भाजपा से आयातित नेता सतीश के भरोसे कांग्रेस!

सतीश सिकरवार जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं उसको देखकर लगता है कि कांग्रेस के अंदर ही एक नई सतीश कांग्रेस चल रही है। सतीश सिकरवार के आगे कई पुराने कांग्रेस नेता अब बोने नजर आने लगे हैं;

Update: 2023-02-06 04:50 GMT
गजेन्द्र इंगले
 
ग्वालियर: कमलनाथ का दौरा हो और कार्यक्रम में कांग्रेस के सभी नेताओं की भागीदारी की जगह एक ही नेता का वर्चस्व दिखे तो आप इसे क्या समझेंगे? यही हालात है आजकल मध्यप्रदेश की राजनीति में। जहाँ विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और कांग्रेस की तैयारी राम भरोसे नजर आ रही है। अमूमन किसी बड़े नेता के आने पर हर नेता अपने नम्बर बढाने की जुगत में लग जाता है। लेकिन फिर भी पार्टी को सर्वोपरि रख एकजुटता का परिचय देता है। लेकिन ग्वालियर के हालात इसके बिल्कुल इतर हैं।
 
हम बात कर रहे हैं ग्वालियर के कद्दावर नेता सतीश सिकरवार की। तीन साल पहले जब ज्योतिरादित्य सिंन्धिया ने अपने समर्थकों के साथ भाजपा का दामन थामा था। तब सतीश सिकरवार भी भाजपा में थे उनका कद भाजपा में लगातार बढ़ रहा था। जयभान सिंह पवैया, नरेंद्र सिंह तोमर, अनूप मिश्रा जैसे कद्दावर भाजपा नेताओं के होते हुए भी उन्होंने अपनी उड़ान जारी रखी। लेकिन सिंन्धिया के भाजपा में आने पर शायद उन्हें अपना भविष्य कांग्रेस में नजर आया। अपने लाव लश्कर के साथ कमलनाथ से मिलने भोपाल पहुंच गए। ग्वालियर पूर्व से टिकिट भी मिला और अपने चिर प्रतिद्वंदी सिंन्धिया समर्थक मुन्नालाल गोयल को हराकर कांग्रेस में अपनी मजबूत शुरुवात की। 
 
सतीश सिकरवार जिस रफ्तार से आगे बढ़ रहे हैं उसको देखकर लगता है कि कांग्रेस के अंदर ही एक नई सतीश कांग्रेस चल रही है। सतीश सिकरवार के आगे कई पुराने कांग्रेस नेता अब बोने नजर आने लगे हैं।
 
जब महापौर चुनाव के दौरान सतीश सिकरवार अपनी अर्धांगनी श्रीमती शोभा सिकरवार के लिए टिकिट ले आये तो कई कांग्रेसियों को जबरदस्त झटका लगा। अब तो शहर के दो प्रभावशाली जनप्रतिनिधि एक विधायक और एक महापौर एक ही परिवार से होने के कारण हर छोटे बड़े फैंसले में पुराने कांग्रेस नेता यहां तक कि वर्तमान में कांग्रेस जिलाध्यक्ष देवेंद्र शर्मा के फैंसले भी दरकिनार किये जाते हैं। ग्वालियर की बात करें तो पूरी कांग्रेस एक ही भाजपा आयातित नेता सतीश सिकरवार तक सिमट कर रह गई है।
 
संत रविदास की जयंती पर हुए कार्यक्रम मे ऐसा कहीं नजर नहीं आया कि यह कांग्रेस का आयोजन है। बल्कि यह साफ दिखाई दिया कि यह सतीश कांग्रेस का आयोजन है। पूरे प्रदेश की बात करें तो पहले की कांग्रेस कई धड़ों में बंटी हुई है। अब ग्वालियर में भी एक नेता का इस तरह बढ़ना और कई पुराने कांग्रेस नेताओं का मूक रहना बता रहा है कि यहां भी गुटबाजी का अंकुर फूट चुका है।
आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की यह अंदरूनी खींचातानी कमलनाथ के लिए बड़ी चुनौती होगी। अंदर की खबर तो यह भी है कि जिस सिंन्धिया के भाजपा में शामिल होने पर सामंतवाद के विरुद्ध सतीश सिकरवार ने भाजपा छोड़ी थी कुछ उसी तरह के हालात अब कांग्रेस में बन रहे हैं। प्रदेश स्तर पर कमलनाथ का और ग्वालियर में सतीश सिकरवार का 
सामंतवादी रवैया आगामी विधानसभा में कांग्रेस के लिए अग्नि परीक्षा होगी। 

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