सत्ता बदलने से अधिक जरूरी है व्यवस्था का बदलना
इस आंदोलन में किसी मंत्री, अधिकारी या नियामक प्राधिकारी का इस्तीफा का केंद्र में होता है।;
- डॉ. परशुराम तिवारी
परिवर्तन की शुरुआत समाज से भी होती है। व्यवस्था परिवर्तन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए जागरूक नागरिकों, सामाजिक संगठनों, किसान समूहों, श्रमिक संगठनों, शिक्षकों, युवाओं और मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हैं, स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए संगठित होते हैं और सार्वजनिक संस्थाओं से जवाबदेही की मांग करते हैं, तब व्यवस्था में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं।
लम्बी ख़ामोशी के बाद भारत आंदोलन की राह पर है। इस आंदोलन में किसी मंत्री, अधिकारी या नियामक प्राधिकारी का इस्तीफा का केंद्र में होता है। जैसे पहले शिक्षा मंत्री का इस्तीफा मांगा गया और अब भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त का इस्तीफा मांगा जा रहा है। यह आंदोलन वास्तव में सत्ता विरोधी है, जो बिखरा होकर भी फिलहाल देशव्यापी एवं प्रभावी रूप धारण कर चुका है। आंदोलन में दो तरह के चेहरे अधिक हैं- एक सत्ता विरोधी, जो केवल तात्कालिक समाधान चाहते हैं। दूसरे व्यवस्था विरोधी, जो व्यवस्था का दीर्घकालिक उपचार चाहते हैं।
लोकतंत्र में सत्ता परिवर्तन एक सामान्य राजनीतिक प्रक्रिया है। चुनाव होते हैं, सरकारें बनती हैं, कुछ वर्षों बाद बदल जाती हैं। राजनीतिक दल जनता से वादे करते हैं और जनता अपने अनुभवों, अपेक्षाओं तथा असंतोष के आधार पर अपना निर्णय सुनाती है। लेकिन एक बुनियादी सवाल बार-बार हमारे सामने खड़ा होता है—क्या केवल सत्ता बदल जाने से आम आदमी की जिंदगी बदल जाती है? क्या सरकार बदलने के साथ गरीबी, बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, सामाजिक भेदभाव और प्रशासनिक संवेदनहीनता जैसी समस्याएं भी समाप्त हो जाती हैं? यदि ऐसा नहीं होता, तो हमें स्वीकार करना होगा कि सत्ता परिवर्तन से अधिक महत्वपूर्ण व्यवस्था परिवर्तन है।
सत्ता परिवर्तन और व्यवस्था परिवर्तन में अंतर
सत्ता परिवर्तन का अर्थ है शासन करने वाले व्यक्तियों या राजनीतिक दलों का बदल जाना। इसके विपरीत, व्यवस्था परिवर्तन का अर्थ है उन नीतियों, संस्थाओं, प्रक्रियाओं और सामाजिक संबंधों में बदलाव लाना, जो यह निर्धारित करते हैं कि देश के संसाधनों पर किसका अधिकार होगा, विकास का लाभ किसे मिलेगा और निर्णय लेने की प्रक्रिया में आम नागरिक की कितनी भागीदारी होगी।
यदि सरकार बदल जाती है, लेकिन शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक गरीबों की पहुंच नहीं बढ़ती, युवाओं को रोजगार नहीं मिलता, किसानों को उनकी उपज का उचित मूल्य नहीं मिलता और सरकारी कार्यालयों में आम नागरिक को सम्मान नहीं मिलता, तो लोकतांत्रिक परिवर्तन अधूरा ही रहेगा।
इसी प्रकार, यदि राजनीतिक नेतृत्व बदल जाता है, लेकिन सत्ता का केंद्रीकरण, प्रशासनिक मनमानी, पूंजी और राजनीति का गठजोड़ तथा सामाजिक असमानता बनी रहती है, तो परिवर्तन का लाभ सीमित लोगों तक ही सिमट सकता है।
आर्थिक और सामाजिक व्यवस्था में बदलाव जरूरी-व्यवस्था परिवर्तन का प्रश्न आर्थिक न्याय से भी जुड़ा हुआ है। विकास की दर बढ़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन यह जानना भी आवश्यक है कि विकास का लाभ समाज के किन वर्गों तक पहुंच रहा है।
लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ पांच वर्ष में एक बार मतदान करना भर नहीं है। लोकतंत्र तभी मजबूत होता है, जब नागरिकों को शासन की नीतियों और निर्णयों को प्रभावित करने का अवसर मिले, सरकारी कामकाज में पारदर्शिता हो और जनप्रतिनिधि अपने कार्यों के लिए जवाबदेह हों।
एक ओर यदि संपत्ति और अवसर कुछ लोगों के हाथों में केंद्रित होते जाएं और दूसरी ओर बड़ी आबादी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, आवास तथा सम्मानजनक रोजगार से वंचित रहे, तो विकास समावेशी नहीं कहा जा सकता।
सामाजिक व्यवस्था में बदलाव भी उतना ही आवश्यक है। जातिगत भेदभाव, लैंगिक असमानता, अंधविश्वास और सामाजिक ऊंच-नीच के रहते राजनीतिक समानता का लाभ सभी नागरिकों को समान रूप से नहीं मिल सकता। संविधान द्वारा दिए गए समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुत्व के मूल्यों को सामाजिक व्यवहार में उतारना ही वास्तविक लोकतांत्रिक परिवर्तन है।
राजनीति की संस्कृति भी बदले
व्यवस्था परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण पक्ष राजनीतिक संस्कृति है। यदि राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता प्राप्त करना, विरोधियों को कमजोर करना और चुनाव जीतना रह जाए, तो जनहित पीछे छूट जाता है।
राजनीतिक दलों और नेतृत्व को आलोचना के प्रति सहिष्णुता, सार्वजनिक जवाबदेही, आंतरिक लोकतंत्र और पारदर्शिता को महत्व देना चाहिए। नागरिकों को भी व्यक्तिपूजा और अंधसमर्थन से ऊपर उठकर नीतियों, कार्यक्रमों और परिणामों के आधार पर सरकारों का मूल्यांकन करना चाहिए।
लोकतंत्र में किसी भी नेता या दल को प्रश्नों से परे नहीं माना जा सकता। स्वस्थ आलोचना लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी शक्ति है।
परिवर्तन की शुरुआत समाज से भी होती है। व्यवस्था परिवर्तन केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है। इसके लिए जागरूक नागरिकों, सामाजिक संगठनों, किसान समूहों, श्रमिक संगठनों, शिक्षकों, युवाओं और मीडिया की भी महत्वपूर्ण भूमिका है।
जब नागरिक अपने अधिकारों के प्रति जागरूक होते हैं, स्थानीय समस्याओं के समाधान के लिए संगठित होते हैं और सार्वजनिक संस्थाओं से जवाबदेही की मांग करते हैं, तब व्यवस्था में सुधार की संभावनाएं बढ़ती हैं।
महात्मा गांधी का ग्राम स्वराज या मार्क्स और लेनिन का सभी प्रकार की समानता पर जोर या ज्योतिबा फुले का सामाजिक न्याय संबंधी चिंतन अलग-अलग संदर्भों में इसी व्यापक प्रश्न की ओर संकेत करते हैं—समाज में सत्ता, अवसर और सम्मान का वितरण किस प्रकार हो?
इसलिए हमारा लक्ष्य केवल यह नहीं होना चाहिए कि अगली बार सत्ता में कौन आएगा, बल्कि यह भी होना चाहिए कि सत्ता में आने वाला कोई भी दल किस तरह की व्यवस्था चलाएगा।