आकृति चौधरी को झटका, नोएडा DM मेधा रूपम को SC से राहत, सैलरी से 5 लाख काटने के HC के फैसले पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्देश पर फिलहाल रोक लगा दी, जिसमें नोएडा DM मेधा रूपम की सैलरी से 5 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की बात कही गई थी। सुनवाई के दौरान मेधा रूपम की ओर से पेश वकील ने हाई कोर्ट के आदेश पर आपत्ति जताई।;

Update: 2026-09-23 15:08 GMT

नई दिल्ली: नोएडा में मजदूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने नोएडा की जिलाधिकारी (DM) मेधा रूपम को अंतरिम राहत दी है। शीर्ष अदालत ने उनकी सैलरी से 5 लाख रुपये बतौर मुआवजा देने के इलाहाबाद हाई कोर्ट के आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है। इसी मामले में अदालत ने छात्रा आकृति चौधरी की राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत रद्द करने वाले हाई कोर्ट के फैसले के संबंधित हिस्सों पर भी अंतरिम रोक लगाई है।

सुप्रीम कोर्ट ने मामले में नोटिस जारी करते हुए संबंधित पक्षों से जवाब मांगा है। जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया गया है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्टूबर 2026 को होगी।

क्या है पूरा मामला?

मामला नोएडा में मजदूरों के वेतन बढ़ाने की मांग को लेकर हुए विरोध प्रदर्शन से जुड़ा है। आरोप है कि 13 अप्रैल को हुए प्रदर्शन के बाद हिंसा भड़की थी। इस मामले में छात्रा आकृति चौधरी को एनएसए के तहत हिरासत में लिया गया था। आकृति चौधरी ने अपनी हिरासत को चुनौती दी थी। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2 सितंबर 2026 को उनकी हिरासत को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने हिरासत को मंजूरी देने की प्रक्रिया और जिला मजिस्ट्रेट की भूमिका पर भी कड़ी टिप्पणियां की थीं। इसके बाद मामले से जुड़े पक्ष सुप्रीम कोर्ट पहुंचे, जहां बुधवार को अंतरिम राहत से जुड़े मुद्दे पर सुनवाई हुई।

मेधा रूपम की सैलरी से मुआवजे के आदेश पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस निर्देश पर फिलहाल रोक लगा दी, जिसमें नोएडा डीएम मेधा रूपम की सैलरी से 5 लाख रुपये मुआवजा दिए जाने की बात कही गई थी। सुनवाई के दौरान मेधा रूपम की ओर से पेश वकील ने हाई कोर्ट के आदेश पर आपत्ति जताई। उनके वकील का तर्क था कि हाई कोर्ट को किसी आदेश को रद्द करने का अधिकार है, लेकिन किसी विशेष सरकारी अधिकारी को अलग से निशाना बनाकर उसकी आलोचना नहीं की जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने इस स्तर पर हाई कोर्ट के फैसले के संबंधित हिस्सों के अमल पर अंतरिम रोक लगा दी है।

सिर्फ डीएम पर ही 5 लाख का जुर्माना क्यों?

जस्टिस सतीश चंद शर्मा और जस्टिस एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने कहा कि एनएसए को लेकर डीएम ने अकेले फैसला नहीं किया था। डीएम ने एसएचओ, डीसीपी की रिपोर्ट पर कार्रवाई की। मामला हाईकोर्ट जज की अगुवाई वाली एडवाइजरी कमेटी के पास भी पहुंचा था। ऐसे में क्या सिर्फ डीएम पर ही जुर्माना लगाया जा सकता है? उन्होंने कहा कि आकृति चौधरी ने हिंसा भड़काई थी या नहीं, क्या पहले से कोई इंटलीजेस रिपोर्ट थी, ये सब ट्रायल का विषय है। सुप्रीम कोर्ट ने मौखिक टिप्पणी कर कहा कि अगर एनएसए लगाने की प्रक्रिया कई स्तरों पर चली थी, तो डीएम को अलग करके कैसे जिम्मेदार ठहराया जा सकता है? हम उन्हें अलग-थलग कर पांच लाख रुपये का जुर्माना कैसे लगा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट में यूपी सरकार की दलील

यूपी सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगाने की मांग की.उन्होंने कहा कि डीएम ने पुलिस की रिपोर्ट पर काम किया, राज्यपाल ने भी इसे स्वीकृति दी और केंद्र सरकार ने भी मुहर लगाई. हाईकोर्ट के जज वाली एडवाइजरी कमेटी ने भी इस पर आदेश जारी किया लेकिन हाईकोर्ट ने सिर्फ युवा IAS अफसर पर कड़ी टिप्पणियां की और जुर्माना लगा दिया.

डीएम मेधा रूपम के वकील ने क्या कहा?

वहीं डीएम मेधा रूपम की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश हुए वरिष्ठ वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि यह पूरी तरह अवैध आदेश है.निर्णय लेने के मामले में एक पदानुक्रम है. पहले एसएचओ, एसीपी और फिर डीएम, इसके बाद हाईकोर्ट के जज की एडवायजरी कमेटी और राज्यपाल, फिर वहां से केंद्र सरकार के पास. लेकिन फटकार सिर्फ डीएम को ही लगाई गई. हाईकोर्ट ने डीएम के खिलाफ कई टिप्पणियां कीं और यहां तक कहा कि उनका आचरण उपहास के योग्य है.यह डीएम के खिलाफ गंभीर आलोचना है.जबकि आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत हैं कि उसने हिंसा भड़काई.

आकृति चौधरी की हिरासत पर क्या दलील दी गई?

आकृति चौधरी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील ने उनकी NSA के तहत हिरासत के आधार पर सवाल उठाया। उनकी ओर से अदालत में दलील दी गई कि जिस हिंसा की घटना का हवाला देकर कार्रवाई की गई, उससे पहले ही आकृति पुलिस हिरासत में थीं। इस आधार पर उनकी ओर से हिरासत की वैधता पर सवाल उठाया गया। हाई कोर्ट ने भी दो सितंबर के अपने फैसले में उनकी हिरासत को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने जारी किया नोटिस

शीर्ष अदालत ने मामले में संबंधित पक्षों को नोटिस जारी करने का निर्देश दिया है। आकृति चौधरी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता ने नोटिस स्वीकार कर लिया। अन्य प्रतिवादियों को भी नोटिस जारी किए गए हैं। अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने के लिए दो सप्ताह का समय दिया है। सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दोनों पक्षों के वरिष्ठ वकीलों की दलीलें सुनीं और इसके बाद हाई कोर्ट के आदेश के कुछ हिस्सों पर अंतरिम रोक लगाई।

7 अक्टूबर को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के 2 सितंबर 2026 के फैसले के पैराग्राफ 27 से 33 का विशेष रूप से उल्लेख किया। इन पैराग्राफ में अधिकारियों और मामले से जुड़े पहलुओं पर कड़ी टिप्पणियां की गई थीं। शीर्ष अदालत के निर्देश के अनुसार, इन पैराग्राफ के अमल पर लगी अंतरिम रोक अगली सुनवाई तक जारी रहेगी। अब मामले पर अगली सुनवाई 7 अक्टूबर को होगी। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की कार्रवाई अंतरिम स्तर पर है। मामले में अंतिम निर्णय आना बाकी है और संबंधित पक्षों के जवाब मिलने के बाद अदालत आगे की सुनवाई में इस पूरे विवाद के कानूनी पहलुओं पर विचार करेगी।

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