ललित सुरजन की कलम से - प्रकृति से प्यार की एक पुस्तक
'सुरेन्द्र तिवारी भारत में अंडमान निकोबार तक जाते हैं तो सात समुंदर पार सुदूर उत्तर में अलास्का भी हो आते हैं
'सुरेन्द्र तिवारी भारत में अंडमान निकोबार तक जाते हैं तो सात समुंदर पार सुदूर उत्तर में अलास्का भी हो आते हैं। वे देश के भीतर कतरनिया घाट की यात्रा करते हैं तो अमेरिका का यलोस्टोन नेशनल पार्क भी उन्हें अपनी ओर खींच लेता है। ऐ
सा सैलानी अफ्रीका न जाए, ऐसा हो ही नहीं सकता तो वे केन्या-तंजानिया में सेंरगेटी और मसाईमारा अभ्यारण्य के भी अनुभव हासिल करते हैं। इन सारे विवरणों में जो विशेष बात है वह यह कि इनकी भाषा कवि सुलभ है।
लेखक स्वयं अपने विचार आलंकारिक शब्दावली में व्यक्त करता है और उसे जहां भी उचित लगता है वहां अन्यों से उद्धरण लेने में संकोच नहीं करता। मिसाल के तौर पर एक जगह वह देश के जाने-माने बाघ विशेषज्ञ बिली अर्जुनसिंह का कथन दोहराता है- वन्य प्राणियों के लिए कोई स्वर्ग या नरक नहीं होता सिवाय उसके जिसे मनुष्य ने बनाया है। वह पक्षी वन में जाता है तो इन शब्दों में अपने भाव व्यक्त करता है- 'परिंदे अब भी पर तौले हुए हैं, हवा में सनसनी घोले हुए हैं।'
(अक्षर पर्व फ़रवरी 2015 अंक की प्रस्तावना )
https://lalitsurjan.blogspot.com/2015/01/blog-post_30.html