ललित सुरजन की कलम से - आत्मकथा लिखना आसान नहीं
'आत्मकथा लिखना किसी भी तरह से आसान नहीं है। यूं तो हर व्यक्ति के पास कहने के लिए कुछ न कुछ तो होता है और हरेक को एक छोटे दायरे में पाठक या श्रोता मिल जाते हैं
'आत्मकथा लिखना किसी भी तरह से आसान नहीं है। यूं तो हर व्यक्ति के पास कहने के लिए कुछ न कुछ तो होता है और हरेक को एक छोटे दायरे में पाठक या श्रोता मिल जाते हैं, लेकिन अधिकतर आत्मकथाओं के अंत में हासिल आया शून्य की स्थिति ही बनती है।
कहने के लिए आत्मकथा एक व्यक्ति के निज जीवन की कथा होती है, लेकिन कुएं के मेंढक के जीवन के बारे में किसी की भी दिलचस्पी भला क्यों होना चाहिए? मेरे कहने का आशय है कि किसी व्यक्ति की जीवनगाथा का महत्व तभी है जब एक विराट फलक पर उसे उकेरने के लिए थोड़ी सी जगह मिल गई हो या मिलने की संभावना हो।
आकाश की नि:सीमता में सूर्य तो एक ही होता है, लेकिन एक छोटे से तारे की टिमटिमाहट के बिना आकाश का काम नहीं चलता। अगर आत्मकथा में वह क्षीण चमक भी न हो तो निरर्थक है।'
(अक्षर पर्व सितम्बर 2014 में प्रकाशित प्रस्तावना)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2014/09/blog-post_83.html