लहू बोलता भी है

भारत में 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं, जिसमें पहले चरण का मतदान पूरा हो चुका है और अब शुक्रवार 26 अप्रैल को दूसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार जोरों पर है

Update: 2024-04-25 00:49 GMT

- सर्वमित्रा सुरजन

इंडिया गठबंधन के नाम से इस बार जो विपक्षी मोर्चा तैयार हुआ है, उसका उद्देश्य भी संविधान को बचाना ही है। इसलिए अपने सारे मतभेदों और स्वार्थों को किनारे करके, 28 दल इस बार एक साथ चुनाव लड़ने उतरे हैं। इन सभी दलों के अलग-अलग घोषणापत्र हैं, मगर सबके मूल में संविधान की रक्षा और जनता को न्याय दिलाने की भावना दिखाई दे रही है।

भारत में 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव हो रहे हैं, जिसमें पहले चरण का मतदान पूरा हो चुका है और अब शुक्रवार 26 अप्रैल को दूसरे चरण के लिए चुनाव प्रचार जोरों पर है। 1 जून को आखिरी चरण के वोट पड़ेंगे और तब तक इसी तरह चुनावी रैलियों, सभाओं, जुलूसों, रोड शो की गहमागहमी बरकरार रहेगी। भारत के नागरिकों के लिए यह गर्व की बात है कि हमारी लोकतांत्रिक निर्वाचन की परंपरा आजादी के 77 वर्ष बाद भी बरकरार है। इसका मतलब यह है कि आजाद भारत के सपनों को पूरा करने के लिए जो संविधान बनाया गया था, वो कारगर साबित हुआ है। इस संविधान में एक ओर नागरिक अधिकारों को अक्षुण्ण रखने के लिए सख्ती है, तो दूसरी ओर वक्त के साथ बदलाव करने के लिए लचीलापन भी है। इसलिए अगर इस आजादी और नागरिक होने के अधिकार को बचाकर रखना है, तो सबसे पहले संविधान को बचाना होगा।

इंडिया गठबंधन के नाम से इस बार जो विपक्षी मोर्चा तैयार हुआ है, उसका उद्देश्य भी संविधान को बचाना ही है। इसलिए अपने सारे मतभेदों और स्वार्थों को किनारे करके, 28 दल इस बार एक साथ चुनाव लड़ने उतरे हैं। इन सभी दलों के अलग-अलग घोषणापत्र हैं, मगर सबके मूल में संविधान की रक्षा और जनता को न्याय दिलाने की भावना दिखाई दे रही है। भाजपा इंडिया गठबंधन के बाकी दलों की चर्चा तो नहीं करती, लेकिन कांग्रेस के घोषणापत्र की चर्चा अब भाजपा के हर मंच से हो रही है। भाजपा के सबसे बड़े स्टार प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने कांग्रेस का न्यायपत्र नाम से जारी घोषणापत्र पर पहले दिन से ही हमला शुरु कर दिया। सबसे पहले उन्होंने इसे मुस्लिम लीग की छाप वाला घोषणापत्र कहा। यह दांव कुछ दिन श्री मोदी चलते रहे, लेकिन इससे कांग्रेस को ही लाभ मिलने लगा। क्योंकि लोगों ने कांग्रेस के घोषणापत्र को और ध्यान से पढ़ना शुरु कर दिया कि इसमें ऐसे कौन से मुद्दे हैं, जिनमें मुस्लिम लीग की छाप नजर आ रही है। मगर नरेन्द्र मोदी जैसी नज़रें जनता को नहीं मिली, इसलिए वो मुस्लिम लीग का म इस घोषणापत्र में नहीं ढूंढ पाई। इसके बाद श्री मोदी ने दूसरे म का दांव चला, इस बार उन्होंने मंगलसूत्र को अपना हथियार बनाया।

राजस्थान के बांसवाड़ा में हुई रैली में श्री मोदी ने जनता को बताया कि कांग्रेस की नजर आपकी संपत्ति पर है और माताओं-बहनों के मंगलसूत्र को भी कांग्रेस छीन लेगी और जिनके ज्यादा बच्चे होते हैं, यानी मुसलमान उनमें बांट देगी। आचार संहिता के लिहाज से झूठ और नफरत वाले बयान देने के कारण श्री मोदी पर चुनाव आयोग को कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, इसके बाद अलीगढ़ में श्री मोदी ने फिर से इसी तरह का बयान दिया और उसके बाद राजस्थान में फिर से कांग्रेस के घोषणापत्र, मंगलसूत्र, हनुमान चालीसा पढ़ने की आजादी, रामनवमी मनाने की छूट इन सबको लेकर नफरत का रिकार्ड उलट-पुलट कर बजाना जारी रखा। चुनाव आयोग के पास कांग्रेस समेत कई दलों ने शिकायतें दर्ज की, लेकिन सब व्यर्थ ही है, क्योंकि श्री मोदी पर कोई अंकुश लग ही नहीं रहा है।

मंगलसूत्र छीनने का डर दिखाकर श्री मोदी ने महिलाओं के साथ भावनात्मक खेल खेलने की कोशिश की है। हालांकि इस बार भी म नाम का दांव उन पर उल्टा पड़ रहा है। क्योंकि इस देश की हजारों महिलाओं के मंगलसूत्र पहले नोटबंदी में छीन लिए गए, फिर कोरोना की मार से जब हजारों गृहस्थियां उजड़ गईं, तब मंगलसूत्र छीने गए। पुलवामा हमला या चीन की घुसपैठ की घटनाओं में सैनिक शहीद हुए और उनकी पत्नियों के मंगलसूत्र छीने गए। किसान आंदोलन के दौरान या कर्ज के बोझ के कारण जिन किसानों की जानें गईं, तब उनकी पत्नियों के मंगलसूत्र छीने गए। इस तरह दस साल में एक बार नहीं, बार-बार महिलाओं को इस दर्द से गुजरना पड़ा और अब नरेन्द्र मोदी उस पर माफी मांगने, अफसोस जताने या मलहम लगाने की जगह डरा रहे हैं कि कांग्रेस की सरकार आई तो मंगलसूत्र भी नहीं बचेंगे। कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी ने श्री मोदी के इस दांव का जवाब देते हुए कहा कि मेरी दादी ने युद्ध के दौरान अपने जेवर दे दिए, मेरी मां का मंगलसूत्र इस देश के लिए कुर्बान हुआ। इस करारे जवाब के बाद भाजपा को बचाव का कोई रास्ता नहीं सूझा तो उसकी ट्रोल आर्मी के लोग सोशल मीडिया पर राजीव गांधी की शहादत का मखौल उड़ाने लगे। सोनिया गांधी की वे तस्वीरें जारी की जा रही हैं, जहां वे राजीव गांधी के साथ हैं, लेकिन उन्होंने मंगलसूत्र नहीं पहना है। प्रियंका गांधी की भी बिना मंगलसूत्र पहने तस्वीरें जारी हो रही हैं और उनसे हिंदू होने का प्रमाण मांगा जा रहा है। यह सब एक तरफ भाजपा की अपने विरोधियों के लिए अपमानभरी निकृष्ट सोच का परिचायक है, तो दूसरी तरफ जनता को कठपुतलियों की तरह इस्तेमाल करने वाली मानसिकता का प्रदर्शन भी है। क्योंकि चुनावों में मुद्दे जनता के सरोकारों वाले होने चाहिए।

शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, कृषि, सड़कें, पुल-पुलिया, यातायात, पक्के मकान, साफ-सुथरी सड़कें, नालियां, बिजली, सस्ता और अच्छा अनाज, लैंगिक समानता, काम के अवसर, उद्योग धंधों का विकास, सुरक्षित माहौल, कानून व्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण, प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा, त्वरित न्याय ऐसे कई मुद्दे हैं, जिन पर निरंतर काम करने की जरूरत है, तभी हम विकास के पायदान पर आगे बढ़ पाएंगे। अगर इन सुविधाओं तक आम आदमी की पहुंच आसान हो जाएगी, तो जीवनस्तर में भी सुधार आएगा। पंचायतों से लेकर विधानसभा और संसद तक इन्हीं मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों को चर्चा करने के लिए भेजा जाता है। लेकिन उससे पहले जरूरी है कि इन्हीं मुद्दों पर जनप्रतिनिधियों का चुनाव भी हो। चुनावी प्रचार में शोर भी बुनियादी मुद्दों का होना चाहिए। मगर नरेन्द्र मोदी आभासी मुद्दों को खड़ा कर रहे हैं। भाजपा को इस झूठ को आगे बढ़ाने का मौका सैम पित्रोदा के एक बयान से और मिल गया।

इंडियन ओवरसीज़ कांग्रेस के चेयरमैन सैम पित्रोदा ने हाल ही में एक बयान दिया था कि, अमेरिका में इनहेरिटेंस टैक्स की व्यवस्था है। इसका मतलब है कि अगर किसी के पास 10 करोड़ डॉलर की संपत्ति है तो उसके मरने के बाद बच्चों को केवल 45 फ़ीसदी संपत्ति ही मिलेगी और बाकी 55 फ़ीसदी सरकार ले लेगी।.. भारत में इस तरह की व्यवस्था नहीं है। लेकिन जब हम संपत्ति के पुनर्वितरण की बात करते हैं, तो हम नई नीतियों और नए तरह के प्रोग्राम की बात करते हैं जो जनता के हित में है न कि केवल अमीर लोगों के।

इस बयान पर भाजपा ने एक बार फिर डराना शुरु कर दिया कि कांग्रेस अगर आई तो आपकी 55 प्रतिशत संपत्ति ले लेगी। हालांकि सैम पित्रोदा ने कह दिया है कि उन्होंने केवल अमेरिकी कानून का जिक्र किया था, उन्होंने यह नहीं कहा था कि भारत में लोगों के मरने के बाद उनकी 55 प्रतिशत संपत्ति सरकार ले लेगी। सैम पित्रोदा ने कहा कि यह गोदी मीडिया का खेल है, जो मेरी बात को गलत तरीके से पेश कर रही है। जाहिर है भाजपा या उसका समर्थक मीडिया सैम पित्रोदा के इस स्पष्टीकरण को जनता तक पहुंचने से रोकेगा। क्योंकि फिर उसका खेल जनता के सामने आ जाएगा।

बहरहाल, नरेन्द्र मोदी ने बातों, बयानों और घटनाओं को आधे सच, आधे झूठ के साथ जनता के बीच परोसने का जो खेल शुरु किया है, उसमें अगर झूठ की जीत हो गई, तो फिर लोकतंत्र की हार हो जाएगी। अब सारा दारोमदार जनता पर ही है कि वह हंस की तरह नीर-क्षीर विवेक से काम ले। वैसे सच भी देर-अबेर सामने आ ही जाएगा। शायर इकबाल अज़ीम ने फरमाया है-

क़ातिल ने किस सफ़ाई से धोई है आसतीं,
उसको ख़बर नहीं कि लहू बोलता भी है।।

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