ललित सुरजन की कलम से आम चुनाव और एन.जी.ओ.

'भारत जैसे देश में जहां अभी समग्र व समावेशी विकास के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है;

By :  DB Desk
Update: 2026-09-23 21:10 GMT

'भारत जैसे देश में जहां अभी समग्र व समावेशी विकास के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है स्वाभाविक रूप से एन.जी.ओ. सेक्टर व्यापक स्तर पर अपनी भूमिका निभा रहा है। यह दिलचस्प तथ्य है कि देश के अनेकानेक राजनेताओं ने, भले ही वे किसी भी पार्टी से संबंध रखते हों, अपनी पहल पर ऐसे कई संगठन स्थापित कर लिए हैं।

इस मामले में सरकारी अधिकारी भी पीछे नहीं हैं। इसका एक कारण तो यह हो सकता है कि अपने एन.जी.ओ. के माध्यम से ये लोग ''इस हाथ दे उस हाथ ले'' की उक्ति को चरितार्थ कर रहे हों। हम ऐसे कई फर्जी एन.जी.ओ. के बारे में जानते हैं जो सत्ताधीशों द्वारा स्थापित किए गए हैं और सरकार से किसी न किसी कार्यक्रम के नाम पर भरपूर मदद ले लेते हैं। यह एक अलग किस्सा है।

अभी तो हमारी दिलचस्पी यह जानने में है कि व्यवस्था के औपचारिक ढांचे से बाहर पांचवें खंभे के रूप में अपनी पहचान बनाने वाले एन.जी.ओ. कार्यकर्ता एकाएक पहला खंभा बनने के लिए बेताब क्यों हो उठे हैं याने वे चुनावी मैदान में क्यों कूद पड़े हैं?'

(देशबन्धु में 10 अप्रैल 2014 को प्रकाशित)

https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/04/blog-post_9.html

Tags:    

Similar News