कोरोना : सुप्रीम कोर्ट ने जारी किये कुछ दिशानिर्देश, सुनवाई 7 अप्रैल को

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता : देश के गांवों में अभी तक कोरोना संक्रमण नहीं पहुंचा है, लेकिन शहरों से गांव की तरफ हुए पलायन से इसकी आशंका बढ़ गयी है।

Update: 2020-03-31 18:26 GMT

नयी दिल्ली। उच्चतम न्यायालय ने देश में कोरोना वायरस के मद्देनजर राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के कारण प्रवासी श्रमिकों के समक्ष उत्पन्न परिस्थितयों के निवारण के लिए दिशानिर्देश जारी करने संबंधी याचिका मामले में सुनवाई अगले मंगलवार तक लिए स्थगित कर दी तथा कुछ मौखिक दिशानिर्देश भी जारी किये हैं।

मुख्य न्यायाधीश शरद अरविंद बोबडे और न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की विशेष खंडपीठ ने अधिवक्ता अलख आलोक श्रीवास्तव एवं रश्मि बंसल की याचिकाओं की आज वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये संयुक्त सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार द्वारा किये गये उपायों के बारे में गम्भीरता से सुना तथा सोशल मीडिया पर कोरोना से संबंधित फर्जी खबरें फैलाने वाले के खिलाफ कार्रवाई करने तथा चिकित्सकों का एक पैनल गठित करने सहित कई मौखिक दिशानिर्देश दिये। बाद में न्यायालय ने मामले की सुनवाई सात अप्रैल तक के लिए स्थगित कर दी।

सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोरोना संक्रमण की समस्या से निपटने, प्रवासी मजदूरों के लिए की जा रही सुविधाओं, लोगों को साेशल डिस्टेंशिंग के लिए प्रोत्साहित करने और उनकी आवश्यकता की चीजों की आपूर्ति के लिए किये जाने वाले उपायों तथा संक्रमण या इसकी आशंका वाले मरीजों के लिए उठाये गये चिकित्सकीय उपायों का ब्योरा दिया। उन्होंने केंद्र की ओर से स्थिति रिपोर्ट भी पेश की, जिनमें कोरोना संक्रमण के मद्देनजर किये जाने वाले उपायों का विस्तृत उल्लेख किया गया है।

श्री मेहता ने अपने कार्यालय से वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये न्यायालय को अवगत कराया कि पाँच जनवरी को भारत में कोरोना वायरस पहुँचा था और सरकार ने 17 जनवरी से इसके ख़िलाफ़ तैयारियाँ शुरू कर दी थी। उन्होंने कहा कि पलायन करने वाले 10 लोगों में से तीन के संक्रमित होने की आशंका है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि देश के गांवों में अभी तक कोरोना संक्रमण नहीं पहुंचा है, लेकिन शहरों से गांव की तरफ हुए पलायन से इसकी आशंका बढ़ गयी है। सरकार ने हालांकि यह दावा किया कि अब पलायन पर रोक लग गयी है। अब कोई भी सड़क पर नहीं है।

सॉलिसिटर जनरल ने बताया कि इस दौरान छह लाख 63 हज़ार लोगों को आश्रय दिया गया है और 22 लाख 88 हज़ार लोगों तक भोजन और दूसरी ज़रूरी सुविधाएँ उपलब्ध कराई जा रही हैं। न्यायालय ने उनके इस बयान को रिकॉर्ड में ले लिया।

श्री मेहता ने कहा कि कोरोना को लेकर फैलायी जा रही फेक न्यूज़ एक बड़ी समस्या है। इस पर न्यायालय ने कहा कि लोगों में अफवाह, संत्रास और घबराहट पैदा करना कोरोना वायरस से खतरनाक है, यह कोरोना से अधिक ज़िंदगी तबाह कर सकता है। मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि ऐसे लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।

न्यायालय ने अपने मौखिक निर्देश में कहा कि सरकार यह भी सुनिश्चित करेगी कि जिन लोगों का प्रवास उसने बंद किया है उन सभी को भोजन, आश्रय, पोषण और चिकित्सा सहायता के मामले में कोई कमी न आये। कोरोना संक्रमण और उससे बचाव आदि की जानकारी के लिए केंद्र सरकार 24 घंटे में एक पोर्टल स्थापित करेगी। साथ ही चिकित्सकों की समिति बनायेगी, जिसमें अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) जैसे प्रमुख अस्पतालों के चिकित्सकों को शामिल किया जायेगा।

खंडपीठ ने केंद्र सरकार से कहा कि शिविरों में रखे गए लोगों की चिंता कम करने के लिए सभी धर्म सम्प्रदाय के नेताओं और धर्म गुरुओं की सहायता ली जाये, इससे शिविरों में रहने वालों के बीच अफवाह फैलने से रोका जा सकता है।

न्यायालय ने देश के विभिन्न उच्च न्यायालयों में कोरोना पर दायर याचिकाओं की सुनवाई पर रोक लगाने की केन्द्र सरकार की माँग ठुकरा दी। न्यायमूर्ति राव ने कहा कि ऐसा करना उचित नहीं होगा, क्योंकि उच्च न्यायालय संबंधित राज्य की समस्या को और बेहतरी से समझ सकते हैं। इससे पहले सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि देशभर के एयरपोर्ट पर 15.5 लाख और सीपोर्ट पर 12 लाख लोगों की स्क्रीनिंग की गई है।

याचिकाकर्ताओं ने कहा कि शीर्ष अदालत को राज्यों को निर्देश पारित करना चाहिए। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव ने कहा कि आपदा प्रबंधन अधिनियम में राज्यों और जिलों के लिए प्रावधान हैं, जो केंद्रीय प्राधिकरण के निर्देशों पर अमल करने के लिए बाध्य हैं। इसलिए न्यायालय को राज्यों को विशिष्ट आदेश पारित करने की आवश्यकता नहीं है।

वकीलों ने भी अपने अपने घर से ही वीडियो कांफ्रेंसिंग के जरिये दलीलें दी। सोलिसिटर जनरल तुषार मेहता के यहाँ गृह सचिव और संयुक्त सचिव भी मौजूद थे।
 

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