लद्दाख में हिम तेंदुआ बचाने की पहल

लद्दाख में हिम तेंदुआ को बचाने की शुरूआत दो दशक पहले हुई थी।;

Update: 2026-10-09 22:08 GMT
  • बाबा मायाराम

कुछ साल पहले मुझे भी एक गांव के होमस्टे में ठहरने का मौका मिला था। यह गांव पहाड़ियों से घिरा था। कल कल झरने बह रहे थे, इसके पानी से लोग सब्जियां उगाते थे। ताजी व जैविक सब्जियां हमें भोजन में परोसी गईं थीं। यहां की महिलाएं अपने हाथ से स्वेटर, शाल, बैग आदि भी बनाती थीं। पिछले कुछ सालों में लद्दाख में पर्यटन काफी बढ़ा है और यहां की अधिकांश आबादी पर्यटन आधारित आजीविका पर आश्रित है।

लद्दाख में हिम तेंदुआ को बचाने की शुरूआत दो दशक पहले हुई थी। सबसे पहले हिम तेंदुआ व वन्य जीवों के संरक्षण के लिए एक ट्रस्ट बनाया गया था। इसका नाम द स्नो लेपर्ड कंजरवेंसी इंडिया ट्रस्ट (एसएलसी-आईटी) है, जो वर्ष 2003 में बना था। यह ट्रस्ट प्रकृति व हिम तेंदुआ के संरक्षण में जुटा हुआ है। यह ट्रस्ट स्थानीय लोगों के साथ मिलकर लुप्त होती प्रजाति हिम तेंदुआ को बचाने में लगा है।

यह हिमालय की उन पहली संस्थाओं में से एक है, जिसने वन्य जीवों के साथ समुदायों की आजीविका संरक्षण का काम किया है। यह संस्था प्रकृति संरक्षण, वन्य जीवों के संरक्षण और समुदाय की आजीविका की रक्षा के कार्यक्रम संचालित कर रही है, जो आर्थिक रूप से व्यावहारिक और टिकाऊ हैं, और सामाजिक रूप से जिम्मेदार भी हैं। हिम तेंदुआ, बिल्ली प्रजाति की एक शिकारी प्रजाति है। पर्वतों की चोटी पर पाई जाने वाली इस प्रजाति के संरक्षण को संस्था ने प्राथमिकता दी है, जिसे संस्था समग्रता में देखती है।

डॉ. सेवांग नामग्याल बताते हैं कि हिम तेंदुआ एक मनोहारी प्रजाति है, पर इसका पशुपालक किसानों के साथ संघर्ष होता रहा है। उन्हें पशुओं को बाड़े में सुरक्षित रखना और उनकी परवरिश करने में चुनौती आती रही है। इस कारण इसमें कई स्तरों पर काम करने की जरूरत थी। जैसे पहले हिम तेंदुआ को शिकार से बचाना, उसके पर्यावास को बचाना, यानी उन पर्वत चोटियों की भी रक्षा करना, जहां वह विचरण करता और रहता है, फिर हिम तेंदुआ से लोगों के पशुओं की भी रक्षा करना, यानी लोगों की आजीविका की भी रक्षा करना। संस्था ने इन सभी स्तरों पर काम किया। सबसे पहले लोगों को जागरूक किया। कई पशुपालक किसानों को तार-जाल देकर उनके बाड़े की सुरक्षा की, जिससे हिम तेंदुओं से उनके पशुओं की रक्षा की सके।

वे आगे बताते हैं कि हिम तेंदुआ और मनुष्य के सहअस्तित्व को प्रोत्साहित करना हमारा प्रमुख उद्देश्य है। यह प्रकृति व मनुष्य के अस्तित्व के लिए भी जरूरी है। अगर हिम तेंदुआ नहीं रहेंगे, तो ज्यादा वन्य-जीव बढ़ जाएंगे, अगर ज्यादा वन्य जीव बढ़ जाएंगे तो घास-फूस की कमी हो जाएगी, और जब घास-फूस की कमी हो जाएगी तो पालतू जानवरों को चारा नहीं मिल पाएगा, मिट्टी का क्षरण हो जाएगा और गांव में बाढ़ का खतरा बढ़ जाएगा, इससे पूरा इलाका रेगिस्तान बन जाएगा, जिससे खेती नहीं हो पाएगी, इससे लोगों की खाद्य सुरक्षा में कमी आएगी। इसलिए हिम तेंदुआ का रहना सबके लिए और उसके खुद के लिए भी जरूरी है। मनुष्य के लिए भी और प्रकृति के लिए भी और पर्यटन के लिए भी। हर प्रजाति की प्रकृति में अपनी भूमिका है, इसे समझने की जरूरत है।

वे बताते हैं कि इसके लिए संस्था ने कई स्तरों पर कार्यक्रम शुरू किए हैं। एक तो किसानों के साथ मिलकर पशुओं की रक्षा करने के लिए बाड़े बनवाए हैं। इसके लिए तार-जाल दिए हैं, जिससे बाड़े की छत को ढक सकें, और पालतू पशु सुरक्षित रह सकें। दूसरी तरफ होमस्टे जैसे कार्यक्रमों से लोगों की आमदनी बढ़ाने में मदद की है।

कुछ साल पहले मुझे भी एक गांव के होमस्टे में ठहरने का मौका मिला था। यह गांव पहाड़ियों से घिरा था। कल कल झरने बह रहे थे, इसके पानी से लोग सब्जियां उगाते थे। ताजी व जैविक सब्जियां हमें भोजन में परोसी गईं थीं। यहां की महिलाएं अपने हाथ से स्वेटर, शाल, बैग आदि भी बनाती थीं।

पिछले कुछ सालों में लद्दाख में पर्यटन काफी बढ़ा है और यहां की अधिकांश आबादी पर्यटन आधारित आजीविका पर आश्रित है। गर्मी में ये लोग पर्यटन की गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं। इसलिए जरूरी है कि स्थानीय युवा और वयस्क यहां की समृद्ध जैव विविधता से अवगत हों और इसमें पर्यटकों का मार्गदर्शन कर सकें।

संस्था की एक कार्यकर्ता ने बतलाया था कि शुरूआत में एसएलसी-आईटी और कल्पवृक्ष ने मिलकर संयुक्त रूप से कुछ स्कूलों में पर्यावरण शिक्षा कार्यक्रम चलाया था। एसएलसी-आईटी ने इस काम को जारी रखा है। अब इस कार्यक्रम का विस्तार काफी सारे स्कूलों में हो गया है। इसके तहत प्रतिभागियों को हिम तेंदुआ, वन्य-जीव, पेड़-पौधों और स्थानीय पशु-पक्षियों के बारे में जानकारी दी जाती है। इसके लिए कई स्कूलों में प्रतिवर्ष कार्यशालाएं आयोजित की जाती हैं। हर कार्यशाला एक या दो दिन की होती है। कार्यशाला गर्मी की छुट्टी में होती हैं। इस कार्यशाला में शैक्षणिक सामग्री के रूप में पोस्टर, पर्चे, पुस्तिकाओं का इस्तेमाल किया जाता है जिसे कल्पवृक्ष और उनकी संस्था ने मिलकर तैयार किया है। बच्चों को फील्ड विजिट पर भी ले जाया जाता है, जिससे वे सीधे प्रकृति से जुड़कर सीख सकें।

कुल मिलाकर, इस पूरी पहल के बारे में कुछ बातें कही जा सकती हैं। इससे हिम तेंदुआ। वन्य जीव व प्रकृति के संरक्षण के साथ समुदायों की आजीविका की भी रक्षा हो रही है। बड़े पैमाने पर हिम तेंदुआ को मारने की समस्या पर रोक लगी है और मनुष्य व जानवर में संघर्ष में भी कमी आई है। हिम तेंदुआ के प्रति व्यवहार में परिवर्तन आया है, अब वह विनाशकारी जानवर से पर्यटन के लिए आकर्षण का केन्द्र बन गया है। इससे निष्कर्ष रूप में यह कहा सकता है कि वन्य जीवों की सुरक्षा व संरक्षण स्थानीय समुदायों की भागीदारी से की जा सकती है, जो लद्दाख की इस पहल ने कर दिखाया है। विशेषकर, पहाड़ी इलाकों के संदर्भ में यह पहल और भी महत्वपूर्ण व जरूरी हो जाती है, क्योंकि पहाड़ों में सीधे निगरानी करना संभव नहीं होता, यहां तो स्थानीय समुदाय ही निगरानी व संरक्षण कर सकते हैं।

आज जब लद्दाख में पर्यटन बड़े पैमाने पर शुरू हो रहा है, बड़ी संख्या में पर्यटक आ रहे हैं, तब यह भी ख्याल रखा जाना चाहिए कि इससे वन्य जीव, जैव विविधता व स्थानीय पर्यावरण का नुकसान न हो, स्थानीय समुदायों की आजीविका की रक्षा हो। युवाओं को नेचर गाइड का प्रशिक्षण दिया गया है, जिससे उन्हें रोजगार से जोड़ा जा सके और वे पलायन न करें। कुल मिलाकर, यह पहल महिला, युवा और स्थानीय समुदायों के सशक्तीकरण का भी अच्छा उदाहरण है।

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