ललित सुरजन की कलम से - आज़ादी और अराजकता
असल में हमारा जो संविधान है, उसमें हमने एक समाजवादी राज्य की संरचना का, कल्याणकारी राज्य की सरंचना का संकल्प लिया है। हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्व यही कहते हैं
असल में हमारा जो संविधान है, उसमें हमने एक समाजवादी राज्य की संरचना का, कल्याणकारी राज्य की सरंचना का संकल्प लिया है। हमारे संविधान के नीति निर्देशक तत्व यही कहते हैं।
पिछले करीब तीस-पैंतीस सालों में धीरे-धीरे एक प्रकार का नव-साम्राज्यवाद उभरा है, नव-पूंजीवाद की प्रवृत्तियां उभरी हैं। इसमें टेक्नोलॉजी का बहुत बड़ा योगदान है, जिसके कारण संचार के साधन विकसित हुए और यातायात के साधन सुलभ हुए। इस सबके चलते हुआ यह है कि पूंजी का कब्जा समाज में बढ़ता ही चला जा रहा है। इसके अलावा समाज जिस सरकार को चुन रहा है, उस पर भी इसका प्रभाव बढ़ रहा है।
मेरा मानना है कि इंदिरा गांधी का जो द्वितीय कार्यकाल था, उस समय इसकी थोड़ी-सी शुरूआत हो गई थी। राजीव गांधी के कार्यकाल में यह प्रवृत्ति और बढ़ी। वीपी सिंह, नरसिम्हा राव, वाजपेयी, यूपीए-1 और यूपीए-2 के समय में यह उत्तरोत्तर बढ़ती ही गई।
यूपीए के समय इतना जरूर था कि चूंकि किसी कोने-अंतरे में गांधी-नेहरू की कांग्रेस की थोड़ी बहुत छाया बची हुई थी तो किसानों की ऋण माफी जैसे कुछ काम उस समय हो गए, लेकिन कुल मिलाकर नव-पूंजीवाद से वह सरकार प्रभावित थी और उसी के अनुसार नीतियां बनाई गईं। वर्तमान सरकार भी उसी रास्ते पर चल रही है।
(देशबन्धु में 14 अगस्त 2016 को प्रकाशित)
https://lalitsurjan.blogspot.com/2016/08/blog-post_13.html