फासीवाद भैया तेजी से आयी
नये साल, 2026 में फासीवाद के आगमन की रफ्तार और तेज होती लगती है
नये साल, 2026 में फासीवाद के आगमन की रफ्तार और तेज होती लगती है। कम से कम नये साल के पहले दस-बारह दिनों को देखकर, तो आसार ऐसे ही नजर आ रहे हैं।
सब सेे पहले सर (एसआइआर) यानी मतदाता सूचियों के सघन पुनरीक्षण की सुर्खियों से शुरू कर सकते हैं। सर ही सबसे पहले इसलिए कि इसका सीधा संबंध मताधिकार से बल्कि ठीक-ठीक कहें तो मताधिकार के छीने जाने की हद और उसके स्वरूप से है। और मताधिकार गायब, तो चुनाव भी गायब। और चुनाव ही तो वह आखिरी पर्दा है, जो फासीवादी चेहरे को खुलकर सामने आने से रोकता है। और सर के सिलसिले में नये साल की सबसे बड़ी सुर्खी तो यही है कि उत्तर प्रदेश में ही मसौदा मतदाता सूची में पूरे 2 करोड़ 89 लाख मतदाताओं के नाम कट चुके हैं। यह संख्या उन मतदाताओं की है, जिनके नाम पिछले ही साल इसी राज्य में और इसी चुनाव आयोग के दिशा-निर्देशन में संशोधित की गयी मतदाता सूचियों में मौजूद थे और जो 2024 के आम चुनाव में भी मतदाता था, जिसके नतीजे से नरेंद्र मोदी तीसरे कार्यकाल में सरकार चला रहे हैं।
वैसे तो उत्तर प्रदेश का मामला अन्य दसेक राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों से खास अलग भी नहीं है, जहां भी अब तक सर नाम की इस प्रक्रिया के पांव पड़े हैं। जैसाकि योगेंद्र यादव समेत इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए अधिकांश विश्लेषणकर्ता शुरूआत से ही कहते आ रहे हैं, इस प्रक्रिया को गढ़ा ही इस प्रकार गया है कि यह मतदाताओं की छंटनी का ही काम करती है। वास्तव में ठीक ऐसा ही होने के डर से, अपवादस्वरूप असम को सर की प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखते हुए, वहां मतदाता सूचियों में सामान्य सुधार ही काफी समझा गया है, क्योंकि वही सत्ताधारी भाजपा के राजनीतिक हित में बैठता है। यह दिलचस्प है कि असम को सर प्रक्रिया के लिए अपवाद बनाए जाने के लिए, वहां कुछ ही वर्ष पहले जो एनआरसी या राष्टï्रीय नागरिकता रजिस्टर प्रक्रिया हो चुकी होने की दलील दी गयी है, वर्तमान एसआइआर पर उसी प्रक्रिया का आवरण होने के इल्जाम लगते रहे हैं।
वैसे दिलचस्प यह भी है कि असम में एनआरसी की प्रक्रिया से बहुत बड़ी संख्या में कथित बांग्लादेशी पकड़े जाने की उम्मीद में, इस बहुत महंगी तथा आम लोगों के लिए बहुत ही तकलीफदेह प्रक्रिया का जोर-शोर से समर्थन करने वाले, भाजपायी राज्य सरकार समेत आरएसएस विचार-परिवार के तमाम संगठनों को तब सांप सूंघ गया, जब इस प्रक्रिया के नतीजे सामने आये। बेशक, एनआरसी की प्रक्रिया में लगभग 20 लाख लोगों को ''पराया'' बताया गया था, लेकिन संघ-भाजपा की उम्मीदों के विपरीत, उनमें प्रचंड बहुमत हिंदुओं का था, जिनमें बांग्लादेश से आए हिंदुओं के अलावा एक बड़ी संख्या देश के दूसरे हिस्सों से आकर पिछले अनेक वर्षों में असम में बस गए हिंदुओं की थी। नतीजा यह कि नरेंद्र मोदी के डबल इंजन राज में असम में, एनआरसी की उक्त कसरत के नतीजों को कई वर्ष बाद भी अंतिम रूप देकर प्रकाशित किया ही नहीं जा सका है।
बिहार का, जहां सर की प्रक्रिया विधानसभा चुनाव से पहले पूरी करा ली गयी गयी थी और अन्य करीब दस राज्यों का इस प्रक्रिया का अब तक का अनुभव इसका गवाह है कि असम की एनआरसी की तरह, सर प्रक्रिया भी कथित विदेशी घुसपैठियों की पहचान करने में बुरी तरह से विफल ही रही है। और यह वर्तमान सरकार तथा उसके संचालक संघ परिवार के प्रयासों में किसी कमी की वजह से नहीं है। यह सबसे बढ़कर इसलिए है कि घुसपैठ और खासतौर पर बांग्लादेशियों की घुसपैठ, संघ परिवार द्वारा निरंतर प्रचार के जरिए गढ़ा गया एक सांप्रदायिक मिथक है। अशांति के दौरों को छोड़कर, अवैध रूप से सीमा पार कर के भारतीय इलाकों में बसने की कोई आम प्रवृत्ति, कम से कम पिछले अनेक वर्षों से नहीं देखने में आयी है।
लेकिन, ''घुसपैठियों'' के खतरे का मिथक, संघ-भाजपा के राजनीतिक तरकश का इतना महत्वपूर्ण तीर है कि किसी भी जांच के नतीजे उन्हें यह झूठा हौवा खड़ा करने से रोक नहीं सकते हैं। तभी तो हालांकि, बिहार में एसआइआर में, भाजपा तथा संघ परिवार ही नहीं, खुद चुनाव आयोग के सारे प्रचार के बावजूद, अंतत: विदेशी होने के लिए मतदाता सूची से काटे गए नामों की संख्या सैकड़ों छोड़, दर्जनों में भी नहीं निकली थी। इसके बावजूद, खुद मोदी-शाह की जोड़ी के नेतृत्व में भाजपा ने घुसपैठियों के खतरे का बेइंतिहा शोर मचाया था और अपने विरोधियों को, घुसपैठियों का सरपरस्त साबित करने के लिए पूरा जोर लगाया था। वैसे इसका कारण समझना भी मुश्किल नहीं है। संघ-भाजपा की शब्दावली में, जब ''घुसपैठिया'' शब्द का प्रयोग किया जाता है, तो निशाना मुसलमानों पर होता है। और जब अपने विरोधियों को घुसपैठियों का संरक्षक कहा जाता है, तो वास्तव में बहुसंख्यक समुदाय को यह संदेश दिया जा रहा होता है कि भाजपा के विरोधी, मुसलमानों के साथ हैं।
हैरानी की बात नहीं है कि खासतौर पर प. बंगाल तथा असम के, आगामी चुनाव की तारीखों की घोषणा से पहले के सघन दौरों में, मोदी-शाह की जोड़ी सांप्रदायिक धु्रवीकरण के अपने प्रमुख हथियार के तौर पर, ''घुसपैठियों के खतरे'' और उससे लड़ने की झूठी मुद्राओं का जमकर इस्तेमाल करना शुरू भी कर चुकी है। यहां तक कि गृहमंत्री शाह तो, खुद जिन पर सीमाओं पर घुसपैठ रोकने की जिम्मेदारी आती है, प. बंगाल में यह बेतुका दावा करने की हद तक चले गए कि उनके राज ने, एक प. बंगाल को छोड़कर बाकी पूरे देश में विदेशी घुसपैठ पूरी तरह से रोक दी है। यह दूसरी बात है कि उन्हीं केंद्रीय गृहमंत्री की मौजूदगी में, असम में उनकी ही पार्टी के मुख्यमंत्री, अपने राज्य से घुसपैठियों को उखाड़ने और भगाने की अपनी करनियों का, बढ़-चढ़कर बखान कर रहे थे। और उन्हीं की पार्टी के त्रिपुरा के मुख्यमंत्री, असम के अपने बड़े भाई का अनुसरण करने की कोशिश कर रहे थे।
वास्तव में ''घुसपैठियों के खतरे'' के प्रचार और इस खतरे से बचाने के अपने स्वांग पर, भाजपा की राजनीतिक निर्भरता अब उस मुकाम पर पहुंच चुकी है, जहां मुंबई नगर निगम के चुनाव भाजपा सबसे बढ़कर, ''घुसपैठियों को बाहर निकालने'' के वादे के आधार पर लड़ रही है। यह दूसरी बात है कि महाराष्टï्र के भाजपायी मुख्यमंत्री, देवेंद्र फडनवीस इस तरह से मुस्लिम विरोधी इशारों से सांप्रदायिक धु्रवीकरण करने की कोशिश तक ही सीमित नहीं रहते हैं। एक कदम और आगे बढ़कर, वह बाकायदा इसका एलान करते हैं कि नगर निगम का उनका नेता 'मराठी होगा, हिंदू होगा...।' यह साफ तौर पर भाजपा के उच्च नेतृत्व के सीधे ''हिंदू राज'' पर पहुंच जाने को दिखाता है, जो फासीवाद की ओर एक बड़ी छलांग को दिखाता है क्योंकि भारत जैसे बहुधार्मिक देश में, ''हिंदू राज'' का मतलब, फासीवाद के बाकायदा आ धमकने के सिवा और कुछ नहीं है।
खैर! उत्तर प्रदेश में सर प्रक्रिया तक लौटें। तीन करोड़ से कुछ ही कम यानी करीब बीस फीसद मतदाताओं के नाम काटे जाना, बेशक वर्तमान सर प्रक्रिया के हिसाब से भी असाधारण है। लेकिन, उत्तर प्रदेश में सर का मामला एक और लिहाज से भी असाधारण है। राज्य के भाजपायी मुख्यमंत्री ने ड्राफ्ट सूचियां पूरी होने से ठीक-ठाक पहले ही इसकी चिंतित चेतावनी दे दी थी कि, इस प्रकार की कैंची के नीचे राज्य के करीब चार करोड़ मतदाता आने वाले हैं। इसके बाद, जब दो अवधि विस्तारों के बाद, चुनाव आयोग ने अंतत: ड्राफ्ट सूची जारी की, जैसाकि हम बता चुके हैं, हरेक पांचवां मतदाता सूची से बाहर किया जा चुका था।
लेकिन, यह कहानी यहीं खत्म नहीं होती है। इस सूची के आने के बाद, भाजपायी राज्य सरकार और संघ-भाजपा तंत्र ने जो करना तय किया है, वह मोदीशाही में और जाहिर है कि चुनाव आयोग के पूर्ण सहयोग से, चुनाव मात्र के एक मजाक बनाकर रख दिए जाने की ओर बहुत बड़ा कदम होगा। तय यह किया गया है कि यह सत्ताधारी तंत्र, आपत्तियों तथा नये नाम जुड़वाने के दौर में, हरेक मतदान केंद्र पर 200 वोट जुड़वाएगा। उत्तर प्रदेश में, जहां 9,879 की बढ़ोतरी के साथ, मतदान केंद्रों की कुल संख्या 1,74,879 हो गयी है, संघ परिवार के इस संकल्प का अर्थ करीब साढ़े तीन करोड़ वोट जुड़वाना है यानी काटे गए कुल वोटों से भी ज्यादा। यह संख्या 2024 के आम चुनाव में उत्तर प्रदेश में भाजपा को मिले कुल वोट के आस-पास ही बैठेगी।
कहने की जरूरत नहीं है कि इतनी बड़ी संख्या में वोट जुड़वाने का मकसद, सिर्फ उत्तर प्रदेश के उन मतदाताओं के मताधिकार की रक्षा करना नहीं है, जिनके नाम सर की इस प्रक्रिया में मतदाता सूचियों के शुद्घीकरण के नाम पर काट दिए गए हैं। उल्टे इनका मकसद तो एक प्रकार से सत्ताधारी तंत्र की मर्जी की मतदाता सूचियां ही तैयार कराना है। यह सिर्फ सर की पूरी प्रक्रिया को ही निरर्थक नहीं साबित कर देता है, चुनाव की प्रक्रिया को ही निरर्थक बना देता है। सत्ताधारियों के अपने लिए एक नयी जनता ही चुन लेने के रास्ते, चुनाव को निरर्थक बनाने का आधा काम चुनाव आयोग ने करीब तीन करोड़ मतदाताओं के नाम काटने के जरिए कर दिया है और बाकी आधा काम संघ-परिवार साढ़े तीन करोड़ मतदाता जोड़ने के जरिए करने का इरादा रखता है। यह वोट चोरी के सीधे-सीधे चुनाव की चोरी की ओर बढ़ने का इशारा है।
(लेखक साप्ताहिक पत्रिका लोक लहर के संपादक हैं।)