भारत का चुनावी संकट अब ले रहा सर्वोच्च न्यायालय की परीक्षा
सर्वोच्च न्यायालय अब उस स्थिति में है जहां से वे जवाब सबसे विश्वसनीय रूप से सामने आ सकते हैं;
- के रवींद्रन
सर्वोच्च न्यायालय अब उस स्थिति में है जहां से वे जवाब सबसे विश्वसनीय रूप से सामने आ सकते हैं। ज़रूरी बात यह नहीं है कि एक पक्ष को दूसरे पक्ष से बचाया जाए, बल्कि यह है कि मतदाता सूची को लेकर होने वाले विवाद को इस बात के झगड़े में बदलने से रोका जाए कि क्या लोकतांत्रिक रेफरी पर अब भी भरोसा किया जा सकता है?
रत की चुनाव प्रणाली अब ऐसी स्थिति में पहुंच गयी है जहां बहस सिर्फमतदाता सूची में गलतियों तक सीमित नहीं है। ज़्यादा अहम सवाल यह है कि क्या नागरिक उस संवैधानिक संस्था पर भरोसा बनाए रख सकते हैं, जिसे यह तय करने की ज़िम्मेदारी दी गई है कि सूची में कौन शामिल होगा, नाम कैसे हटाए जाएंगे और क्या इस प्रक्रिया के नियम निष्पक्ष रूप से लागू किए जा रहे हैं?
चुनाव आयोग के दावों के बावजूद, भारतीय की जनता के साथ धोखाधड़ी करने के आरोप ज़्यादा विश्वसनीय लग रहे हैं। मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) से जुड़े घटनाक्रमों ने इस विवाद को महज़ एक आम पक्षपाती शिकायत मानकर खारिज करना मुश्किल बना दिया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने मई में फैसला सुनाया था कि चुनाव आयोग के पास भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 और जन प्रतिनिधित्व अधिनियम के तहत बिहार में एसआईआर करने का अधिकार है। इसलिए, यह फैसला इस बात का समर्थन नहीं करता कि एसआईआर अपने आप में असंवैधानिक है। लेकिन असली मुद्दा अब इस बात पर आ गया है कि उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे किया गया, नाम हटाने को लेकर क्या सुरक्षा उपाय अपनाए गए, और क्या आयोग के फैसले एक बहु-सदस्यीय संवैधानिक संस्था के लिए ज़रूरी सामूहिक प्रक्रिया के ज़रिए लिए गए थे?
एसआईआर के साथ-साथ एक और अनसुलझा संस्थागत मुद्दा भी चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय की एक बेंच ने गत सितंबर माह में बंटा हुआ फ़ैसला सुनाया था कि क्या मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को चुनौती देने वाले मामलों को संविधान पीठ के पास भेजा जाना चाहिए। उस कानून ने चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय मंत्री को शामिल कर दिया, जिससे चयन करने वालों में प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और नामित मंत्री शामिल हो गए। मामला अगले प्रक्रियात्मक कदम के लिए मुख्य न्यायाधीश के पास भेजा गया है। कुल मिलाकर, ये विवाद चुनावी वैधता के तीन चरणों से जुड़े हैं: रेफरी की नियुक्ति कौन करता है, रेफरी फै़सले कैसे लेते हैं और जिनकी देखरेख में चुनाव हो रहा है, उसमें कौन हिस्सा ले सकता है।
सड़कों पर इसके राजनीतिक नतीजे पहले ही दिखने लगे हैं। युवाओं के नेतृत्व वाली 'कॉकरोच जनता पार्टी' ने मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफ़े की मांग को लेकर विरोध-प्रदर्शन शुरू कर दिया है, जबकि विपक्षी राजनीतिक पार्टियां, सामाजिक संगठन और छात्र समूह प्रदर्शनों में शामिल हुए हैं। दिल्ली में विरोध प्रदर्शनों के दौरान सैकड़ों लोगों को हिरासत में लिया गया और आगे और लामबंदी की घोषणा की गई है। चुनाव आयोग उन आरोपों को खारिज करता है कि उसके कार्यों का उद्देश्य सत्ताधारी भाजपा को लाभ पहुंचाना था, जबकि प्रदर्शनकारी और विपक्षी दल ठीक ऐसे ही पक्षपाती परिणामों का आरोप लगाते हैं।
उन विरोध प्रदर्शनों को आरोपों के सुबूत के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। न ही जन आक्रोश को संवैधानिक फैसले का विकल्प माना जाना चाहिए। उनका महत्व कहीं और है: वे दिखाते हैं कि क्या होता है जब प्रशासनिक प्रक्रिया पर बहस लोकतांत्रिक वैधता के विवाद में बदल जाती है।
संवैधानिक प्रणाली में अभी भी ऐसे रास्ते हैं जिनसे विवाद को सुलझाया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय रिकॉर्ड मांग सकता है, जांच कर सकता है कि क्या कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था, आयोग के भीतर असहमति के कानूनी महत्व को निर्धारित कर सकता है, पात्र मतदाताओं को गलत तरीके से बाहर किए जाने से बचा सकता है और उल्लंघन साबित होने पर उपाय बता सकता है। इनमें से किसी के लिए भी न्यायालय को संविधान को फिर से बनाने की आवश्यकता नहीं है। इसके लिए उन परिस्थितियों में न्यायिक समीक्षा के कठोर अनुप्रयोग की आवश्यकता है जिनके लिए संविधान को बनाया गया था।
अधिक खतरा तब पैदा होगा जब आधिकारिक जवाब आने से पहले ही आम संवैधानिक उपायों पर जनता का भरोसा खत्म हो जाए। एक बार जब नागरिक यह निष्कर्ष निकाल लेते हैं कि चुनाव चुनावी प्रशासन में विफलताओं को ठीक नहीं कर सकते क्योंकि चुनाव कराने वाली मशीनरी ही विश्वसनीय जांच से परे है, तो विवाद गोल-गोल घूमने लगता है। राजनीतिक प्रतिस्पर्धा अब बहस को सुलझा नहीं सकती क्योंकि राजनीतिक प्रतिस्पर्धा की वैधता ही बहस का विषय है।
भारत उस बिंदु पर नहीं पहुंचा है जहां बड़े पैमाने पर विद्रोह ही एकमात्र विकल्प हो। अदालतें काम कर रही हैं, याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है, चुनाव आयोग आलोचना का जवाब दे रहा है और शांतिपूर्ण विरोध लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति का हिस्सा बना हुआ है। इसलिए, संवैधानिक उपायों के खत्म हो जाने की घोषणा करना तथ्यों से आगे की बात होगी।
लेकिन मौजूदा टकराव में छिपी चेतावनी को कम करके नहीं आंका जाना चाहिए। चुनावी लोकतंत्र आखिरकार कानूनों, मशीनों या मतदाता डेटाबेस की तुलना में अधिक नाजुक चीज पर टिका होता है। यह इस विश्वास पर टिका होता है कि हारने वाले को लगता है कि मुकाबला ईमानदारी से आयोजित किया गया था और मतदाता को लगता है कि भाग लेने का अधिकार किसी अपारदर्शी प्रक्रिया से गायब नहीं हो सकता।
वह भरोसा अब असामान्य दबाव में है। इसे बहाल करने के लिए चुनौती का सामना कर रही संस्था के आश्वासनों और उसके राजनीतिक विरोधियों के आरोपों से कहीं अधिक की आवश्यकता है। इसके लिए स्वतंत्र जांच में टिकने वाले तथ्यों और राजनीतिक विभाजन के पार अधिकार रखने वाले संवैधानिक जवाबों की आवश्यकता है।
सर्वोच्च न्यायालय अब उस स्थिति में है जहां से वे जवाब सबसे विश्वसनीय रूप से सामने आ सकते हैं। ज़रूरी बात यह नहीं है कि एक पक्ष को दूसरे पक्ष से बचाया जाए, बल्कि यह है कि मतदाता सूची को लेकर होने वाले विवाद को इस बात के झगड़े में बदलने से रोका जाए कि क्या लोकतांत्रिक रेफरी पर अब भी भरोसा किया जा सकता है?