह बनाने की विधि बताई गई है। इसमें कोई बाहरी निवेश की जरूरत नहीं होती, इससे खेती की लागत भी कम हो जाती है।
रोहिदास यादव ने बताया कि किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए मेडागास्कर विधि अपनाने पर जोर दिया गया। इस पद्धति में कम पानी लगता है और उत्पादन दोगुना तक लिया जा सकता है। इसमें समान दूरी पर पौधे लगाए जाते हैं और खेत में ज्यादा पानी होता है तो उसकी निकासी की जाती है। पानी में पौधा डूबे रहने ने उसकी बढ़वार ठीक से नहीं होती है और पौधे की जड़ें सड़ जाती हैं। इस पद्धति से ज्यादा उत्पादन लिया जा सकता है।
इसी प्रकार, कुछ समय पूर्व मैंने महासमुंद के गांव कुहरी में श्रीजन सामुदायिक बीज बैंक देखा था। यहां मुझे संस्था की हेमलता राजपूत लेकर गई थीं। यहां देसी धान की 19 प्रजातियां, दलहन की 13, उड़द की 4, मूंग की 4, कुलथी की 2 और झुरगा की 2 प्रजातियां हैं। इसके अलावा, कई तरह हरी भाजियों के बीज हैं। लाल भाजी, चेंच भाजी, खेड़ा भाजी, पटवा भाजी, अमाड़ी भाजी, पालक भाजी, मखना भाजी, कुसुम भाजी, चौलाई भाजी इत्यादि। बीज बैंक की शुरूआत वर्ष 2016 से हुई है। इसकी संचालन समिति में 10 सदस्य हैं। यहां से किसानों को बीज दिया जाता है, जिसे उन्हें फसल आने पर वापस करना होता है।
कुहरी गांव की एक महिला किसान कहती हैं कि देसी बीजों में रोग ज्यादा नहीं लगता है, खाने में भी स्वादिष्ट होता है। अगर फसलों में कीट प्रकोप लगता भी है तो जैव कीटनाशक बनाकर छिड़कते हैं। जिसे वे स्थानीय पौधों की पत्तियों से तैयार कर लेते हैं। कर्रा, आक, नीम, कड़वा रोहना, बिरहा आदि की पत्तियों से जीवामृत बनाया जाता है। इसके लिए बोड़रा, बरबसपुर, खैरा, कोमा आदि गांवों में जैव कीटनाशक व जैव खाद बनाने का प्रशिक्षण शिविर लगाया गया। कुहरी के साथ बांसकुडहा, बिरगिरा, बोड़रा, घोघीबाहरा, सेनकपाट, कुसेराडीह, केशलडीह, वनसिवनी, कर्राडीह गांव में भी जैविक खेती होती है।
इस प्रकार की पहल, छत्तीसगढ़ के अन्य इलाकों में चल रही है। आज के जलवायु बदलाव के दौर में देसी बीजों का महत्व और भी बढ़ जाता है। एक तो इनमें तुलनात्मक रूप से संकर बीजों की अपेक्षा प्रतिकूल मौसम को सहने की क्षमता होती है, और दूसरे इसके साथ लागत भी कम आती है। संकर बीजों के साथ रासायनिक खाद से लेकर कीटनाशकों का खर्च जुड़ जाता है, जबकि देसी बीजों की खेती आत्मनिर्भरता की ओर ले जाती है। क्योंकि इसमें बीज, गोबर खाद और श्रम सभी किसान का होता है, इसलिए लागत बहुत कम हो जाती है।
कुल मिलाकर, पारंपरिक देसी बीजों को किसानों ने सैकड़ों सालों में विकसित किया है। यह मानव समाज व किसानों की धरोहर हैं, जिनका संरक्षण व संवर्धन जरूरी है। छत्तीसगढ़ में खेतों में देसी धान की हजारों प्रजातियां हैं। यहां खेत में धान और मेड़ों पर अरहर, तिली बोई जाती है। उतेरा में धान की फसल कटने के पूर्व ही तिवड़ा, उड़द के बीज छिड़क दिए जाते हैं, जिससे बारिश की नमी में ही यह फसलें हो जाती हैं। यह बारिश की नमी का बहुत ही अच्छा इस्तेमाल है, साथ ही फलीवाली फसलें बोने से मिट्टी की उर्वरता भी बढ़ती हैं। धान यानी भात के साथ दाल की फसल भी हो जाती है। यही यहां की खान-पान की संस्कृति है।अनाज और दलहनें हैं।
इसी प्रकार, जंगलों में वन खाद्य, कंद मूल हैं। जड़ी बूटी और औषधियां हैं। इनके साथ जुड़ा हुआ परंपरागत ज्ञान है और इसके साथ जीवामृत व जैविक खाद के आधुनिक ज्ञान को जोड़कर बदलाव लाया जा सकता है। खाद्य सुरक्षा के साथ लोगों की आजीविका की सुरक्षा की जा सकती है। देसी बीजों का संरक्षण व संवर्धन किया जा सकता है। जैव विविधता के साथ पर्यावरण की सुरक्षा की जा सकती है। यह छत्तीसगढ़ की खेती किसानी की संस्कृति में भी शामिल है, जिससे काफी कुछ सीखा जा सकता है। लेकिन क्या हम इस दिशा में आगे बढ़ना चाहेंगे?