नई दिल्ली: चेक बाउंस से जुड़े बहुचर्चित मामले में अभिनेता राजपाल यादव को दिल्ली हाई कोर्ट से कोई राहत नहीं मिली। अदालत ने जेल अधीक्षक के समक्ष आत्मसमर्पण करने के अपने पूर्व आदेश को वापस लेने से साफ इनकार कर दिया। न्यायालय की कड़ी टिप्पणी के बाद राजपाल यादव ने बृहस्पतिवार देर शाम तिहाड़ जेल नंबर-7 में आत्मसमर्पण कर दिया।
कोर्ट ने कहा—कानून सबके लिए समान
मामले की सुनवाई न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा की पीठ ने की। अदालत ने स्पष्ट किया कि किसी व्यक्ति का फिल्म इंडस्ट्री से जुड़ा होना या उसका सामाजिक बैकग्राउंड कानून के पालन में विशेष छूट का आधार नहीं बन सकता। पीठ ने कहा कि अदालत से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वह किसी विशेष पृष्ठभूमि के व्यक्ति के लिए अलग व्यवस्था बनाए। कानून सबके लिए समान है और उसका पालन अनिवार्य है। सुनवाई के दौरान राजपाल यादव स्वयं अदालत में उपस्थित थे।
आदेश की अवहेलना पर जताई नाराजगी
अदालत ने चार फरवरी को जारी अपने आदेश का पालन न करने पर कड़ी आपत्ति जताई। पीठ ने कहा कि निर्धारित तिथि पर आत्मसमर्पण न करना कानून के प्रति सम्मान की कमी को दर्शाता है। कोर्ट ने टिप्पणी की कि यदि उसके आदेशों की बार-बार अनदेखी की जाएगी और उसके बाद भी राहत दे दी जाएगी, तो इससे गलत संदेश जाएगा कि न्यायालय के निर्देशों की अवहेलना के कोई गंभीर परिणाम नहीं होते। पीठ ने दो टूक कहा—“कानून पालन करने पर इनाम देता है, अपमान करने पर नहीं।”
बचाव पक्ष ने मांगी थी मोहलत
सुनवाई के दौरान राजपाल यादव की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत से दया की अपील की। उन्होंने अनुरोध किया कि पूर्व आदेश को वापस लिया जाए ताकि अभिनेता शिकायतकर्ता कंपनी को बकाया राशि चुकाने की व्यवस्था कर सकें। वकील ने अदालत को बताया कि राजपाल यादव चार फरवरी को शाम चार बजे आत्मसमर्पण के निर्देश का पालन इसलिए नहीं कर सके क्योंकि वे भुगतान के लिए धन जुटाने में व्यस्त थे और उसी दिन शाम पांच बजे दिल्ली पहुंचे। बचाव पक्ष ने यह भी कहा कि राजपाल यादव शिकायतकर्ता मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड को 25 लाख रुपये का डिमांड ड्राफ्ट देने के लिए तैयार हैं और शेष भुगतान के लिए निर्धारित शेड्यूल का पालन करेंगे। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को पर्याप्त आधार नहीं माना और राहत देने से इनकार कर दिया।
पहले भी दिया गया था स्पष्ट निर्देश
हाई कोर्ट ने दो फरवरी को राजपाल यादव को निर्देश दिया था कि वे चार फरवरी को जेल में आत्मसमर्पण करें। अदालत ने कहा था कि आदेशों की लगातार अवहेलना स्वीकार्य नहीं है। जब निर्धारित तिथि पर आत्मसमर्पण नहीं हुआ, तो अदालत ने इस पर सख्त रुख अपनाया। गुरुवार की सुनवाई में भी कोर्ट ने दोहराया कि न्यायिक आदेशों की अवहेलना को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला फिल्म निर्माण के लिए लिए गए पांच करोड़ रुपये के कथित ऋण और उसके बाद चेक बाउंस से जुड़ा है। आरोप है कि दिल्ली के लक्ष्मी नगर स्थित मुरली प्रोजेक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड ने राजपाल यादव को वर्ष 2010-11 के दौरान फिल्म ‘अता पता लापता’ बनाने के लिए पांच करोड़ रुपये उधार दिए थे। फिल्म वर्ष 2012 में रिलीज हुई थी, लेकिन शिकायतकर्ता कंपनी का आरोप है कि उधार की राशि वापस नहीं की गई। कंपनी द्वारा दिए गए सात चेक कथित रूप से बाउंस हो गए, जिसके बाद प्रीत विहार थाने में प्राथमिकी दर्ज कराई गई। मामले की सुनवाई के बाद कड़कड़डूमा कोर्ट ने राजपाल यादव को दोषी करार देते हुए सजा सुनाई थी। इसके खिलाफ अपील और अन्य कानूनी प्रक्रियाओं के दौरान यह मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा।
तिहाड़ जेल में आत्मसमर्पण
अदालत से कोई राहत नहीं मिलने के बाद राजपाल यादव ने बृहस्पतिवार देर शाम तिहाड़ जेल नंबर-7 में आत्मसमर्पण कर दिया। जेल प्रशासन ने आवश्यक औपचारिकताएं पूरी कीं। इस घटनाक्रम ने फिल्म इंडस्ट्री और कानूनी हलकों में चर्चा को जन्म दिया है। अदालत की सख्त टिप्पणी को न्यायिक आदेशों की गंभीरता और समानता के सिद्धांत की पुनर्पुष्टि के रूप में देखा जा रहा है।
न्यायालय का संदेश
हाई कोर्ट की टिप्पणी इस मामले का सबसे अहम पहलू रही। अदालत ने स्पष्ट संकेत दिया कि न्यायालय के आदेशों की अवहेलना किसी भी परिस्थिति में स्वीकार्य नहीं है, चाहे संबंधित व्यक्ति की सामाजिक स्थिति या पेशेवर पहचान कुछ भी हो। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि बार-बार आदेशों की अनदेखी करने के बाद नरमी दिखाना न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा के विपरीत होगा।