'एमएसपी' को कानूनी दर्जा देने से मजबूत होगी कृषि
कृषि के मामले में स्पष्ट है कि सरकार 23 फसलों पर 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' (एमएसपी) घोषित करती है
- के आर सुधामन
अक्सर 'एमएसपी' के संदर्भ में कहा जाता है कि वित्तीय बोझ होगा। यदि हम मानकर चलें कि फसलों के लिए हमें सरकारी उपार्जन और निजी बाज़ार दोनों की ज़रूरत है, तो उपार्जन का खर्चा अपने आप कम हो जाता है। दूसरा, इसे सब्सिडी की नज़र से न देखकर निवेश के रूप में देखें। क्या इस निवेश से विकास की पूर्ति हो रही है? किसानों को उचित भाव मिलना और खेती में सुरक्षा एवं गरिमा महसूस करना महत्वपूर्ण लक्ष्य है।
कृषि के मामले में स्पष्ट है कि सरकार 23 फसलों पर 'न्यूनतम समर्थन मूल्य' (एमएसपी) घोषित करती है, जबकि 'भारतीय खाद्य निगम' (एफसीआई) के माध्यम से कुछ ही इलाकों में मुख्यत: गेहूं और धान भर खरीदती है। यानी 'एमएसपी' पर उपज खरीदने की सरकारी घोषणा महज कागजी होती है। सरकार की दलील रही है कि यदि वह सभी फसलें खरीदे तो उसका वित्तीय बोझ असहनीय हो जाएगा। ऐसे में इस दलील को परखना जरूरी है। मूल बात यह है कि सरकारी खरीदी एवं निजी बाज़ार-व्यापार साथ-साथ चलते हैं। ये व्यवस्थाएं कॉम्पिटिशन के साथ एक दूसरे की पूरक बन जाती हैं। इन 23 'एमएसपी' फसलों को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है
अव्वल तो कुछ फसलें ऐसी हैं, जिनका निजी बाज़ार मज़बूत है, खासकर जिनकी कारखानों के लिए खरीदी होती है। इन फसलों के लिए 'एमएसपी' एक न्यूनतम भाव, यानी मंडी में 'फ्लोर प्राइस' बन सकती है। इसे हम एक उदाहरण से समझ सकते हैं - वर्ष 2023 में फसल आने पर सोयाबीन का भाव 4500 रुपए से 5000 रुपए च्ंिटल था। व्यापारी मिलों के लिए सोयाबीन मण्डियों से खरीद रहे थे। 'एमएसपी' का भाव 4600 रुपए क्विंटल था। एक वर्ष पहले यह भाव 6000 रुपए क्विंंटल के ऊपर था। यदि विशेष परिस्थितियों में मण्डियों में बोली लगातार 'एमएसपी' के नीचे लग रही हो तो सरकार को दखल देना चाहिए। यह दो तरीकों से हो सकता है।
मण्डियों के कर्मचारी यह व्यवस्था सुनिश्चित करें कि किसान के माल की बोली एक निर्धारित गुणवत्ता के अनुसार 'एमएसपी' से कम दाम पर न हो। जहां मिल द्वारा उपज खरीदी जाती है, वह भी 'एमएसपी' से कम पर न हो। यदि भाव को नियंत्रित करना ज़रूरी हो तो अंश-कालिक सरकारी खरीदी खोल देनी चाहिए। कॉम्पिटिशन से निजी बाज़ार पर प्रभाव पड़ेगा और दाम ऊपर आएंगे। कई व्यापारिक फसलें जिनका आमतौर पर बाज़ार भाव 'एमएसपी' के ऊपर रहता है, उनके लिए सरकार को उपार्जन की ज़रूरत नहीं है। कभी-कभी सरकारी खरीदी करना पड़ सकती है।
दूसरी सूची उन फसलों की होगी जिनका कटाई के बाद का भाव 'एमएसपी' से 10 से 30 प्रतिशत नीचे रह सकता है। उदाहरण के लिए जब मक्का का भाव कटाई के समय 1750 रुपए क्विंंटल था तब 'एमएसपी' का भाव 2090 रुपए क्विंटल था। इस दौरान किसी को भी 'एमएसपी' नहीं मिल रही थी। इस फसल पर निजी बाज़ार 'एमएसपी' के नीचे ही चलता रहा। ऐसी स्थिति में सरकार के लिए केवल 'एमएसपी' के नियम को लागू करने से काम नहीं चलेगा। भाव को ऊपर खींचना होगा। इसके लिए सरकार को विकेंद्रीकृत तरीके से हर जिले में छोटे-छोटे उपार्जन-केंद्र खोलने होंगे और 10 से 40 प्रतिशत फसल खरीदने की व्यवस्था बनानी होगी।
उदाहरण के लिए गेहू्ं को देखें। एक जिले में 50 से अधिक उपार्जन केंद्र हैं। किसान पंजीयन करते हैं और उन्हें पास का केंद्र मिल जाता है। उपार्जन के बाद पैसे उनके बैंक खाते में डाल दिए जाते हैं। इस विकेंद्रीकृत व्यवस्था के कारण 30 से 50 प्रतिशत किसान इसका लाभ ले पाए। बड़ी बात यह रही कि निजी व्यापार पर कॉम्पिटिशन का असर पड़ा और मंडी के भाव 'एमएसपी' के पास या अधिक रहे। उपार्जन ने निजी व्यापार भाव को भी ऊपर उठाया। 40 से 60 प्रतिशत व्यापार निजी बाज़ार से हुआ और किसानों को उचित भाव मिले।
नया कानून इसको सुनिश्चित कर सकता है। हर वर्ष 'एमएसपी' की घोषणा के साथ-साथ विकेंद्रीकृत उपार्जन व्यवस्था की घोषणा अनिवार्य होनी चाहिए। हर राज्य के लिए कुछ ऐसी फसलों को (गेहूं और चावल को छोड़कर) चुना जाए जिनका निजी व्यापार या मंडी भाव ऊपर उठाया जा सकता है। यह सार्वजनिक हित में होगा और किसान के लिए प्रोत्साहन बनेगा तथा मिश्रित खेती को भी बढ़ावा मिलेगा। हर राज्य की सूची अलग होगी, पर सभी को मिलाकर देखें तो 23 'एमएसपी' फसलों में अधिकांश को कवर कर पाएंगे।
इसे अनिवार्य करने के लिए 'एमएसपी' की घोषणा से उपार्जन को जोड़ना होगा और केंद्र द्वारा संचालित 'एफसीआई' को जिम्मेदारी एवं वित्तीय खर्च उठाना होगा। हर राज्य के लिए गेहूं और धान के साथ चुनिन्दा क्षेत्रीय फसलों पर यह नियम लागू होगा। केन्द्र और राज्य इसे तय करेंगे। कई मायनों में 'एफसीआई' का काम बढ़ेगा। उन्हें उन राज्यों में इंफ्रास्ट्रक्चर या सार्वजनिक व्यवस्था में निवेश करना होगा, जहां आज उपार्जन की व्यवस्था नहीं है। 'एफसीआई' को गेहूं और चावल इन नए इलाकों से भी खरीदने होंगे और उसे अन्य फसलों के लिए भंडारण और वितरण की व्यवस्था बनानी होगी। गेहूं और चावल को छोड़कर 'एफसीआई' को 30 प्रतिशत दूसरी फसलों का भण्डारण करना चाहिए, अन्यथा बिना उपार्जन वाली 'एमएसपी' व्यवस्था एक खोखली घोषणा भर बनी रहेगी।
जैसा पहले कहा गया है, केवल उपार्जन से बात नहीं बनेगी। मंडी में निजी बाज़ार भाव को ऊपर उठाना होगा। 60-70 प्रतिशत व्यापार निजी बाज़ार से होना है। इसके लिए राज्य सरकार को सार्वजनिक मंडी को मज़बूत बनाना होगा और उसमें निवेश करना होगा। पारंपरिक मंडी को बेहतर बनाना और वहां खुली नीलामी एवं निगरानी की व्यवस्था कायम करनी होगी। इन सब पर अध्ययन हैं, लेकिन उनकी अनुशंसाओं पर काम नहीं हुआ है।
तीसरी सूची उन फसलों की है, जिनका बाज़ार भाव 'एमएसपी' से बहुत दूर है। कई दशकों की मार से इन फसलों की मांग घट गई है। किसानों ने इन्हें लगभग छोड़ दिया है। इनमें 'मोटा अनाज' शामिल है, जो सबसे पौष्टिक है, पर इनका चलन बहुत कम है। उदाहरण के लिए ज्वार एक समय मुख्य अनाज होता था। दो वर्ष पहले उसका मण्डी भाव 1300 रुपए क्विंटल से 1450 रुपए क्विंटल था, जबकि 'एमएसपी' 2738 रुपए क्विंंटल था। ऐसी परिस्थिति में केवल सरकारी खरीदी से बात नहीं बनेगी। यहां लक्ष्य होगा कि जनमानस में फिर से इसका चलन बने। ज्वार, बाजरा, जौ, रागी आदि इसी समूह में आते हैं। इनकी खपत बढ़ाना ज़रूरी लक्ष्य होना चाहिए, तभी किसान इनकी खेती के लिए प्रोत्साहित होंगे। यहां सरकारी खरीदी के साथ-साथ उत्पादन के लिए विशेष मदद करनी होगी।
इन समूहों को देखते हुए यह बात साफ हो जाती है कि हर राज्य को अपनी परिस्थितियों के अनुसार लक्ष्य बनाना होगा। 'एमएसपी' का मॉडल केंद्रीय कानून हो सकता है, जिसे राज्यों को अपनाते हुए नियम एवं योजनाओं को बनाना होगा। यहां किसान संगठनों की अहम भूमिका होनी चाहिए, क्योंकि मिश्रित खेती पर लौटने के लिए, किसानों से चर्चा करके योजना बनाई जानी चाहिए। केंद्रीय कानून में राज्यों को वित्तीय सहायता देने के प्रावधान होना चाहिए, ताकि वे व्यवस्था बना पाएं। अन्यथा हम कभी गेहूं-धान के चक्र से नहीं निकल सकते।
अक्सर 'एमएसपी' के संदर्भ में कहा जाता है कि वित्तीय बोझ होगा। यदि हम मानकर चलें कि फसलों के लिए हमें सरकारी उपार्जन और निजी बाज़ार दोनों की ज़रूरत है, तो उपार्जन का खर्चा अपने आप कम हो जाता है। दूसरा, इसे सब्सिडी की नज़र से न देखकर निवेश के रूप में देखें। क्या इस निवेश से विकास की पूर्ति हो रही है? किसानों को उचित भाव मिलना और खेती में सुरक्षा एवं गरिमा महसूस करना महत्वपूर्ण लक्ष्य है। खेती को मिश्रित फसल चक्र पर ले जाना कृषि विकास के लिए ज़रूरी कदम होगा। मंडी व्यवस्था को बेहतर और न्यायसंगत बनाना कृषि बाज़ार के लिए उचित होगा। खाद्य नीति को केवल गेहूं-धान तक सीमित नहीं रखकर उसमें मोटे अनाज, तेल और दालों को शामिल करना ज़रूरी है। 'एमएसपी' को क़ानूनी स्वरुप देना मज़बूरी नहीं, कृषि विकास के लिए एक मौका है।
( लेखक 'एकलव्य फॉउन्डेशन' के पूर्व-निदेशक हैं।)