मुस्लिम सावधान : ओवैसी बंगाल में हिजाबी मुख्यमंत्री का शिगूफा छेड़ सकते हैं!
असदउद्दीन ओवैसी को बड़ा बैरिस्टर कहकर उनका महिमामंडन किया जाता है
देश में जहां अभी केन्द्र सरकार में एक भी मुसलमान मंत्री तक नहीं है वहां हिजाबी महिला के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच जाने की बात करना सिवाय जज्बात भड़काने के और क्या है? मुस्लिम महिला के सशक्तिकरण के बहुत सारे काम होना है। प्रधानमंत्री सिर्फ एक ही बनेगी लेकिन नौकरी पाकर बहुत बड़ी तादाद में महिलाएं मजबूत होंगी। महिला शिक्षा महिलाओं के आर्थिक रूप से स्वावलंबी होने पर ओवैसी कभी बात नहीं करते हैं।
असदउद्दीन ओवैसी को बड़ा बैरिस्टर कहकर उनका महिमामंडन किया जाता है। लेकिन एक सामान्य वकील भी जानता है कि उन्हें किसी ऐसे तर्क का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए जो उसके क्लाइंट के लिए ही उल्टा पड़ सकता हो। एक बार नहीं दूसरी बार फिर ओवैसी ने कहा है कि एक दिन हिजाब पहनने वाली महिला भारत की प्रधानमंत्री बनेगी।
भारत का प्रधानमंत्री कोई भी बन सकता है। संविधान कहता है। मगर अभी तक कोई दलित भी नहीं बन सका है। अपने व्यक्तिगत करिश्मे के दम पर मायावती को यह मौका मिल सकता था। मगर डर की राजनीति की वजह से उन्होंने यह गंवा दिया। बड़ी पार्टियों में से भाजपा अपनी मनुवादी सोच के कारण कभी किसी दलित को यह मौका नहीं दे सकती है। उसकी तो आरक्षण और उस संविधान को भी जिसमें आरक्षण की व्यवस्था की गई है खत्म करने की मंशा है। मगर मौका नहीं मिल रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी चार सौ पार मांगे थे मगर अभी थोड़ा होश में बची जनता और विपक्ष के एकजुट होकर चुनाव लड़ने की वजह से उनकी यह इच्छा पूरी नहीं हो सकी। वहां दलित प्रधानमंत्री की बात कोई सोच भी नहीं सकता। संघ की और बीजेपी की पूरी राजनीति सामाजिक न्याय के सिद्धांत के विरोध में है। वापस पुरानी व्यवस्था बनाना। जिसे वह समरसता कहती है। यह शब्द संघ का ही गढ़ा हुआ है। मगर जानकारी के अभाव में कांग्रेस और दूसरी पार्टियों के नेता, लेखक पत्रकार भी इस शब्द का उपयोग सामाजिक न्याय के संदर्भ में करते रहते हैं। जबकि यह शब्द कहता है कि दलित पिछड़ों को स्थापित समाज के साथ समरस रहना चाहिए। मतलब उनके अनुसार बनी हुई सामाजिक व्यवस्था में।
दलित नेता रामदास अठावले यह जानते हैं। मोदी के साथ रहने के बावजूद उन्होंने पत्र लिखकर उनसे कहा था कि सरकारी कागजों में सामाजिक न्याय के बदले इस शब्द का इस्तेमाल किया जाने लगा है। इसे बंद होना चाहिए। जाहिर है कि उनकी इस बात को किसी को सुनना नहीं था। मगर संतोष की बात है कि कुछ दलित नेता संघ की इन बारीक कारगुजारियों को समझते हैं। कुछ कर नहीं पाएं वह अलग बात है।
तो दलित जिसे वे हिन्दुत्ववादी राजनीति में शामिल मानते हैं उसे वे देश के सर्वोच्च पद की लिए स्वीकार नहीं कर सकते तो मुस्लिम का नाम जिसके खिलाफ उनकी पूरी राजनीति है उसकी हिजाबी महिला का नाम आना तो उनकी धु्रवीकरण की राजनीति के लिए और फायदेमंद ही है।
ओवैसी यह काम कर रहे हैं। कहा जा रहा था कि बीजेपी की हिन्दू-मुस्लिम राजनीति कमजोर पड़ गई है। तो उसे वापस मजबूत करने के लिए ओवैसी ने अपने इस बयान को फिर दोहरा दिया। इससे पहले वे कर्नाटक में इस विषय पर हुए विवाद के बाद यही बात कि हिजाबी लड़की एक दिन भारत की प्रधानमंत्री बनेगी कह चुके थे।
ओवैसी मुस्लिम की राजनीति करते हैं। और इस के लिए वे सबसे बड़ा मुद्दा यह उठाते हैं कि मुस्लिम का नेता मुस्लिम ही हो सकता है। वे मुस्लिम कयादत की बात करते हैं। यह बात तो बीजेपी को बहुत सूट करती है। 15- 16 प्रतिशत मुस्लिम का नेता मुस्लिम तो बाकी हिन्दुओं का नेता हिन्दू। तो उनकी मुस्लिम कयादत की राजनीति में देश का बहुसंख्यक गैर मुस्लिम हिजाबी महिला प्रधानमंत्री को कैसे स्वीकार कर लेगा?
देश में जहां अभी केन्द्र सरकार में एक भी मुसलमान मंत्री तक नहीं है वहां हिजाबी महिला के प्रधानमंत्री पद तक पहुंच जाने की बात करना सिवाय जज्बात भड़काने के और क्या है? मुस्लिम महिला के सशक्तिकरण के बहुत सारे काम होना है। प्रधानमंत्री सिर्फ एक ही बनेगी लेकिन नौकरी पाकर बहुत बड़ी तादाद में महिलाएं मजबूत होंगी। महिला शिक्षा महिलाओं के आर्थिक रूप से स्वावलंबी होने पर ओवैसी कभी बात नहीं करते हैं।
बस बैरिस्टर साहब हिजाबी महिला के प्रधानमंत्री बनने की बात हर उस समय दोहरा देते हैं जब बीजेपी को साम्प्रदायिक धु्रवीकरण के लिए उसकी जरूरत होती है। यह बैरिस्टर विपक्षी को अपने क्लाइंट (मुस्लिम जिसके वे कायद,नेता होने का दावा करते हैं) पर और ज्यादा हमले करने का मौका मुहैया करवाते हैं।
बंगाल में चुनाव हैं। बीजेपी को मुस्लिम वोट काटने की सबसे ज्यादा जरूरत है। इसके लिए सबसे ज्यादा उपयोगी ओवैसी ही हो सकते हैं। इस तरह के जज्बात भड़काकर वे मुस्लिम वोट काटते हैं और इसका फायदा बीजेपी को मिलता है।
अभी बिहार में सबसे देख लिया। ओवैसी ने बीजेपी के साम्प्रादायिक धु्रवीकरण का साथ देकर उसके अब तक के सर्वाधिक 89 विधायकों को चुनाव जितवा दिया और खुद भी सबसे ज्यादा 5 मुस्लिम विधायक जितवा लिए। लेकिन नुकसान क्या हुआ? 243 सीटों में से मुस्लिम विधायकों की संख्या केवल 11 रह गई। जबकि पिछली बार 2020 में 19 थी। और 2015 में 24।
ओवैसी की खुद की सीटें आ जाती हैं और बाकी धर्मनिरपेक्ष पार्टियों की सीटें भी कम हो जाती हैं और उनसे लड़ने वाले मुस्लिम प्रत्याशी भी हार जाते हैं।
बंगाल में इस बार बीजेपी हर दांव आजमा रही है। ममता बनर्जी के लिए हर फ्रंट पर मुश्किलें खड़ी कर रही है। ईडी की एंट्री करवा दी है। एसआईआर चल ही रहा है। और धार्मिक विभाजन के लिए वहां बाबरी मस्जिद बनवाने और हिजाबी महिला के प्रधानमंत्री बनने की जज्बाती राजनीति की शुरूआत करवा दी गई है।
बिहार में तो केवल 18 प्रतिशत ही मुस्लिम वोट थे। बंगाल में इससे लगभग दो गुने हैं। वहां इस समय 44 मुस्लिम विधायक हैं। मगर इससे बहुत ज्यादा संख्या में वहां मुस्लिम धर्मनिरपेक्ष दलों को जिनमें इस समय वहां टीएमसी ही प्रमुख है, चुनाव जितवाता है।
हुमायूं कबीर जो वहां बाबरी मस्जिद के नाम पर राजनीति कर रहे हैं और ओवैसी जो अभी तो हिजाबी मुस्लिम महिला को प्रधानमंत्री बनाने की बात कर रहे हैं चुनाव आने तक कोई आश्चर्य नहीं करना कि वे बंगाल में हिजाबी मुख्यमंत्री की बात न करने लगें।
प्रधानमंत्री दूर की चीज है। बंगाल में महिला मुख्यमंत्री हैं तो यहां हिजाबी मुख्यमंत्री का नारा ज्यादा चलेगा!
सावधान ममता को या दूसरे धर्मनिरपेक्ष दलों को नहीं रहना है। वे तो अपने सिद्धांतों पर रहेंगे होशियार मुस्लिम को रहना होगा। जिन्ना की इसी तरह की राजनीति ने उसे बहुत नुकसान पहुंचाया है। और जो पाकिस्तान जिन्ना ने बनाया वह पूरी तरह एक फेल्ड स्टेट (असफल राष्ट्र) में तबदील हो चुका है। तरक्की के मामले में वह भारत के मुकाबले कहीं नहीं है।
भारत का मुसलमान हमेशा से धर्मनिरपेक्ष नेताओं को ही अपना नेता मानता रहा है। पहले नेहरू को माना फिर मुलायम, लालू, ममता बनर्जी जैसे क्षेत्रीय दलों के नेताओं के साथ भी गया। लेकिन अब ओवैसी नया शिगुफा लाए हैं। मुसलमानों को अपनी कयादत खड़ी करना होगी। 15-16 प्रतिशत आबादी अपनी कयादत खड़ी करके क्या करेगी? वही हाल होगा जो अभी बिहार में हुआ। न कयादत खड़ी होगी न दूसरे धर्मनिरपेक्ष दल जीत पाएंगे। न खुदा ही मिला न विसाले सनम वाली हालत हो जाएगी।
बंगाल के साथ अभी असम और केरल में भी चुनाव हैं। वहां भी बंगाल की तरह मुस्लिम विधायकों की संख्या अच्छी खासी है। दोनों जगह 32-32 विधायक हैं। इनके साथ तमिलनाडु में भी चुनाव हैं वहां 6 हैं। और पुडुचेरी में एक।
हवा सब जगह एक साथ चलेगी। मीडिया इसे और बढ़ाएगा। रोकना केवल मुस्लिम के हाथ में है। जज्बातों में नहीं बहना। जो इशु बेरोजगारी, महंगाई, सरकारी शिक्षा, सरकारी चिकित्सा उसके हिन्दू भाइयों के हैं वही उसके भी। हिजाबी प्रधानमंत्री और हिजाबी मुख्यमंत्री कोई इशु नहीं हैं। यह जबर्दस्ती बनाया जा रहा इशु है। भावनाओं को भड़काने के लिए।
मुस्लिम को बहुत सावधान रहने की जरूरत है। भाजपा की हिन्दू-मुस्लिम राजनीति को अब हिन्दू नकार रहा है। बहुत नुकसान उठा लिया उसने। सरकारी नौकरी खत्म हो गईं। उसके बच्चे बेरोजगार घूम रहे हैं। इसलिए अब दांव मुस्लिम पर लगाया जा रहा है कि वह जज्बाती इशु को हवा देगा ताकि फिर हिन्दुओं को भी उसी लाइन पर वापस लाया जाए। साम्प्रदायिक राजनीति खत्म होना हिन्दू मुसलमान दोनों के हित में है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार है)