देहरी

अब जब दोनों मां-बेटे कोरोना पाजि़टिव होकर अपने घर में कैद कर दिए गए हों तो बेटे ने जिस स्नेह और ममता से मां को संभाला वो सहजता से भुलाया नहीं जा सकता

By :  Deshbandhu
Update: 2026-01-10 21:30 GMT
  • महेन्द्र तिवारी

अब जब दोनों मां-बेटे कोरोना पाजि़टिव होकर अपने घर में कैद कर दिए गए हों तो बेटे ने जिस स्नेह और ममता से मां को संभाला वो सहजता से भुलाया नहीं जा सकता। भले ही 35 वर्षीय बेटा बाकी लोगों की संतानों की तरह कमाऊ नहीं है, पर इंसानियत और संवेदना की भावना की तो उसमें कमी नहीं है। गीता का उसके साथ जो 'इन्टरएक्शन' होता था, जो परस्पर क्रिया होती थी उसी के फलस्वरूप बेटे का ऐसा आचरण उसे देखने को मिल रहा है।

रात का तीसरा पहर, जब समय खुद भी ठिठक कर खड़ा हो जाता है। न रात पूरी तरह अपनी पकड़ छोड़ती है, न सुबह भरोसे के साथ दस्तक देती है। अंधेरे और उजाले के बीच का यह अंतराल अक्सर सबसे भारी होता है।

उस रात सन्नाटा अस्वाभाविक रूप से घना लग रहा था। सीसीटीवी कैमरों की लाल बत्तियाँ टिमटिमा रही थीं, जैसे किसी अनकहे भय की पहरेदारी कर रही हों। पेड़ों की पत्तियाँ हवा में हिलतीं तो लगता, कोई दबे पाँव गलियारे में घूम रहा है। तभी उस सन्नाटे को चीरती हुई एक आवाज़ सुनाई दी। ठक... ठक... ठक।

यह आवाज़ किसी साधारण दस्तक जैसी नहीं थी। इसमें एक अजीब सी बेचैनी थी, एक आदिम भय की गूँज थी। फ्लैट नंबर 402 में कल्याणी की नींद झटके से खुली। उनकी नज़र दीवार पर टंगी पेंडुलम घड़ी पर गई, तीन बजकर बारह मिनट हो रहे थे। उन्होंने मन ही मन बुदबुदाया, इस व$क्त कौन हो सकता है ? एयरकंडीशनर की स्थिर घरघराहट के बीच भी कल्याणी को अपनी धड़कनें सा$फ सुनाई दे रही थीं। उन्होंने पास सो रहे अपने पति, समीर को देखा। समीर गहरी नींद में थे। शुगर और हाई बीपी की भारी डोज़ वाली दवाइयाँ उन्हें होश की दुनिया से मीलों दूर ले गई थीं।

कल्याणी दबे पाँव उठीं और मुख्य दरवाज़े के डिजिटल सेंसर स्क्रीन की ओर बढ़ीं। स्क्रीन पर जो चेहरा उभरा, उसने कल्याणी के माथे पर पसीने की बूंदें ला दीं। वह मानवी थी। बगल वाले फ्लैट की वह लड़की, जिसे 'आकाशगंगा हाइट्स' के लोग अक्सर संदेह और तिरस्कार की नज़रों से देखते थे। मानवी एक स्वतंत्र पत्रकार थी, जो अक्सर देर रात घर लौटती थी और जिसके घर 'अजीब' लोगों का आना-जाना लगा रहता था।

कल्याणी ने दरवाज़े की सुरक्षा जंजीर चढ़ाई और पल्ला थोड़ा सा खोला। 'इतनी रात को क्या हुआ मानवी?' कल्याणी की आवाज़ में रूखापन और डर का मिला-जुला पुट था।

'आंटी... मेरी माँ...' मानवी की आवाज़ काँप रही थी, आँखें आंसुओं से धुंधली थीं।

'उन्हें दिल का दौरा पड़ा है। वे नीला पड़ रही हैं। एम्बुलेंस को कॉल किया है, पर वे कह रहे हैं कि जी-20 समिट के रूटडायवर्जन की वजह से उन्हें पहुँचने में चालीस मिनट लगेंगे। प्लीज़... अंकल से कहिए गाड़ी निकाल दें। सिर्फ हॉस्पिटल तक?'

कल्याणी के मन में एक युद्ध छिड़ गया। एक ओर मरती हुई पड़ोसन थी ओर दूसरी उनकी अपनी असुरक्षाएँ। उन्होंने समीर की ओर देखा, जो शायद उठने की स्थिति में नहीं थे। लेकिन उससे बड़ा सच यह था कि कल्याणी को उस 'रात' से डर लगता था। उन्हें डर था कि अगर रास्ते में कुछ अनहोनी हो गई तो? अगर पुलिस केस हो गया तो?

'देखो बेटा,' कल्याणी ने ठंडे स्वर में कहा, 'समीर की तबीयत खुद बहुत खराब है। और ड्राइवर गाँव गया है। इस वक्त बाहर निकलना खतरे से खाली नहीं है। तुम सिक्योरिटी को क्यों नहीं बुलातीं? '

'आंटी, सिक्योरिटी के पास गाड़ियाँ नहीं हैं। वे सिर्फ गेट तक छोड़ सकते हैं। माँ के पास समय नहीं है!' मानवी लगभग चिल्लाई।

'सॉरी बेटा, हम मजबूर हैं।' कल्याणी ने बड़ी निर्दयता से दरवाज़ा बंद कर लिया। कुंडी चढ़ने की आवाज़ मानवी के कानों में किसी गोली की तरह लगी।

भीतर कल्याणी को अपनी आत्मा पर एक बोझ महसूस हुआ, पर उन्होंने खुद को सांत्वना दी, दुनिया बहुत खराब है, अपनी सुरक्षा पहले देखनी पड़ती है।

मानवी खाली हाथ वापस अपने फ्लैट में दौड़ी। उसकी माँ, सुजाता, सोफे पर ढह गई थीं। उनका शरीर ठंडा पड़ रहा था। मानवी ने उनका हाथ अपने हाथ में लिया। उसे याद आया कि कैसे पिछले साल ही उनके पिता की मृत्यु हुई थी और अब उसकी पूरी दुनिया एक पतले धागे से लटकी थी।

'मम्मी, हिम्मत मत हारना। मैं हूँ न।'

मानवी बाहर निकली। लिफ्ट खराब थी। वह छह मंजिलें सीढ़ियों से नीचे उतरी। नीचे पार्किंग में सन्नाटा पसरा हुआ था। हर महंगी कार अपने मालिक के अहंकार की तरह ढकी हुई पड़ी थी। उसने गार्ड्स के केबिन की ओर दौड़ लगाई, पर वहाँ कोई नहीं था। शायद वे राउंड पर थे।

वह टाउनशिप के पिछले गेट की ओर भागी, जहाँ कंस्ट्रक्शन का काम चल रहा था। वहाँ धूल, कंक्रीट और अंधेरे के बीच एक पुरानी झुग्गी थी। वहाँ 'मुरारी' काका रहते थे।

मुरारी, वही शख्स जिसे 'आकाशगंगा हाइट्स' की रेजिडेंट्स वेलफेयर एसोसिएशन ने 'सुरक्षा के लिए खतरा' घोषित कर रखा था। वह दिन में मज़दूरी करता और रात में कूड़ा उठाने वालों की टोली को संभालता था। कल्याणी और समीर ने ही पिछले हफ्ते की मीटिंग में उसे वहाँ से हटवाने के लिए सुझाव दिए थे।

'मुरारी काका!' मानवी ने ज़ोर से चिल्लाया।

झुग्गी के फटे हुए पर्दे से एक अधेड़ उम्र का आदमी बाहर निकला। उसके हाथ गंदे थे, कपड़े फटे हुए, पर आँखों में एक अजीब सी सतर्कता थी।

'क्या हुआ बिटिया? इतनी रात को यहाँ'

मानवी ने हाँफते हुए सब सच बता दिया। मुरारी ने एक पल के लिए भी नहीं सोचा। उसने कोने में खड़ी अपनी पुरानी, जंग लगी मोटर-साइकिल की ओर इशारा किया, जिसके पीछे एक लोहे की ट्राली जुड़ी थी, कचरा ढोने के लिए बनाई गई जुगाड़ वाली गाड़ी।

'गाड़ी निकालो काका, माँ मर जाएगी!' मानवी बिलख पड़ी। 'तुम चलो बिटिया, भगवान हमारा साथ देगा। '

मुरारी और उसका एक साथी मानवी के साथ ऊपर गए। उन्होंने सुजाता को उस कचरा ढोने वाली ट्राली में लिटाया। मानवी ने माँ का सिर अपनी गोद में रखा। तीनों चल पड़े।

सफर शुरू हुआ। रात का समय और रास्ता बाधाओं से भरा हुआ। सड़कों पर पुलिस के बैरिकेड्स थे। समिट की वजह से सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी। 'ए! रुको!' एक पुलिसवाले ने टॉर्च चमकाई। 'यह क्या कचरा गाड़ी में आदमी ढो रहे हो?'

मुरारी उतरा, उसने हाथ जोड़ दिए। 'साहब, किसी की जान जा रही है। गाड़ी नहीं मिली। हमें जाने दो साहब।' पुलिसवाला संशय में था, पर सुजाता की हालत देख उसका दिल भी पसीज गया। 'जाओ, पर आगे मुख्य सड़क बंद है, गलियों से निकलना होगा।'

मुरारी ने गाड़ी को उन संकरी गलियों में मोड़ दिया, जहाँ अंधेरा और पसरा हुआ था। अचानक, मुरारी का पैर पत्थर से टकराया और अंगूठे में चोट आ गई, पर उसने कदम नहीं रोका। मानवी बार-बार माँ का सिर ठीक करती रही।

तीन किलोमीटर का लम्बा रास्ता और मुरारी के नंगे पैर ज़मीन पर दौड़ रहे थे। उसके कंधे की नसें उभर आई थीं, पसीना उसकी आँखों में जा रहा था, पर उसने रफ़्तार कम नहीं होने दी।

मानवी देख रही थी, शहर के सबसे सुरक्षित इलाके के लोग अपने एयरकंडीशनर में दुबके थे और वह आदमी जिसे समाज ने 'कचरा' समझता था, अपनी पूरी हस्ती एक अजनबी की जान बचाने में झोंक रहा था।

लगभग चालीस मिनट बाद वे 'लाइफकेयर अस्पताल' पहुँचे। वार्ड बॉय दौड़े और स्ट्रेचर लाए। इमरजेंसी वाले डॉक्टर सुजाता को भीतर ले गए।

लगभग एक घंटा बीत गया। मानवी अस्पताल की ठंडी बेंच पर बैठी कांप रही थी। मुरारी दूर एक कोने में ज़मीन पर बैठा था, शायद उसे डर था कि अस्पताल के सा$फ-सुथरे फर्श पर उसके बैठने से कोई ऐतराज़ न कर दे।

सुबह के पांच बज रहे थे। तभी डॉक्टर बाहर आए। उनके चेहरे पर राहत थी। 'शीइज आउट ऑफ डेंजर। अगर दस मिनट की भी देरी होती, तो हम उन्हें नहीं बचा पाते। किसने लाया इन्हें? '

मानवी ने मुड़कर मुरारी की ओर देखा। मुरारी काका की आँखों में एक चमक आ गई थी और वह फुर्ती के साथ हमारे समीप आकर खड़ा हो गए।

डॉक्टर ने कुछ दवाइयां मंगवाईं। मानवी पर्स निकालने लगी, लेकिन मुरारी काका ने पर्चा झपट लिया।

'तुम अपनी मां के पास रुको बिटिया, मैं दवा लेकर आता हूँ। '

'पर काका, पैसे? '

'हिसाब बाद में होगा ', कहकर वह बाहर निकल गए।

वह खिड़की से देख रही थी। मुरारी काका ने अपनी जेब से एक फटा हुआ रुमाल निकली, जिसमें कुछ सौ-सौ के मुड़े हुए नोट थे। उसने अपनी पूरी जमा पूंजी काउंटर पर रख दी। मानवी की आँखों से आँसू बह निकले। यह वह पैसा था जिसे मुरारी काका ने शायद अपनी बेटी की शादी या अपने घर की मरम्मत के लिए बचा कर रखा होगा।

जब काका दवा लेकर लौटे, तो मानवी की आंखों में सम्मान के आंसू थे। वह समझ नहीं पा रही थी कि जिस 'पड़ोस' पर वह गर्व करती थी, उनका दरवाजा बंद था और जिसे 'अजनबी' समझती थी, वह फरिश्ता निकले।

सुबह छह बजे जब सुजाता जी की हालत स्थिर हुई, तो डॉक्टर ने उन्हें घर ले जाने की अनुमति दे दी।

मुरारी काका की वह गाड़ी अब फ्लैट पहुँच चुकी थी। सुजाता जी को वह सकुशल घर पहुँचाकर वापस जाने लगे, तो मानवी ने संकोच के साथ पांच सौ के दो नोट उनकी ओर बढ़ाया।

'लीजिए काका... यह आपकी मेहनत...'

मुरारी काका ने मानवी का हाथ पीछे धकेल दिया। उनकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी। 'बिटिया, सुबह से शाम तक मैं पेट के लिए रिक्शा चलाता हूँ, उसका पैसा लेता हूँ। पर आज जो मैंने किया, वो मेरा धर्म था।'

'पर काका, आपने दवाइयों के पैसे भी दिए और रात भर जगे, उसका क्या ? '

मुरारी काका मुस्कुराए। 'बिटिया, जिस दिन पड़ोसी के दु:ख में पैसा आड़े आ जाए, समझ लेना कि इंसानियत मर गई है। भगवान ने मुझे जरिया बनाया, यही मेरी मजदूरी है।

कल्याणी अपने बालकनी में खड़ी नीचे का नज़ारा देख रही थीं। उन्होंने देखा कि मानवी उस 'गंदे' मुरारी के पैर छू रही है। समीर भी अब उठ चुके थे और बगल में खड़े होकर यह सब देख रहे थे।

'हमें मदद करनी चाहिए थी, समीर,' कल्याणी की आवाज़ में ग्लानि थी। समीर ने कुछ नहीं कहा, बस चुपचाप उन कागज़ों को फाड़ दिया जो उन्होंने मुरारी को वहाँ से बेदखल करने के लिए तैयार किए गए थे। मानवी की नज़र कल्याणी से जा मिली। उस नज़र में अब न नफरत थी, न शिकायत बल्कि उसमें सिर्फ एक आत्मग्लानि थी।

सूरज की रोशनी कल्याणी देवी के बंद दरवाजे और मुरारी काका की खुली झोपड़ी, दोनों पर एक समान पड़ रही थी। लेकिन 'आकाशगंगा हाइट्स' के चमकते शीशों वाले फ्लैट्स आज उस पुरानी झुग्गी के सामने धुंधले लग रहे थे। उसने मन ही मन प्रार्थना की, 'हे ईश्वर! चमकती गाड़ियों वाले पड़ोसी चाहे न देना, पर मुरारी काका जैसा 'पड़ोसी' हर देहरी पर सलामत रखना।' इधर मानवी ने अपने घर के देहरी पर कदम रखा और उधर मुरारी काका रिक्शा मोड़कर अपनी झोपड़ी की ओर बढ़ रहे थे।

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