हक मांगने दिल्ली पहुंचे आदिवासी
सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विस्थापन के मुहाने पर खड़े आदिवासी आज राजधानी दिल्ली अपना हक मांगने पहुंचे
नई दिल्ली। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के विस्थापन के मुहाने पर खड़े आदिवासी आज राजधानी दिल्ली अपना हक मांगने पहुंचे। इनमें बड़ी संख्या में युवा थे। आदिवासियों का कहना था, कि उन्हें उनका हक चाहिए, जो आदिवासी जहां रह रहा है, उसे वहीं पट्टा दिया जाना चाहिए। सरकार को इसके लिए अध्यादेश लाना चाहिए साथ ही पुराने वनाधिकार कानून को मजबूत करना चाहिए। जंतर-मंतर पहुंचे ये आदिवासी मंडी हाउस से रैली के रुप में यहां पहुंचे। आदिवासियों की इस मांग का समर्थन करने के लिए शहर के तमाम बुद्धिजीवी भी पहुंचे, उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत भी आदिवासियों के साथ खड़े हुए। 5 मार्च को देशभर के आदिवासी संगठन भारत बंद करने वाले हैं।
आदिवासी नेताओं का कहना है, कि औपनिवेशिक काल के दौरान और स्वतंत्र भारत में भी राज्य वनों के समेकन के परिणामस्वरूप जंगल में रहने वाले अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों के साथ ऐतिहासिक अन्याय हुआ | वाइल्ड लाइफ फर्स्ट नामक नॉन गवर्नमेंट आर्गेनाईजेशन जो इस केस में पार्टी है जिनका तर्क है की आदिवासी उपस्तिथि से पारिस्थितिकी तंत्र को हानि पहुंचेगी, हालाँकि 2006 का वन अधिकार अधिनियम ये स्पष्ट करता है, कि वन पारिस्थितिकी तंत्र के अस्तित्व और स्थिरता के लिए आदिवासी अभिन्न अंग हैं |
विकास के नाम पर विस्थापन की प्रक्रिया आदिवासियों को संविधान के अनुच्छेद 21 द्वारा प्रद्दत जीवन जीने के मूल अधिकार का उल्लंघन है | आदिवासी नेताओं का कहना है, कि सरकार की नजर जंगल की संपदा पर है, जिसे वे पूंजीपतियों को लुटाना चाहते हैं। सभा को डा प्रफुल्ल बसावा, राजभाई बसावा, सियाराम मीणा जैसे नेताओं ने संबोधिक किया। इन नेताओं का कहना था, कि चुनाव के बाद 24 जुलाई को इस मामले में सुनवाई होनी है, तब सरकार फिर वहीं हरकत करेगी।
आदिवासी नेताओं ने अन्य राजनैतिक पार्टियों से भी अपील की, कि वे इस मामले को अपने घोषणापत्र में शामिल करें। अदालत द्वारा दिए गए आदेश के बाद आदिवासियों में इसकी तीखी प्रतिक्रिया है, आज झारखंड में भी जगह-जगह प्रदर्शन किए गए हैं। आदिवासी संगठन 5 मार्च को भारत बंद का आयोजन करने वाले हैं। आदिवासियों के इस आंदोलन को दिल्ली के छात्र संगठनों और दलित संगठनों का भी समर्थन मिला।