अपने ही नेताओं के चक्रव्यूह में फंसी भाजपा
भोपाल, ग्वालियर और इंदौर जैसी मजबूत सीटों पर भाजपा अभी तक कोई उम्मीदवार नहीं दे सकी है और जहां से उम्मीदवार खड़े हैं, उन्हें देखकर भी लगता है, कि आसानी से कांग्रेस को बढ़त का मौका दिया जा रहा है
भोपाल । लोकसभा चुनाव चल रहे हैं और मध्य प्रदेश भाजपा में नेताओं की राजनीति भी चरम पर है। प्रदेश की २९ में से १५ सीट घोषित करने के बाद केन्द्रीय नेतृत्व शेष सीटों पर उम्मीदवार घोषित नहीं कर सका है।
भोपाल, ग्वालियर और इंदौर जैसी मजबूत सीटों पर भाजपा अभी तक कोई उम्मीदवार नहीं दे सकी है। प्रदेश में जिन सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए गए हैं, उन्हें देखकर भी लगता है, कि आसानी से कांग्रेस को बढ़त का मौका दिया जा रहा है।
प्रदेश भाजपा के कद्दावर नेता केन्द्र में सरकार गठन से अधिक अपने भविष्य को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं।
मध्य प्रदेश की इंदौर और भोपाल सीट भाजपा की परंपरागत सीट रही हैं। इंदौर में सुमित्रा महाजन के कारण पेंच फंसा है, तो भोपाल में दिग्विजय सिंह के अचानक मैदान में आ जाने से मामला उलझ गया है। हालांकि मामला यहीं तक सीमित नहीं है, इँदौर में कैलाश विजयवर्गीय लंबे समय से ताई को किनारे लगाने में लगे हैं,
पिछले विधानसभा चुनाव में वे अपने बेटे को टिकट दिलवाना चाहती थीं, जो नहीं हो सका, अब भाजपा उनका लोकसभा का टिकट भी काटना चाहती है। अगर यह होता है, तो ताई का अध्याय इंदौर की राजनीति से खत्म हो जाएगा।
इंदौर की राजनीति में अगर कैलाश विजयवर्गीय अपनी राजनीति सुरक्षित रखना चाहते हैं, तो ग्वालियर चंबल में केन्द्रीय मंत्री नरेन्द्र सिंह तोमर। वे ग्वालियर से वर्तमान में सांसद हैं, पास की मुरैना सीट से पू्र्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी के भांजे अनूप मिश्रा सांसद हैं।
इस बार वे विधानसभा का चुनाव भी लड़े, पर हार गए। ग्वालियर चंबल संभाग में भाजपा का सूपड़ा साफ हुआ और तमाम बड़े नेताओं ने खुलकर नरेन्द्र सिंह को अपनी हार के लिए जिम्मेदार ठहराया। ऐसे में सारे बडे नेता जहां नरेन्द्र सिंह के खिलाफ मोर्चा खोले बैठे हैं,
जो इस बार ग्वालियर सीट पर सिंधिया परिवार के किसी सदस्य की दावेदारी ने भी नरेन्द्र सिंह को सीट बदलने को मजबूर कर दिया। पिछला लोकसभा चुनाव वे मुरैना से ही जीते थे।
इस बार अनूप का टिकट कटना तय था, पर संघ ने विद्यार्थी परिषद से भाजपा में आए पार्टी के प्रदेश महामंत्री विष्णु दत्त शर्मा की सिफारिश की थी, उनका टिकट तय भी माना जा रहा था, पर ऐन वक्त पर भाजपा के कद्दावर नेताओं ने उनका नाम भोपाल से चलाना शुरु किया और स्थानीय नेताओं से विरोध कराना भी शुरु कर दिया।
इसी बीच भाजपा द्वारा जारी पहली सूची में नरेन्द्र सिंह तोमर का नाम सामने आ गया। भिण्ड सीट से भागीरथ प्रसाद का टिकट काटकर पूर्व विधायक संध्या राय को टिकट दिया गया, जबकि माना जा रहा था पूर्व सांसद अशोक अर्गल वापस आ सकते हैं।
ग्वालियर चंबल की चार सीटों में एक टिकट ब्राम्हण को दिया जाना है, तो नरेन्द्र सिंह चाहते हैं, यहां से विवेक शेजवलकर को लड़ा दिया जाए, वे महाराष्ट्रियन ब्राम्हण हैं। नरेन्द्र जानते हैं, कि शेजवलकर हार जाएंगे, जिससे वे अगली बार फिर सीट बदल सकते हैं।
हाल भोपाल सीट का भी यही है, शिवराज सिंह जानते हैं, कि दिग्विजय सिंह के सामने नया चेहरा लाना एक नई चुनौती को खड़ा करना है, अगर पार्टूी चुनाव जीतती है, तो एक नया नेता पैदा हो जाएगा और हारने पर उसे कोई दिक्कत नहीं होगी। ऐसे में शिवराज खुद यहां से चुनाव लड़ने की कोशिश में हैं,
साथ ही यह भी चाहते हैं, कि विदिशा सीट से उनकी पसंद का उम्मीदवार खड़ा किया जाए। हालांकि अभी तक वे अपनी पत्नी साधना सिंह को यहां से लड़ाने की तैयारी कर रहे थे।
भाजपा की जो सूची दो रोज पहले आनी थी, माना जा रहा है, नेताओं के आपसी खींचतान के कारण उलझ गई है और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने कह दिया है, कि वे पूरे मामले की खुद समीक्षा करेंगे और टिकटों का बंटवारा करेंगे।