डीयू-जेएनयू छात्रसंघ चुनाव में सीजेपी की एंट्री की तैयारी, बिना उम्मीदवार उतारे बदलेगी सियासी तस्वीर

सीजेपी का कहना है कि वह छात्रसंघ चुनाव में सीधे अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी। इसके बजाय संगठन छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर अपना घोषणा पत्र जारी करेगा और उन छात्र संगठनों या उम्मीदवारों का समर्थन करने की अपील कर सकता है, जो उसके एजेंडे और शर्तों को स्वीकार करेंगे।;

Update: 2026-08-20 03:47 GMT

नई दिल्ली: दिल्ली विश्वविद्यालय में छात्रसंघ चुनाव की तैयारियों के साथ ही कैंपस की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। अलग-अलग विचारधाराओं और राजनीतिक दलों से जुड़े छात्र संगठन सक्रिय होने लगे हैं। इसी बीच काकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने विश्वविद्यालय और कॉलेजों की छात्र राजनीति में अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव बढ़ाने की रणनीति तैयार की है। संगठन का फोकस दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) और जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के अलावा देश के दूसरे प्रमुख परिसरों में छात्र हित से जुड़े मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाने पर है।

सीजेपी का कहना है कि वह छात्रसंघ चुनाव में सीधे अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी। इसके बजाय संगठन छात्रों से जुड़े मुद्दों को लेकर अपना घोषणा पत्र जारी करेगा और उन छात्र संगठनों या उम्मीदवारों का समर्थन करने की अपील कर सकता है, जो उसके एजेंडे और शर्तों को स्वीकार करेंगे। ऐसे में डूसू समेत कई विश्वविद्यालयों में चुनावी समीकरणों पर संभावित असर को लेकर चर्चा शुरू हो गई है।

सीधे चुनाव मैदान में नहीं उतरेगी सीजेपी

सीजेपी के मुख्य प्रवक्ता आशुतोष रांका के मुताबिक संगठन फिलहाल छात्रसंघ चुनावों में प्रत्यक्ष तौर पर भाग लेने की योजना नहीं बना रहा है। उनका कहना है कि सीजेपी का उद्देश्य चुनाव लड़ना नहीं, बल्कि छात्र हितों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाना है। इसी रणनीति के तहत संगठन छात्रसंघ चुनावों के लिए एक अलग घोषणा पत्र तैयार करेगा। इसमें छात्रों की समस्याओं, कैंपस से जुड़े मुद्दों और व्यवस्था में सुधार की जरूरतों को बिंदुवार रखा जाएगा। इसके बाद चुनाव लड़ रहे छात्र संगठनों और प्रत्याशियों के सामने इस एजेंडे को रखा जाएगा।

बड़े छात्र संगठनों के सामने रखा जाएगा एजेंडा

सीजेपी अपने प्रस्तावित घोषणा पत्र को देश के प्रमुख छात्र संगठनों के सामने रखने की तैयारी में है। इनमें अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी), नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया (एनएसयूआइ), स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआइ), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन (आइसा), ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन (एआइएसएफ) और केरल स्टूडेंट्स यूनियन (केएसयू) समेत अन्य संगठन शामिल हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय में एबीवीपी और एनएसयूआइ के अलावा वामपंथी छात्र संगठनों की भी सक्रिय मौजूदगी है। ऐसे में सीजेपी का मुद्दा आधारित समर्थन आगामी चुनावों में अलग तरह की राजनीतिक रणनीति को जन्म दे सकता है।

मुद्दे स्वीकार करने वालों के पक्ष में अपील

सीजेपी की रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा उसका संभावित समर्थन है। संगठन के अनुसार, जो छात्र संगठन या प्रत्याशी उसके घोषणा पत्र में शामिल छात्र हित के मुद्दों और शर्तों को स्वीकार करेंगे, उनके पक्ष में छात्रों से मतदान की अपील की जा सकती है। इस तरह सीजेपी खुद चुनाव मैदान में उतरे बिना किसी प्रत्याशी या संगठन के पक्ष में अपना प्रभाव इस्तेमाल करने की कोशिश करेगी। हालांकि, किसी उम्मीदवार या संगठन को समर्थन देने का अंतिम फैसला किन शर्तों और प्रक्रियाओं के आधार पर होगा, इसका विस्तृत खाका घोषणा पत्र जारी होने के बाद सामने आने की उम्मीद है।

एक अपील से बदल सकता है चुनावी गणित?

डीयू छात्रसंघ चुनाव देश के सबसे चर्चित छात्र चुनावों में शामिल हैं। यहां प्रमुख छात्र संगठनों के बीच मुकाबला अक्सर व्यापक राजनीतिक बहस का रूप ले लेता है। ऐसे में किसी नए संगठन की ओर से मुद्दा आधारित समर्थन की घोषणा चुनावी गणित को प्रभावित कर सकती है। सीजेपी की रणनीति सफल रहती है तो वह बिना अपने उम्मीदवार उतारे अलग-अलग विश्वविद्यालयों और राज्यों के छात्रसंघ चुनावों में प्रभाव बनाने की कोशिश कर सकती है। खासकर डूसू जैसे महत्वपूर्ण चुनाव में किसी संगठन या प्रत्याशी के पक्ष में सामूहिक मतदान की अपील को संभावित रूप से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।

छात्र राजनीति में नई भूमिका बनाने की कोशिश

सीजेपी का दावा है कि उसका उद्देश्य पारंपरिक राजनीतिक प्रतिस्पर्धा में शामिल होना नहीं, बल्कि छात्रों से जुड़े वास्तविक मुद्दों को चुनावी एजेंडे में शामिल कराना है। संगठन का कहना है कि विश्वविद्यालयों में फीस, शिक्षा व्यवस्था, छात्र सुविधाओं, रोजगार, पारदर्शिता और कैंपस से जुड़े अन्य विषयों पर उम्मीदवारों से स्पष्ट रुख मांगा जाएगा। अब नजर इस बात पर रहेगी कि सीजेपी का घोषणा पत्र किन मुद्दों को प्राथमिकता देता है और प्रमुख छात्र संगठन उस एजेंडे को कितना स्वीकार करते हैं। डीयू और जेएनयू समेत विभिन्न परिसरों में चुनावी गतिविधियां तेज होने के साथ यह भी स्पष्ट होगा कि सीजेपी की अप्रत्यक्ष चुनावी रणनीति वास्तव में कितना असर डाल पाती है।

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