दिल्ली। दिल्ली विश्वविद़यालय के जानकी देवी मेमोरियल कॉलेज के समाजशास्त्र विभाग ने भारतीय ज्ञान प्रणाली अध्ययन केंद्र के सहयोग से “भारतीय ज्ञान प्रणाली: स्थानीय परंपराएं और वैश्विक लक्ष्य” विषय पर एक राष्ट्रीय सम्मेलन का आयोजन किया। यह सम्मेलन नई शिक्षा नीति (NEP) के उद्देश्यों के अनुरूप आयोजित किया गया, जिसका प्रमुख लक्ष्य विद्यार्थियों में अनुसंधान-आधारित सोच को विकसित करना और भारतीय ज्ञान परंपराओं को समकालीन संदर्भों में समझना है।
भारतीय ज्ञान प्रणाली ]पर गंभीर चर्चा
इस अकादमिक आयोजन ने देशभर के प्रख्यात विद्वानों, शिक्षकों और युवा शोधार्थियों को एक साझा मंच पर एकत्र किया, जहां भारतीय ज्ञान प्रणाली के विविध आयामों पर गंभीर चर्चा और विचार-विमर्श हुआ। सम्मेलन का उद्देश्य न केवल पारंपरिक ज्ञान की पुनर्समीक्षा करना था, बल्कि उसे वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भी स्थापित करना था।
बदलती और विकसित होती भारतीय ज्ञान परंपरा
सम्मेलन की शुरुआत एक मुख्य व्याख्यान सत्र से हुई, जिसकी अध्यक्षता कॉलेज की प्राचार्या प्रो. स्वाति पाल ने की। अपने संबोधन में उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली को एक “घोषणापत्र” के रूप में प्रस्तुत किया और इसके गतिशील तथा विकसित होते स्वरूप पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा स्थिर नहीं है, बल्कि यह समय के साथ बदलती और विकसित होती रही है, जो इसे आज भी प्रासंगिक बनाती है।
समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता
मुख्य व्याख्यान प्रख्यात समाजशास्त्री प्रो. वर्जिनियस ज़ाक्सा द्वारा दिया गया, जो मानव विकास संस्थान, नई दिल्ली में अतिथि प्रोफेसर हैं। अपने व्याख्यान में उन्होंने भारतीय ज्ञान प्रणाली को समझने के लिए ग्रामीण, शहरी और जनजातीय समाजों के बीच निरंतरता को महत्वपूर्ण बताया। उन्होंने कहा कि इन तीनों आयामों को अलग-अलग देखने के बजाय एक समग्र दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता है, जिससे भारतीय समाज की वास्तविक संरचना और ज्ञान परंपरा को बेहतर ढंग से समझा जा सके।
इसके बाद एक पैनल चर्चा आयोजित की गई, जिसकी अध्यक्षता इतिहासकार प्रो. तनुजा कोठियाल ने की। इस चर्चा में कई प्रतिष्ठित विद्वानों ने भाग लिया, जिनमें प्रो. मधुलिका बनर्जी, प्रो. प्रोबल रॉय चौधरी, प्रो. मणि शेखर सिंह, प्रो. हिना ज़िया, डॉ. अम्फू टेरांगपी और डॉ. धुर्र्जटि शर्मा शामिल थे। पैनल चर्चा के दौरान भारतीय ज्ञान प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर गहन विचार-विमर्श हुआ।
निरंतरता और अनुभव पर जोर
चर्चा में विशेष रूप से मौखिक परंपराओं, पर्यावरणीय ज्ञान, स्वदेशी कला रूपों और उपनिवेश-पूर्व साहित्यिक संस्कृतियों पर ध्यान केंद्रित किया गया। वक्ताओं ने इस बात पर जोर दिया कि भारतीय ज्ञान प्रणाली को कठोर द्वैतों जैसे परंपरा बनाम आधुनिकता के रूप में देखने के बजाय इसे निरंतरता और अनुभव के आधार पर समझना अधिक उचित है। इस दृष्टिकोण ने चर्चा को एक नई दिशा दी और श्रोताओं को सोचने के लिए प्रेरित किया।
30 से अधिक युवाओं ने शोध-पत्र प्रस्तुत किए
सम्मेलन का अगला चरण पांच विषयगत सत्रों के रूप में आयोजित किया गया। इन सत्रों में देशभर से आए 30 से अधिक युवा शोधकर्ताओं ने अपने शोध-पत्र प्रस्तुत किए। इन सत्रों की अध्यक्षता विभिन्न प्रतिष्ठित शिक्षाविदों ने की, जिनमें प्रो. मधुलिका बनर्जी, डॉ. राकेश बटब्याल, डॉ. स्वप्ना लिडल, डॉ. अवितोली जी. झिमो और डॉ. रितुपर्णा पटगिरी शामिल थे।
इन सत्रों ने एक जीवंत और संवादात्मक वातावरण प्रदान किया, जहां युवा शोधकर्ताओं को अपने विचार साझा करने और विशेषज्ञों से प्रतिक्रिया प्राप्त करने का अवसर मिला। प्रस्तुत शोध-पत्रों में भारतीय ज्ञान प्रणाली की समृद्धि, उसकी प्रासंगिकता और वर्तमान समय की चुनौतियों से उसके संबंधों पर विस्तार से चर्चा की गई। इससे न केवल शोधकर्ताओं का आत्मविश्वास बढ़ा, बल्कि उन्हें अपने कार्य को और बेहतर बनाने की प्रेरणा भी मिली।
छात्रों और शोधार्थियों को मिलेगा नया दृष्टिकोण
सम्मेलन का समापन प्राचार्या प्रो. स्वाति पाल के समापन संबोधन के साथ हुआ। उन्होंने पूरे आयोजन की सराहना करते हुए कहा कि इस तरह के सम्मेलन छात्रों और शोधार्थियों को नए दृष्टिकोण प्रदान करते हैं और उन्हें गहन अध्ययन के लिए प्रेरित करते हैं। इस अवसर पर विषयगत सत्रों के अध्यक्षों के साथ मिलकर उन्होंने उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले युवा शोधकर्ताओं को “सर्वश्रेष्ठ शोध-पत्र” पुरस्कार भी प्रदान किए।
यह सम्मेलन न केवल एक अकादमिक आयोजन था, बल्कि यह भारतीय ज्ञान प्रणाली की गहराई और व्यापकता को समझने का एक महत्वपूर्ण प्रयास भी था। इसने यह स्पष्ट किया कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक शोध के बीच एक संतुलन स्थापित कर ही हम एक समावेशी और ज्ञान-समृद्ध समाज का निर्माण कर सकते हैं।