भारत-अमेरिका व्यापार समझौता : क्या 'श्वेेत क्रांति' की आड़ में 'जीएम फसलों' का पिछला दरवाजा खुल रहा है?
कपास के किसानों का उदाहरण हमारे सामने है, जहां आयात शुल्क हटाने से घरेलू कीमतों में भारी गिरावट आई और किसान संकट में घिर गए
- नीलेश देसाई
कपास के किसानों का उदाहरण हमारे सामने है, जहां आयात शुल्क हटाने से घरेलू कीमतों में भारी गिरावट आई और किसान संकट में घिर गए। सोयाबीन और मक्का के साथ भी यही दोहराए जाने की आशंका है। अमेरिका व्यापार समझौता आर्थिक विकास के द्वार खोल सकता है, लेकिन यह द्वार भारतीय किसानों की कब्र पर नहीं खुलना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि 'कृषि सुरक्षा' का दावा केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित न रहे।
हाल ही में भारत और अमेरिका के बीच हुए 'अंतरिम व्यापार समझौते' को लेकर देश के नीतिगत गलियारों में उत्साह का माहौल है। 2026 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य निश्चित रूप से महत्वाकांक्षी है। लेकिन, इस आर्थिक चमक-धमक के पीछे भारतीय कृषि क्षेत्र की एक गहरी चिंता छिपी है। आशा-किसान स्वराज जैसे संगठनों और कृषि विशेषज्ञों ने इस समझौते के उन प्रावधानों पर सवाल उठाए हैं जो भारत की खाद्य संप्रभुता और करोड़ों किसानों की आजीविका को सीधे प्रभावित कर सकते हैं। सवाल यह है कि क्या अमेरिका के साथ व्यापारिक संतुलन बनाने के चक्कर में हम अपने कृषि क्षेत्र की 'रेड लाइन्स' को धुंधला कर रहे हैं?
व्यापारिक असमानता और सब्सिडी का मायाजाल
इस समझौते का सबसे विवादास्पद पहलू है- 'डिस्टिलर्स ड्राइड ग्रेंस विद सोल्यूबल्स' (DDGS), लाल सोरघम और सोयाबीन तेल के आयात की अनुमति। पहली नज़र में यह एक सामान्य व्यापारिक लेन-देन लग सकता है, लेकिन गहराई से देखने पर यह भारतीय किसानों के लिए एक 'अन्यायपूर्ण युद्ध' जैसा है।
ओईसीडी (OECD) की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिकी किसानों को उनकी सरकार से +7.1त्न की सकारात्मक सहायता (PSE) मिलती है, जबकि भारतीय किसानों के लिए यह आंकड़ा -14.5प्रतिशत (नकारात्मक) है। इसका अर्थ है कि अमेरिकी किसान भारी सरकारी सब्सिडी के कारण अपने उत्पादों को वैश्विक बाजार में कौड़ियों के भाव बेच सकते हैं। जब अमेरिका का यह सब्सिडी वाला 'सस्ता चारा' भारतीय बाजार में आएगा, तो महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान के उन लाखों सोयाबीन और मक्का उत्पादकों का क्या होगा, जिनकी फसल पहले ही एमएसपी (MSP) से 25-26प्रतिशत नीचे बिक रही है?
जीएम (त्ररू) फसलों का 'चोर दरवाजा'
इस पूरे विवाद का सबसे तकनीकी और स्वास्थ्य से जुड़ा मुद्दा 'जेनेटिकली मॉडिफाइड' (GM) फसलों का है। अमेरिका में उत्पादित होने वाला लगभग 90-95प्रतिशत मक्का और सोयाबीन जीएम आधारित है। भारत ने अब तक अपनी खाद्य सुरक्षा और जैव-विविधता के मद्देनजर जीएम खाद्य फसलों को अनुमति नहीं दी है।
लेकिन, इस व्यापार समझौते की शब्दावली में 'गैर-टैरिफ बाधाओं को दूर करने' की बात कही गई है। यह सीधे तौर पर भारत के उन सख्त नियमों पर हमला है जो जीएम आयात के लिए 'नॉन-जीएम ओरिजिन' सर्टिफिकेट की मांग करते हैं। सरकार का यह तर्क कि 'प्रोसेसिंग के बाद जीएम का प्रभाव खत्म हो जाता है,' वैज्ञानिक रूप से संदिग्ध है। अंतरराष्ट्रीय शोध बताते हैं कि जीएम डीएनए के अंश प्रसंस्कृत तेलों और पशु आहार में बने रह सकते हैं। यदि हमारे मवेशी जीएम-आधारित चारा (DDGS) खाएंगे, तो वही जीएम तत्व दूध और मांस के माध्यम से सीधे भारतीय नागरिकों की थाली तक पहुंचेंगे। यह बिना किसी लेबलिंग या सुरक्षा जांच के भारत में 'जीएम भोजन' को वैध बनाने जैसा है।
अमूल का विरोधाभास: कॉरपोरेट लाभ बनाम किसान हित-देश की सबसे बड़ी डेयरी सहकारी संस्था 'अमूल' (GCMMF) ने इस समझौते का स्वागत किया है। अमूल के लिए यह एक रणनीतिक जीत है क्योंकि वह अब अमेरिका में स्थानीय स्तर पर उत्पादन कर रही है और कोस्टको (Costco) जैसे बड़े स्टोरों में अपनी जगह बना रही है। लेकिन यहां एक बड़ा 'हितों का टकराव' (Conflict of Interest) उभरता है।
अमूल को अपने ग्लोबल विस्तार के लिए सस्ता कच्चा माल चाहिए। अमेरिकी चारा और इनपुट्स सस्ते हैं, जिससे अमूल का 'प्रॉफिट मार्जिन' तो बढ़ेगा, लेकिन वह उन भारतीय किसानों की कीमत पर होगा जो अमूल को पारंपरिक चारा और मक्का सप्लाई करते थे। एक सहकारी संस्था का लक्ष्य अपने सदस्य किसानों का कल्याण होता है, लेकिन जब वह एक वैश्विक कॉरपोरेट की तरह व्यवहार करने लगे, तो छोटे किसानों की सुरक्षा का कवच कमजोर होने लगता है।
उपभोक्ता की अनदेखी और 'परोक्ष मिलावट'
आज का भारतीय उपभोक्ता दूध में यूरिया और डिटर्जेंट जैसी मिलावट को लेकर तो जागरूक है, लेकिन वह उस 'साइलेंट एडल्टरेशन' (परोक्ष मिलावट) से अनजान है जो पशुओं के चारे के माध्यम से आ रही है। अगर दूध देने वाले पशुओं को जेनेटिकली मॉडिफाइड और कीटनाशकों से लदा चारा खिलाया जाएगा, तो दूध की शुद्धता केवल एक कागजी दावा बनकर रह जाएगी। क्या भारतीय उपभोक्ताओं को यह जानने का हक नहीं है कि वे जिस दूध या घी का सेवन कर रहे हैं, उसका मूल स्रोत (Origin) क्या है?
खाद्य सुरक्षा और राष्ट्रीय संप्रभुता-कृषि केवल एक व्यापारिक वस्तु नहीं है; यह भारत के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है। अगर हम आज सस्ते आयात के लालच में अपने मक्का, सोयाबीन और कपास किसानों को हतोत्साहित करते हैं, तो कल हम अपनी खाद्य जरूरतों के लिए पूरी तरह से अंतरराष्ट्रीय बाजार (विशेषकर अमेरिका) पर निर्भर हो जाएंगे। इतिहास गवाह है कि खाद्य निर्भरता अंतत: राजनीतिक निर्भरता में बदल जाती है।
कपास के किसानों का उदाहरण हमारे सामने है, जहां आयात शुल्क हटाने से घरेलू कीमतों में भारी गिरावट आई और किसान संकट में घिर गए। सोयाबीन और मक्का के साथ भी यही दोहराए जाने की आशंका है।
अमेरिका व्यापार समझौता आर्थिक विकास के द्वार खोल सकता है, लेकिन यह द्वार भारतीय किसानों की कब्र पर नहीं खुलना चाहिए। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि 'कृषि सुरक्षा' का दावा केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस तक सीमित न रहे।
सख्त लेबलिंग कानून: यदि जीएम-आधारित उत्पाद आयात होते हैं, तो उन पर स्पष्ट लेबल होना चाहिए। समान अवसर (Level Playing Field): जब तक भारतीय किसानों को अमेरिकी किसानों के बराबर सब्सिडी या समर्थन नहीं मिलता, तब तक शुल्क मुक्त आयात को रोकना चाहिए।
वैज्ञानिक पारदर्शिता: जीएम चारे के दूध और मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दीर्घकालिक प्रभावों की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए।
अंतत: विकास वही है जो अंतिम पायदान पर खड़े किसान को खुशहाल बनाए। अगर व्यापारिक समझौते हमारी खेती को कमजोर करते हैं, तो ऐसे समझौतों पर पुनर्विचार करना अनिवार्य है।
(लेखक जमनालाल बजाज पुरस्कार से सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ता हैं।)