आशंकाओं के बीच अच्छा गुजरा साल
सबसे अच्छी बात हुई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बकवास फैसलों का बेअसर हो जाना;
- अरविन्द मोहन
हमारे लिए आर्थिक मोर्चे पर वर्ष 2025 जितनी आशंकाओं के साथ शुरू हुआ था, अब उतने ही अपेक्षाकृत अच्छे परिणामों के साथ समाप्त हुआ है। सिर्फ आर्थिक विकास की दर ही नहीं अर्थव्यवस्था के अनेक मोर्चों पर हमारा प्रदर्शन ठीक रहा है और कुछ बहुत ही शुभ बदलाव दिख रहे हैं पर कई मामलों में हमारी कमजोरियां भी जाहिर हो रही हैं और उनको दुरुस्त करने की कोशिशें नहीं हुईं तो अभी दिख रही गुलाबी तस्वीर को धूमिल होने में देर नहीं लगेगी। मुश्किल यह है कि शिकायत सरकार से है, तारीफ का हकदार हमारे किसान और उद्यमी हैं। लेकिन कुल मिलाकर अर्थव्यवस्था अच्छी स्थिति में है और पहली बार कुछ बहुत ही धनात्मक बदलाव दिखे है। इस साल अनेक कारणों से देश में हुए विदेशी निवेश में कमी देखने को मिली और काफी पूंजी बाजार से वापस ले ली गई। लेकिन ऐसा पहली बार हुआ कि देसी पूंजी ने आकर उस कमी की भरपाई कर दी और देश की निर्भरता कम हुई। इसके कारणों को देखना होगा और बढ़ावा भी देना होगा।
सबसे अच्छी बात हुई अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प के बकवास फैसलों का बेअसर हो जाना। उनके राष्ट्रपति बनने के साथ ही वैश्विक स्तर पर अनिश्चितताओं का दौर शुरू हुआ जो उनके चुनाव अभियान में कही बातों को लेकर था। हमारे यहां भी पहलगाम के आतंकी हमले के बाद हुई सैन्य कार्रवाई के दौरान उन्होंने जिस तरह दखल दिया और फिर उस सवाल को नरेंद्र मोदी तथा भारत को अपमानित करने के लिए इस्तेमाल करते रहे उससे काफी चिंता रही। भारत ने जब थोड़ा सख्त रवैया अपनाया तो उन्होंने हमारे कई उत्पादों पर भारी सीमा शुल्क और उसके ऊपर पेनाल्टी लगा दिया। वे रूस से सस्ता तेल खरीदने के हमारे फैसलों को बहाना बना रहे थे लेकिन अमेरिका यूरोप समेत काफी सारे देश ऐसा कर रहे थे। असल में उनकी तरफ से अपने कृषि और डेयरी उत्पादों के लिए हमारे बाजार खुलवाने का दबाव था जबकि हम ऐसा नहीं कर सकते थे। अब खुद ट्रम्प कितना बदले और कितने फैसले वापस लिए इसका हिसाब दुनिया लगा रही है पर हमारे यहां लगे प्रतिबंध अभी नहीं उठे हैं। अच्छी बात यह हुई कि हमारा निर्यात ज्यादा प्रभावित नहीं हुआ और न हमारा चालू खाते का घाटा बढ़ा।
डालर और अन्य महत्वपूर्ण मुद्राओं का मूल्य बढ़ना इससे जुड़ा नहीं है लेकिन यह हमारे मौद्रिक प्रबंधन की कमजोरी बताता है और इस तर्क का कोई मतलब नहीं है कि महंगा डालर हमारे निर्यात को बढ़ाता है। आज दुनिया जितनी खुली है और एक मुद्रा के रूप में डालर जिस स्थिति में है उसमे उसका महंगा होना हमें कई तरह से नुकसान पहुंचाता है। चालीस रुपए के डालर की बात करने वाले नरेंद्र मोदी के शासन में अगर डालर नब्बे पार चला जाए तो यह चिंता की बात है। महंगा तो सोना भी बहुत हुआ है लेकिन उसमें सरकार के पास करने को ज्यादा कुछ नहीं है। विश्व स्तर पर बैंकों से सोने की खरीद बढ़ाने से यह स्थिति आई है जो स्थिरता के लिए ऐसा कर रहे हैं। चांदी की तेजी उससे ज्यादा है और इसमें सरकार ने जिस तरह कई बार वायदा कारोबार पर मार्जिन-पड़ता राशि बढ़ाकर अपनी कमाई बढ़ाई है उसने सट्टेबाजी को बढ़ावा दिया है। एक दिन में दस से 15 फीसदी का उतार-चढ़ाव सिर्फ सट्टेबाजी से आता है और हमारा वायदा कारोबार यही कर रहा है। यहां चांदी ही नहीं, काफी सारे जींस भी उपलब्ध कुल स्टाक से कई गुना ज्यादा सिर्फ मुंहबोली खरीद-बिक्री का माध्यम बनते हैं।
अर्थव्यवस्था में अच्छे प्रदर्शन का क्षेत्र कृषि और पशुपालन है जबकि इन कामों में लगे लोगों की सरकार से शिकायतें जारी है। खाद की कमी किसानों के लिए लगातार सिरदर्दी है। करखनिया उत्पादन में कभी कमी तो किसी महीने बढ़त देखकर भी सरकार कुछ बड़े कदम नहीं उठाती। उसने श्रम कानून सुधार की भी तो आधे अधूरे और मजदूरों की नाराजगी वाले। एसेम्बलिंग का काम जरूर बढ़ा है लेकिन उससे विदेशी मोबाइल कं पनियों का लाभ ज्यादा बढ़ा है या पुरजे सप्लाई में एकाधिकार रखने वाले चीन का यह कहना मुश्किल है। वैसे यह उल्लेखनीय है कि चीन का विदेश व्यापार का सरप्लस एक ट्रिलियन का हो चुका है।
सरकार श्रम सुधार में ही नियोक्ताओं को खुला हाथ नहीं दे रही है, बाजार को भी पूरी तरह निजी हाथों और विदेशी खिलाड़ियों को सौंप रही है। उसने विमानन क्षेत्र को पूरी तरह निजी हाथों में सौंपने का नुकसान देखा जब इंडिगो समेत अन्य एयरलाइन्सों के हजारों फ्लाइट रद्द होने से अफरातफरी मच गई थी। इसके बावजूद सरकार बीमा क्षेत्र में सौ फीसदी विदेशी पूंजी, एटमी उत्पादन में भी निजी क्षेत्र को उतारने और विदेशी विश्वविद्यालयों को कैंपस खोलने की कानूनी व्यवस्था कर दी है। अगर वह अपना रोल निजी क्षेत्र के चौकीदार के रूप में देखना चाहती है तो उसे कम से कम ढंग से चौकीदारी भी करनी चाहिए। एयरलाइंस और रेल वगैरह में ग्राहकों के हितों की चौकीदारी तो नहीं हो रही है। सरकार का यह काम भी नहीं है।
इस साल एक नया तमाशा सामने आया। अभी तक सरकार की तरफ से पेश होने वाले आंकड़ों पर देश के अर्थशास्त्रियों और सांख्यिकी के जानकारों का एक समूह शक जाहिर करता था। जब जीडीपी की गणना का आधार बदला गया तब भी एक फीसदी तक गलत आंकड़े देने की बात उठी पर इस साल तीसरी तिमाही में जब जीडीपी के 8.2 फीसदी बढ़ने का आंकड़ा सामने आया तो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोश समेत की अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों की तरफ से तत्काल आंकड़ों को संदिग्ध बताने का बयान आ गया। पहले रेटिंग एजेंसियों की तरफ से बेइमानी का फैसला आने पर देशी अर्थशास्त्री और सरकार भी शोर मचाती थी। इस बार ऐसा नहीं हुआ और बाजार में 8.2 की खबर से जो उत्साह आना चाहिए था वह सिरे से गायब रहा। बाजार ने सच में कोई प्रतिक्रिया नहीं दी जो इस शक को गहराता है। लेकिन किसी भी अनुमान से हमारा विकास दर सात फीसदी से ऊपर रहने के जो अनुमान आ रहे हैं वे यही बताते हैं कि भारत ने सन् 2025 की सारी आशंकाओं को झुठलाते हुए बढ़िया तरक्की की है।