मदरसों पर विवादित टिप्पणी
मीडिया का सरकार की चाटुकारिता में लगा होना, मणिपुर में अशांति, बेरोजगारी, महंगाई और हिंदू-मुस्लिम के बीच बैर-भाव बढ़ाकर सत्ता पर टिके रहने की चालाकी, हर मुद्दे पर भाजपा और मोदी सरकार की आलोचना की गई।;
जंतर-मंतर पर हुए छात्र आंदोलन में केवल पेपर लीक का विरोध और शिक्षा-परीक्षा प्रणाली में सुधारों की आवाज ही नहीं उठी, बल्कि इनके साथ-साथ देश में जबरन कायम की गई अन्य समस्याओं पर भी नाराजगी देखने मिली। मीडिया का सरकार की चाटुकारिता में लगा होना, मणिपुर में अशांति, बेरोजगारी, महंगाई और हिंदू-मुस्लिम के बीच बैर-भाव बढ़ाकर सत्ता पर टिके रहने की चालाकी, हर मुद्दे पर भाजपा और मोदी सरकार की आलोचना की गई। इस आंदोलन ने बता दिया कि नयी पीढ़ी सांप्रदायिक उन्माद की शिकार नहीं है। वह भाजपा की इस रणनीति में पिछली पीढ़ी की तरह फंसी हुई नहीं है। लेकिन भाजपा जंतर-मंतर से निकले सबक को समझ ही नहीं रही है। उसे चुनाव जीतने और सत्ता पर बने रहने के लिए ले-देकर एक ही मुद्दा मिलता है कि किसी भी तरह अल्पसंख्यक विरोधी खासकर मुसलमानों के खिलाफ माहौल बनाया जाए, ताकि हिंदू वोट उसके खाते में आए।
अभी उत्तरप्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य का एक बयान आया है कि 'मदरसा चाहे बांग्लादेश का हो, पाकिस्तान का हो या भारत का, मदरसे अघोषित रूप से आतंकवाद पैदा करते हैं।Ó इस बयान को फौरन ही हिंदूवादी संगठनों का समर्थन भी मिल गया। कहा जा रहा है कि मौर्य विहिप कार्यकर्ता के तौर पर काम कर चुके हैं, इसलिए उन्हें जमीनी हकीकत पता है। ऐसे खोखले तर्कों पर सिर पीटने के अलावा और कुछ किया ही नहीं जा सकता। बांग्लादेश और पाकिस्तान की चिंता तो वहां की सरकारें करें, लेकिन अगर भारत के मदरसों में आतंकवादी तैयार होते हैं, तो फिर पिछले 12 सालों से मोदी सरकार इस बारे में कुछ कर क्यों नहीं पाई। केशव प्रसाद मौर्य को इसके आंकड़े भी दे देने चाहिए कि उप्र के मुख्यमंत्री होने के नाते आदित्यनाथ योगी ने ऐसे कितने मदरसों की शिनाख्त की है और कितने आतंकवादियों को वहां बनते हुए पकड़ा है। सबसे पहले तो मौर्य को नरेन्द्र मोदी और अमित शाह से पूछना चाहिए कि सीबीआई, आईबी और रॉ जैसी तमाम जांच एजेंसियां यह बात अब तक आधिकारिक रूप से क्यों नहीं कह सकीं। क्योंकि अगर आतंकवादी मदरसों में बनते हैं, तो इन एजेंसियों को इसकी जानकारी होगी ही।
जाहिर है केशव प्रसाद मौर्य ऐसा कुछ नहीं करेंगे, क्योंकि वे भी जानते हैं कि उनके बयान का मकसद केवल सांप्रदायिक तनाव फैलाना है ताकि चुनाव में फायदा मिल सके। जंतर-मंतर पर हुए आंदोलन के नतीजे देखने के बाद भी भाजपा में बैठे लोग यह समझ नहीं रहे हैं कि देश अब ऐसी सियासी चालबाजियों में नहीं आएगा। कम से कम नयी पीढ़ी के मतदाता तो मुसलमान को कोसने के लिए भाजपा को वोट नहीं देने वाले।
गौरतलब है कि उत्तरप्रदेश में अगले साल विधानसभा चुनाव होने हैं, जिसकी तैयारी में भाजपा लगी हुई है। उसे किसी भी कीमत पर अपनी सत्ता बचानी है। 2024 के लोकसभा चुनावों में तो भाजपा को यहां बड़ा झटका लगा था, क्योंकि यहां की कुल 80 सीटों में भाजपा के पास केवल 33 सीटें आईं। जबकि 37 सीटें समाजवादी पार्टी और छह सीटें कांग्रेस की यानी 43 सीटें इंडिया गठबंधन को मिलीं। भाजपा के लिए यह अप्रत्याशित था कि अयोध्या में राम मंदिर बनाने के बावजूद फैजाबाद सीट समाजवादी पार्टी के खाते में चली गई। वाराणसी सीट पर भी नरेन्द्र मोदी को कांग्रेस प्रत्याशी अजय राय से कड़ी टक्कर मिली थी और आखिरी चरणों की मतगणना में वे जीत पाए थे। यानी भाजपा के सामने डर बना हुआ था कि कहीं मोदी भी अपनी सीट न हार जाएं। लोकसभा और विधानसभा दोनों चुनावों के मुद्दे अलग होते हैं और जनता भी वोट उसी हिसाब से देती है। मगर अब जेन जी आंदोलन के बाद देश के राजनीतिक मि•ााज में तब्दीली आ चुकी है। इसलिए भाजपा का डर और बढ़ा हुआ है।
हैरानी इस बात की है कि इस डर का सही इलाज करने की जगह भाजपा उसे खुलकर दिखा रही है। वर्ना केशव प्रसाद मौर्य ऐसे बयान देने से पहले विचार जरूर करते। अभी विधानसभा के मानसून सत्र में सरकार मदरसा शिक्षा परिषद अधिनियम 2004 संशोधन विधेयक लाने जा रही है। इसके तहत मदरसों में उच्च शिक्षा वाले कामिल (स्नातक) और फाजिल (स्नातकोत्तर) पाठ्यक्रम बंद किए जाएंगे और पढ़ाई केवल 12वीं (आलिम) तक सीमित होगी। इस पर पहले ही विवाद चल रहा है और शायद ऐसे में मौके पर चौका मारने की फिराक में केशव प्रसाद मौर्य ने अवांछित बयान दे दिया। मौर्य ने मदरसों पर टिप्पणी करने से पहले यह नहीं सोचा कि राम मंदिर में चढ़ावा चोरी के कारण भाजपा और संघ दोनों की साख पर कितना बट्टा लग चुका है। मदरसों का हिसाब-किताब तो सरकार कर लेगी, लेकिन क्या मंदिर का सही हिसाब पेश कर पाएगी।
अभी संसद सत्र के दौरान रोजाना ही परिसर में चढ़ावा चोरी पर भाजपा को घेरा जा रहा है। कई बार यह प्रहसन किया गया कि विपक्षी सांसदों ने नकली दान पात्र में चढ़ावा दिया और फिर कोई एक उसे लेकर भाग गया। ऐसे ही प्रहसन को पूर्णिया से निर्दलीय सांसद पप्पू यादव ने साधु जैसा भेस धरकर किया तो इसके खिलाफ उन पर और राहुल गांधी पर एफआईआर दर्ज की गई, और इसके साथ ही पप्पू यादव पर उनके घर पर हो रही प्रेस कांफ्रेंस के दौरान हमला भी किया गया। हमलावर ने चप्पल फेंकी तो उसे पकड़ा गया और बताया जा रहा है कि उसके पास चाकू भी था। कमाल की बात है कि छात्रों पर डंडों बरसाने वाली दिल्ली पुलिस विपक्ष के सांसद की सुरक्षा में ऐसी नाकाम रही कि उसके घर पर असामाजिक तत्व घुस आए। बहरहाल, पप्पू यादव सुरक्षित हैं, लेकिन उन्होंने कहा है कि उन्हें मारने की धमकियां लगातार मिल रही हैं।
अब केशव प्रसाद मौर्य को यह भी पता लगा लेना चाहिए कि राम मंदिर का चढ़ावा चोरी करने वालों के खिलाफ जो आवाज उठाए और उस पर हमला हो, तो हमलावर को क्या कहा जाए। वे चाहें तो धर्मेन्द्र प्रधान से सीख ले सकते हैं जिन्होंने पेपर चोरों के खिलाफ आवाज उठाने वालों को दहशतगर्द यानी आतंकवादी कह दिया था। मौर्य रमेश बिधूड़ी से भी सीख सकते हैं जिन्होंने जंतर-मंतर पर आए आंदोलनकारियों को पंक्चर बनाने वालों की औलादें बताया है।