भारत और चीन की सेनाओं में कितना अंतर है, क्या ड्रोन बदल सकते हैं युद्ध की तस्वीर?
चीन की सैन्य ताकत भारत से कितनी आगे है? ड्रोन, रक्षा तकनीक और सैन्य तैयारियों में भारत के सामने क्या चुनौतियां हैं?

ITBP के डीजी ने कहा है कि चीन के सैन्य आधुनिकीकरण को पारंपरिक तरीकों से चुनौती देना मुश्किल होगा. भारत और चीन के रक्षा खर्च, हथियारों, सैन्य तैयारी और ड्रोन क्षमता में कितना अंतर है?
भारत-चीन सीमा पर तनाव के बीच भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) के महानिदेशक शत्रुजीत कपूर ने कहा है कि चीन की सैन्य ताकत का पारंपरिक तरीकों से मुकाबला करना मुश्किल हो सकता है. उनके मुताबिक, चीन ने अपनी सेना के आधुनिकीकरण और हथियारों पर बड़े पैमाने पर निवेश किया है. शत्रुजीत कपूर ने ड्रोन को ऐसा विकल्प बताया जिसके जरिए छोटे देश भी बड़ी सैन्य शक्तियों को चुनौती दे सकते हैं.
शत्रुजीत कपूर गुरुवार को राजस्थान के अलवर स्थित सेंट्रल ट्रेनिंग कॉलेज में हिमवीर सम्मान समारोह में शामिल हुए थे. उन्होंने कहा कि जुलाई के अंत से अरुणाचल प्रदेश के ऊपरी सुबनसिरी जिले के असाफिला और माजा इलाकों में तनाव है और भारत ने सीमा पर तैनाती बढ़ाई है.
कपूर का यह बयान ऐसे समय आया है जब दोनों देश 2020 में गलवान घाटी में हुई हिंसक झड़प के बाद सीमा पर शांति बनाए रखने और द्विपक्षीय संबंध सुधारने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन सैन्य तैयारियों और वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी LAC पर अपनी स्थिति को लेकर दोनों देशों की चिंताएं बनी हुई हैं.
ऐसे में सवाल है कि क्या चीन ने सैन्य क्षमता में भारत पर इतनी बढ़त हासिल कर ली है कि पारंपरिक तरीकों से उसका मुकाबला करना मुश्किल हो गया है या फिर दोनों देशों के बीच अंतर अलग-अलग क्षेत्रों में अलग है?
दोनों देशों के रक्षा खर्च में कितना अंतर है?
भारत और चीन की सैन्य क्षमता के बीच अंतर समझने का एक महत्वपूर्ण पैमाना रक्षा खर्च है. स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) के मुताबिक, चीन ने 2025 में अपनी सेना पर अनुमानित 336 अरब डॉलर खर्च किए जबकि भारत का सैन्य खर्च इसी अवधि में 92.1 अरब डॉलर था. इस तरह चीन का खर्च भारत के मुकाबले लगभग 3.6 गुना ज्यादा था.
यही नहीं, चीन के सैन्य खर्च में लगातार बढ़ोतरी हुई है. SIPRI के मुताबिक, साल 2016 से 2025 के बीच चीन का सैन्य खर्च 62 प्रतिशत बढ़ा है. वहीं भारत में वित्त वर्ष 2026-27 के केंद्रीय बजट में रक्षा मंत्रालय को 7.85 लाख करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं जिसमें रक्षा बलों के आधुनिकीकरण और पूंजीगत खरीद के लिए भी राशि बढ़ाई गई है. हालांकि, रक्षा मंत्रालय के कुल बजट में वेतन, पेंशन, रखरखाव और अन्य खर्च भी शामिल होते हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ बजट की तुलना से यह तय नहीं हो सकता कि युद्ध की स्थिति में किस देश को कितना फायदा मिलेगा बल्कि यह भी देखना होगा कि इस खर्च से कौन-सी क्षमताएं विकसित हुई हैं, हथियार कितनी तेजी से उपलब्ध हो सकते हैं और सेना उन्हें वास्तविक परिस्थितियों में कितनी प्रभावी ढंग से इस्तेमाल कर सकती है.
डीडब्ल्यू से बातचीत में रक्षा और सामरिक मामलों के जानकार कोमोडोर सी उदयभास्कर कहते हैं, "भारत और चीन की रक्षा तैयारियों के बीच काफी बड़ा अंतर है और भारत को सतर्क रहने की जरूरत है. साल 2020 में गलवान झड़प के बाद से चीन की स्थिति काफी मजबूत हो गई है. दूसरी ओर, विदेश मंत्रालय के हालिया बयान से ऐसा लगता है कि भारत सीमा पर मौजूदा स्थिति को स्वीकार करने के लिए तैयार है.”
सैन्य आधुनिकीकरण में चीन को क्या बढ़त मिली है?
चीन का सैन्य आधुनिकीकरण केवल सैनिकों और हथियारों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें लड़ाकू विमान, मिसाइल, नौसेना, मानवरहित विमान, निगरानी व्यवस्था और साइबर क्षमताएं भी शामिल हैं.
भारत के सामने चुनौती यह है कि उसे चीन के साथ-साथ पाकिस्तान को भी अपनी सुरक्षा योजना में ध्यान में रखना पड़ता है. इसके अलावा भारत को अपनी लंबी स्थल और समुद्री सीमाओं पर सैन्य संसाधनों का इस्तेमाल करना होता है. इसका मतलब यह है कि भारत की सैन्य योजना में संसाधनों का वितरण भी उतना ही अहम है जितना उनका कुल आकार. हालांकि, सीमा के किसी खास हिस्से में सैन्य संतुलन सैनिकों की तैनाती, रसद, स्थानीय भूगोल और एयर सपोर्ट जैसे कारकों पर भी निर्भर करता है.
विशेषज्ञों का कहना है कि चीन की सड़क और रेल परियोजनाओं से उसे लॉजिस्टिक्स के जो फायदे मिलते हैं, वो काफी अहम हैं. हालांकि भारत ने भी सीमा पर सड़कों, सुरंगों और अग्रिम हवाई पट्टियों जैसी सुविधाओं को विकसित करने पर जोर दिया है. लेकिन सवाल यह है कि इन परियोजनाओं से सैनिकों, हथियारों और जरूरी सामान को सीमा तक पहुंचाने में कितना सुधार हुआ है और क्या चीन की तुलना में अभी भी कोई महत्वपूर्ण कमी बनी हुई है.
सी उदयभास्कर कहते हैं, "भारत को सैन्य तकनीक, खासकर ड्रोन के क्षेत्र में कहीं अधिक निवेश करने की जरूरत है. चीन बड़े पैमाने पर लाखों ड्रोन का उत्पादन कर रहा है, जबकि भारत में इनका उत्पादन महज हजारों तक सीमित है. भारत को अपनी उत्पादन क्षमता में काफी विस्तार करना होगा. इसके लिए सिर्फ ड्रोन की संख्या बढ़ाना ही नहीं, बल्कि उनकी गुणवत्ता और युद्ध के मैदान में प्रभावी इस्तेमाल की क्षमता पर भी ध्यान देना होगा. यही नहीं, ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सैन्य अभियानों की क्षमता तय करने में हवाई अड्डों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है. खासकर उनकी ऊंचाई और भौगोलिक स्थिति यह निर्धारित करती है कि ऐसे इलाकों में सैन्य अभियान कितने प्रभावी ढंग से चलाए जा सकते हैं.”
क्या ड्रोन पारंपरिक सैन्य अंतर कम कर सकते हैं?
ITBP प्रमुख शत्रुजीत कपूर के बयान का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा ड्रोन और एंटी-ड्रोन तकनीक को लेकर है. रूस-यूक्रेन युद्ध ने दिखाया है कि अपेक्षाकृत कम लागत वाले मानवरहित विमान निगरानी, लक्ष्य की पहचान और हमलों में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं. लेकिन इससे यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि ड्रोन अकेले किसी बड़ी सैन्य शक्ति को हरा सकते हैं. भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष में ड्रोन ने अहम भूमिका निभाई थी.
उदयभास्कर के मुताबिक, भारत को ड्रोन उत्पादन, रखरखाव, ऑपरेटरों के प्रशिक्षण और उन्हें अन्य सैन्य प्रणालियों से जोड़ने की क्षमता बढ़ानी होगी. साथ ही एंटी-ड्रोन तकनीक भी उतनी ही जरूरी है.
सीमा पर तैयारी: हथियारों से आगे की चुनौती
भारत और चीन की सैन्य क्षमता का आकलन केवल हथियारों और रक्षा खर्च से नहीं किया जा सकता. ऊंचाई वाले इलाकों में सैनिकों की तैनाती, ठंड में रहने की व्यवस्था, चिकित्सा सहायता, संचार, गोला-बारूद और ईंधन की उपलब्धता भी निर्णायक होती है.
भारत के लिए एक और महत्वपूर्ण सवाल रक्षा उत्पादन का है. चीन अपनी ज्यादातर रक्षा सामग्री का उत्पादन खुद करता है जबकि भारत हथियारों से लेकर अन्य तमाम चीजों के लिए दूसरों पर निर्भर है.
सी उदयभास्कर इस स्थिति को भी बहुत गंभीर मानते हैं. उनके मुताबिक, "चीन सर्विलांस यानी निगरानी, ड्रोन और सैटेलाइट क्षमताओं के मामले में भारत से कहीं आगे है. रक्षा उत्पादन के मामले में भी चीन ने काफी हद तक आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है और अपने सैन्य उपकरणों का बड़ा हिस्सा घरेलू स्तर पर बनाता है. इसके विपरीत, भारत अब भी विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर काफी हद तक निर्भर है. भारत की यह निर्भरता करीब 70 फीसदी है. पहले हम रक्षा जरूरतों के लिए मुख्य रूप से रूस पर निर्भर थे, लेकिन अब अमेरिका, फ्रांस और इस्राएल समेत कई देशों से आयात कर रहे हैं.”
बराबरी का मतलब क्या है?
चीन के रक्षा खर्च और आधुनिकीकरण की गति से भारत के सामने गंभीर चुनौती जरूर पैदा होती है लेकिन इस अंतर का वास्तविक सैन्य अर्थ समझने के लिए रक्षा खर्च के साथ रसद, हवाई सहायता, ड्रोन, इलेक्ट्रॉनिक युद्ध, प्रशिक्षण और घरेलू उत्पादन की तुलना भी जरूरी है.
सी उदयभास्कर एक और खास बात की ओर ध्यान दिलाते हैं. वो कहते हैं कि चीन से तुलना सिर्फ रक्षा मामलों में ही नहीं की जानी चाहिए बल्कि शिक्षा के मामले भी की जानी चाहिए. उनके मुताबिक, शिक्षा पर निवेश, शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षा का स्तर भी काफी कुछ तय करता है और इस मामले में भी भारत चीन से काफी पीछे है.
ड्रोन और दूसरी आधुनिक तकनीक इस तैयारी का महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकते हैं, लेकिन वे पारंपरिक सैन्य क्षमता, प्रशिक्षण और मजबूत आपूर्ति व्यवस्था का विकल्प नहीं हैं. भारत और चीन के सैन्य अंतर को समझने का असली सवाल इसलिए केवल यह नहीं है कि किस देश का बजट बड़ा है बल्कि सवाल यह है कि भारत अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए किन क्षमताओं में सुधार कर रहा है, किन क्षेत्रों में अंतर बना हुआ है और बदलती तकनीक उस अंतर को कितना प्रभावित कर सकती है.


