नई दिल्ली : दिल्ली में जारी कड़ाके की ठंड अब जानलेवा साबित होने लगी है। खुले आसमान के नीचे जीवन गुजारने को मजबूर बेघरों की मौतों ने राजधानी के प्रशासनिक इंतजामों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। दिल्ली पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक, बीते 15 दिनों में ठंड के कारण 44 बेघरों की मौत दर्ज की गई है। सभी मृतक पुरुष बताए जा रहे हैं, जिनमें अधिकांश प्रवासी श्रमिक थे।
उत्तरी जिले में सबसे ज्यादा मौतें
पुलिस आंकड़ों के अनुसार, ठंड से सबसे अधिक 17 मौतें उत्तरी जिले में दर्ज की गई हैं। इसके अलावा मध्य जिले में सात बेघरों की जान गई है। उत्तर-पश्चिम और पश्चिम जिले में चार-चार मौतें हुई हैं। दक्षिण-पश्चिम, उत्तर-पूर्व, शाहदरा, दक्षिण-पूर्व और नई दिल्ली जिले में दो-दो मौतों की पुष्टि हुई है, जबकि उत्तर रोहिणी और दक्षिण जिले में एक-एक बेघर की मौत दर्ज की गई है।
खुले में रहने को मजबूर बेघर
फ्लाईओवरों के नीचे, फुटपाथों पर और सड़कों के किनारे रहने वाले बेघर लोग इस ठंड में सबसे अधिक प्रभावित हो रहे हैं। ठंड से बचाव के लिए न तो उनके पास पर्याप्त कपड़े हैं और न ही कंबल या हीटर जैसी सुविधाएं। कई बेघर बीमार और बुजुर्ग हैं, जिन्हें समय पर इलाज और गर्म स्थान नहीं मिल पाता, जिससे उनकी हालत और बिगड़ जाती है।
रैन बसेरों की व्यवस्था, लेकिन हकीकत अलग
दिल्ली सरकार की ओर से बेघरों के लिए रैन बसेरों की व्यवस्था की गई है, लेकिन जमीनी हकीकत इससे अलग नजर आती है। कई बेघरों का कहना है कि रैन बसेरों में जगह की भारी कमी है। कुछ जगहों पर साफ-सफाई और सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। वहीं, कई रैन बसेरों में देर रात पहुंचने वाले लोगों को प्रवेश नहीं मिलता, जिसके चलते मजबूरन उन्हें खुले में ही रात गुजारनी पड़ती है।
नशेड़ियों का अड्डा बनते रैन बसेरे
दिल्ली शहरी आश्रय बोर्ड (डूसिब) द्वारा संचालित कई रैन बसेरों को लेकर गंभीर आरोप सामने आए हैं। बेघरों और प्रवासी श्रमिकों का कहना है कि कई रैन बसेरे नशेड़ियों और शराबियों का अड्डा बन चुके हैं। ये लोग गिरोह बनाकर रैन बसेरों में ठहरने वाले लोगों का सामान चोरी कर लेते हैं। कुछ मामलों में ब्लेड और अन्य धारदार हथियार दिखाकर डराने-धमकाने की घटनाएं भी सामने आई हैं।
डर के कारण बाहर सोने को मजबूर
नशेड़ियों और असामाजिक तत्वों के डर से कई बेघर रैन बसेरों में रुकने से बचते हैं। उनका कहना है कि सुरक्षा के अभाव में रैन बसेरे सुरक्षित नहीं लगते, इसलिए वे खुले में ही सोने को मजबूर हैं, भले ही जान का जोखिम क्यों न उठाना पड़े।
प्रशासनिक तैयारियों पर सवाल
लगातार हो रही मौतों के बावजूद राहत और बचाव व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सामाजिक संगठनों का कहना है कि सर्दी के मौसम में रैन बसेरों की संख्या बढ़ाने, वहां बुनियादी सुविधाएं सुनिश्चित करने और सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने की सख्त जरूरत है।
बढ़ती ठंड, बढ़ती चिंता
मौसम विभाग के अनुसार आने वाले दिनों में ठंड और बढ़ने की संभावना है। ऐसे में अगर बेघरों के लिए ठोस और त्वरित कदम नहीं उठाए गए, तो हालात और भयावह हो सकते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि ठंड से होने वाली ये मौतें रोकी जा सकती थीं, बशर्ते समय रहते प्रभावी इंतजाम किए जाते।