सलीका
वह सुबह स्कूल खुलने से पहले आता और शाम को सबके जाने के बाद सफाई करके जाता।;
उसी स्कूल में, एक कोने में सलीम रहता था। वह उस स्कूल का चपरासी था। उसकी वर्दी साधारण थी, काम बोझिल था। और समाज की नजरों में उसकी हैसियत नगण्य। वह सुबह स्कूल खुलने से पहले आता और शाम को सबके जाने के बाद सफाई करके जाता। उसकी दुनिया फाइलों की ढेरियों, घंटियों की आवाज और मेजों की सफाई तक सीमित थी। कोई उसे खास नहीं समझता था। बच्चों के लिए वह 'सलीम चाचा' था, और शिक्षकों के लिए बस एक आज्ञाकारी कर्मचारी। लेकिन अमीना बेगम के लिए वह सिर्फ एक ज़रूरत था, एक ऐसा इंसान जो उनकी चाय ठीक से बना सके। अमीना बेगम के दिन का आगाज़ एक ख़ास चीनी मिट्टी के कप में परोसी गई चाय से होता था। यह उनके लिए सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि दिन भर की थकान और दिमागी उलझनों का मरहम था। और यह हुनर सिर्फ सलीम के पास था।
नवाबों के शहर लखनऊ में सूरज अपनी पूरी आबो-ताब के साथ आग बरसा रहा था। तपती लू के थपेड़ों और शहर के शोर-ओ-गुल के बीच 'अल-नूर हाई स्कूलÓ की ऊँची और स$फेद दीवारें एक अजीब सी ख़ामोशी और सुकून का अहसास दिलाती थीं। यह स्कूल शहर के रईस, रसूखदार और संभ्रांत परिवारों की पहली पसंद था, और इसकी पूरी बागडोर 'अमीना बेगमÓ के हाथों में थी। स्कूल की साख जितनी इसकी भव्य और पुरानी इमारतों से थी, उससे कहीं ज़्यादा अमीना बेगम के बेमिसाल और सख्त अनुशासन से थी।
अमीना बेगम न$फासत और उसूलों का दूसरा नाम थीं। खानदानी रईसियत उनके चेहरे के तेज और चाल की गरिमा में झलकती थी। उनका रुतबा एक ऐसी अभेद्य दीवार की तरह था, जिसे लांघने की जुर्रत कोई आम इंसान नहीं कर सकता था। उनकी आहट मात्र से गलियारों की सरगोशियाँ थम जाती थीं। उनके लिए अनुशासन महज़ नियम नहीं, बल्कि इबादत जैसा था। और शायद इसी अनुशासन की ओट में उन्होंने अपने अकेलेपन और जज़्बातों को कहीं द$फन कर दिया था।
उसी स्कूल में, एक कोने में सलीम रहता था। वह उस स्कूल का चपरासी था। उसकी वर्दी साधारण थी, काम बोझिल था। और समाज की नजरों में उसकी हैसियत नगण्य। वह सुबह स्कूल खुलने से पहले आता और शाम को सबके जाने के बाद सफाई करके जाता। उसकी दुनिया फाइलों की ढेरियों, घंटियों की आवाज और मेजों की सफाई तक सीमित थी। कोई उसे खास नहीं समझता था। बच्चों के लिए वह 'सलीम चाचाÓ था, और शिक्षकों के लिए बस एक आज्ञाकारी कर्मचारी। लेकिन अमीना बेगम के लिए वह सिर्फ एक ज़रूरत था, एक ऐसा इंसान जो उनकी चाय ठीक से बना सके।
अमीना बेगम के दिन का आगाज़ एक ख़ास चीनी मिट्टी के कप में परोसी गई चाय से होता था। यह उनके लिए सिर्फ एक पेय नहीं, बल्कि दिन भर की थकान और दिमागी उलझनों का मरहम था। और यह हुनर सिर्फ सलीम के पास था।
सलीम के काम करने के तरीके में एक अजीब सा 'सली$काÓ और रूहानी व$फादारी थी। जब वह ट्रे लेकर उनके केबिन में दाखिल होता, तो उसके कदमों की आहट भी अदब का दामन नहीं छोड़ती थी। वह मेज़ पर कप इस नज़ाकत से रखता जैसे कोई इबादत कर रहा हो। न ट्रे की खनक, न चाय की कोई बूंद प्याली से बाहर छलकती, और न ही मेज़पोश पर कोई दाग पड़ता। उसकी खामोशी में भी एक गरिमा थी।
शुरुआत में अमीना बेगम ने इसे केवल एक कर्मचारी की कुशलता के रूप में देखा। लेकिन दिन बीतते गए और महीने बदलते गए, तो इस साधारण क्रिया में उन्हें कुछ गहराई महसूस होने लगी। उन्होंने गौर किया कि सलीम के चेहरे पर कभी थकान की शिकन नहीं आती, चाहे काम कितना भी ज्यादा क्यों न हो। उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक थी, जो ईमानदारी और अपने काम के प्रति समर्पण की गवाह थी। वह जब भी अमीना बेगम से बात करता, तो उसकी आवाज में एक अदृश्य सम्मान होता, जो डर से नहीं, बल्कि दिल से निकला हुआ आदर लगता था।
एक रोज़ स्कूल की साख पर किसी विवाद के कारण आंच आ गई। अमीना बेगम अंदर से टूट चुकी थीं। केबिन में फाइलें बिखरी थीं और उनका चेहरा तनाव से सुर्ख था। सलीम हमेशा की तरह चाय लेकर आया। उसने कमरे के भारीपन को महसूस कर लिया। वह मुड़ने ही वाला था कि रुक गया और बेहद धीमी मगर पुरअसर आवाज़ में बोला:
'मैडम... गुस्ताख़ी मा$फ हो, पर एक बात अज़र् करना चाहता हूँ। साख और इज़्ज़त बचाने की इस दौड़ में हम अक्सर खुद को ही कहीं पीछे छोड़ देते हैं। अगर इंसान के अंदर का 'आपÓ ही मुरझा जाए, तो बाहर की वाह-वाही किस काम की? '
कमरे में एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। अमीना बेगम ने कुछ नहीं कहा। सलीम जा चुका था, लेकिन उसके शब्द अमीना बेगम के ज़हन में गूँज रहे थे।
अमीना बेगम हतप्रभ थीं। एक मामूली चपरासी ने वह बात कह दी थी जिसे समझने में लोग पूरी उम्र गुज़ार देते हैं। उस दिन के बाद अमीना बेगम की नज़रें बदल गईं। उन्होंने देखा कि सलीम सिर्फ काम नहीं करता, वह रूह से जुड़ा है। वह बच्चों को डाँटने के बजाय सली$के से समझाता था। किसी गरीब बच्चे की फीस के लिए अपनी तनख्वाह से चुपचाप मदद कर देता था। स्कूल के बगीचे को वह ऐसे सींचता, जैसे वह उसकी अपनी कायनात हो।
एक दिन अमीना बेगम ने देखा कि एक बच्चा रो रहा था। उसकी किताबें फट गई थीं। और सलीम उसे अपने पास बिठाकर धीरे-धीरे उन्हें चिपका रहा था।
'रो मत बेटा... चीज़ें टूटती हैं, लोग नहीं। '
अमीना बेगम को यह वाक्य सीधे दिल में उतर गई। एक दिन उन्होंने पूछा, 'सलीम, तुम हर काम इतने सली$के से कैसे कर लेते हो? कभी एक बूंद चाय भी नहीं छलकी तुमसे। '
सलीम ने मुस्कुराकर ज़मीन की ओर देखा और कहा,
'मेम साहब, जब मैं किसी को कुछ देता हूं, तो चाहता हूं कि वह उसे मुकम्मल पहुंचे। चाय हो या इज्जत, दोनों संभाल कर देने में ही असली खुशी है। '
अमीना बेगम को लगा जैसे किसी ने उनके अंतर्मन का आईना दिखा दिया हो। उस पल उन्हें एहसास हुआ कि इंसान का कद उसकी पोशाक या पद से नहीं, बल्कि उसके सोच से तय होता है। अमीना के दिल में सलीम के लिए जो सम्मान था, वह धीरे-धीरे एक अनछुए लगाव में बदलने लगा था । उन्हें अब उस वक्त का इंतज़ार रहता जब सलीम चाय लेकर आए और दो पल की गुफ्तगू हो।
एक शाम, जब स्कूल खाली हो चुका था, अमीना बेगम ने सलीम को अपने केबिन में बुलाया। सलीम थोड़ा घबराया हुआ था, उसे लगा शायद कोई गलती हो गई होगी। अमीना ने उसे बैठने का इशारा किया, लेकिन वह हमेशा की तरह अदब से खड़ा रहा।
'सलीम ... '
'जी मैडम? '
'सलीम, तुम इतने पढ़े-लिखे और समझदार हो... फिर यहाँ इस हाल में क्यों? '
सलीम हल्का सा मुस्कुराया,
'क्योंकि जि़ंदगी ने मुझे यहाँ रखा है। '
'मतलब? '
सलीम की आँखों में पुरानी यादों की परछाईं उभरी, 'जि़ंदगी के अपने फैसले होते हैं मैडम। वालिद की बीमारी और मु$फलिसी ने यहाँ ला खड़ा किया। फिर भी मलाल नहीं, क्योंकि मेरा मानना है कि कोई काम छोटा-बड़ा नहीं होता, नीयत छोटी होती है। '
अमीना बेगम चुप हो गईं। अमीना बेगम के दिल में सलीम के लिए इज़्ज़त अब मुहब्बत की शक्ल अख्तियार करने लगी थी। पहली बार उन्हें लगा कि उन्होंने लोगों को सिर्फ उनके रुतबे से पहचाना है, इंसानियत से नहीं। सलीम के साथ बिताए छोटे-छोटे पल अब उन्हें सुकून देने लगे थे।
धीरे-धीरे, चाय परोसने के इस रोजमर्रा के रिवाज में बातें बढ़ने लगीं। कभी सलीम स्कूल के बच्चों की शरारतों का जिक्र करता, तो कभी अमीना बेगम अपने दिन की थकान का। इन छोटी-छोटी बातचीत ने दोनों के बीच एक अनदेखी दोस्ती का पुल बना दिया। अमीना को महसूस होने लगा कि सलीम की मौजूदगी में उन्हें एक सुकून मिलता है, जो उन्हें अपने हमशक्ल या बराबर के रुतबे वाले लोगों के पास नहीं मिलता था। सलीम की सादगी, उसकी मेहनत और दूसरों के प्रति उसका सम्मानजनक व्यवहार धीरे-धीरे प्रशंसा से प्यार में तब्दील होने लगा।
एक दिन उन्होंने खुद से सवाल किया, 'क्या मुझे एक चपरासी से मोहब्बत हो सकती है?' जवाब मिला, 'मोहब्बत चपरासी से नहीं, उस सली$के और रूह से है जो इस इंसान में बसती है। '
लेकिन यह प्यार आसान नहीं था। अमीना बेगम जानती थीं कि समाज उन्हें क्या कहेगा। एक स्कूल की प्रिंसिपल और एक चपरासी का रिश्ता? लोग ताने मारेंगे, रुतबे का सवाल उठाएंगे, और शायद उनकी इज्जत पर उंगली उठाएं। समाज की ये दीवारें बहुत ऊंची थीं। कई रातें अमीना ने जाग कर गुजारीं, अपने दिल और दिमाग की लड़ाई लड़ी। एक तरफ समाज का डर था, तो दूसरी तरफ सलीम का वह अंदाज जिसने उनके दिल को छू लिया था। अंत में, दिल की सुनने का फैसला उन्होंने किया। उन्होंने ठान लिया कि प्यार किसी मोल या पद का मोहताज नहीं होता।
और एक दिन उनके अनुशासन ने उनके दिल के आगे घुटने टेक दिए।
'सलीम,' अमीना ने कांपती लेकिन दृढ़ आवाज में कहा, 'मैंने तुम्हें केवल चाय परोसते नहीं, बल्कि जिंदगी को सली$के से जीते देखा है। तुम्हारी सादगी ने मेरे अनुशासन की कठोरता को पिघला दिया है। मैं तुम्हारे साथ अपनी बाकी की जिंदगी गुज़ारना चाहती हूँ। क्या तुम मुझसे निकाह करोगे?'
सलीम हक्का-बक्का रह गया। उसकी आंखों में आंसू भर आए। उसने कांपती आवाज़ में कहा, 'मैडम, मैं खाकसार और आप शहजादी... लोग बातें बनाएंगे। '
अमीना ने मुस्कुराकर कहा, 'बातें तो तब भी होती थीं जब मैं अकेली और सख्त थी। अब कम से कम मेरे पास वो इंसान होगा जो चाय और रिश्ते, दोनों को संभालना जानता है। '
सलीम ने सिर उठाया और खुशी-खुशी हामी भर दी। उसने स्वीकार किया कि वह भी अमीना बेगम के व्यक्तित्व और उनके न्यायपूर्ण स्वभाव का कायल हो चुका था। दोनों ने फैसला किया कि वे रिश्तों को आगे बढ़ाएंगे।
आज भी अमीना बेगम स्कूल की प्रिंसिपल हैं और सलीम आज भी उनके लिए चाय लेकर आता है। लेकिन अब उस चाय में इलायची की खुशबू के साथ-साथ बराबरी, सम्मान और बेइंतहा मोहब्बत की मिठास घुल गई है।