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क्या ईरान पर हमले के दौरान तोड़ा गया अंतरराष्ट्रीय कानून?

विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान पर किया गया हमला और वहां के सर्वोच्च नेता की हत्या संयुक्त राष्ट्र के नियमों का उल्लंघन है. इस्राएल इसे आत्मरक्षा बता रहा है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इसे गलत मान रहे हैं

क्या ईरान पर हमले के दौरान तोड़ा गया अंतरराष्ट्रीय कानून?
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विशेषज्ञों के अनुसार, ईरान पर किया गया हमला और वहां के सर्वोच्च नेता की हत्या संयुक्त राष्ट्र के नियमों का उल्लंघन है. इस्राएल इसे आत्मरक्षा बता रहा है, लेकिन कानूनी विशेषज्ञ इसे गलत मान रहे हैं.

संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनियो गुटेरेश ने 28 फरवरी को अमेरिका और इस्राएल द्वारा ईरान पर शुरू किए गए हमलों की कड़ी निंदा की है. उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के उन नियमों का हवाला दिया जो किसी दूसरे देश पर ताकत के इस्तेमाल को रोकते हैं. गुटेरेश ने कहा कि ये हमले ‘पूरी दुनिया की शांति और सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा' हैं.

अटलांटिक काउंसिल में ह्यूमन राइट्स लॉयर और स्ट्रेटेजिक लिटिगेशन प्रोजेक्ट की डायरेक्टर गिसू निया ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुझे लगता है कि ज्यादातर अंतरराष्ट्रीय कानून विशेषज्ञ इस बात से सहमत होंगे कि इस हमले का कोई कानूनी आधार नहीं है. यह संयुक्त राष्ट्र के चार्टर का सीधा उल्लंघन है.”

उन्होंने आगे कहा कि हम ईरान पर एक ऐसे हमले को देख रहे हैं जो न तो अंतरराष्ट्रीय कानून के हिसाब से सही है और न ही खुद अमेरिका के उन कानूनों के मुताबिक है जो बताते हैं कि जंग कैसे शुरू की जानी चाहिए.

हालांकि, निया ने यह भी कहा कि अंतरराष्ट्रीय कानूनी व्यवस्था भी 9.2 करोड़ ईरानियों को न्याय दिलाने में असफल रही है. उन्होंने कहा कि इन लोगों में से कई ने पिछले 47 वर्षों में ईरानी शासन द्वारा किए गए अंतरराष्ट्रीय कानून के उल्लंघन और गंभीर अत्याचारों का सामना किया है.

यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी सेना के ऑपरेशन की कानूनी वैधता पर सवाल उठे हैं. हालांकि, 2003 के इराक युद्ध के विपरीत, इस बार अमेरिकी सरकार दुनिया को यह समझाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन कर रही है. राष्ट्रपति ट्रंप ने 7 जनवरी, 2026 को 'न्यूयॉर्क टाइम्स' को दिए एक इंटरव्यू में साफ कह दिया, "मुझे अंतरराष्ट्रीय कानून की जरूरत नहीं है.” उन्होंने आगे यह भी कहा, "मेरा मकसद लोगों को नुकसान पहुंचाना नहीं है.”

क्या अमेरिका-इस्राएल अपने हमले को सही ठहराने के लिए आत्मरक्षा का दावा कर सकते हैं?

अमेरिका और इस्राएल के अधिकारियों का कहना है कि उन्होंने यह कदम ईरान से मिलने वाली धमकियों, खास तौर पर उसके परमाणु हथियार बनाने और इस्तेमाल करने के खतरे को रोकने के लिए उठाया है. हालांकि, कानूनी जानकारों का कहना है कि यह अभी साफ नहीं है कि क्या वे खतरे इतने ‘करीब आ चुके' थे कि उन्हें संयुक्त राष्ट्र के आत्मरक्षा के कड़े नियमों के तहत सही ठहराया जा सके.

संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अनुच्छेद 51 के अनुसार, कोई भी देश अपनी रक्षा के लिए ताकत का इस्तेमाल तभी कर सकता है जब उस पर पहले से ही ‘सशस्त्र हमला' हो चुका हो. हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानून की एक व्यापक व्याख्या यह भी कहती है कि ‘आने वाले खतरे' को रोकने के लिए भी हमला किया जा सकता है, लेकिन इस बात पर कानूनी विशेषज्ञों के बीच बहुत ज्यादा विवाद है.

ईरानी सरकार के अधिकारियों ने कई बार इस्राएल को ‘तबाह' करने की धमकियां दी हैं. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सिर्फ कड़वी बयानबाजी या धमकियां देने भर से किसी दूसरे देश पर सैन्य कार्रवाई करना कानूनी रूप से सही नहीं हो जाता.

जब अमेरिका और इस्राएल अपनी सेनाएं तैयार कर रहे थे, तब बड़े अमेरिकी अधिकारियों ने ईरान की परमाणु क्षमता को लेकर चेतावनी दी थी. 21 फरवरी, 2026 को अमेरिकी राजदूत स्टीव विटकॉफ ने कहा था कि ईरान इंडस्ट्रियल-ग्रेड बम बनाने का सामान तैयार करने से ‘शायद एक हफ्ते दूर' है.

हालांकि, यह बात अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप के उन बयानों से मेल नहीं खाती जो उन्होंने 2025 में ईरान पर बमबारी के बाद दिए थे. उस समय उन्होंने दावा किया था कि ईरान के परमाणु ठिकाने पूरी तरह से तबाह कर दिए गए हैं और उनका नामों-निशान मिट चुका है.

क्या खामेनेई की हत्या गैरकानूनी थी?

अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत किसी दुश्मन देश के राष्ट्राध्यक्ष को मारना बहुत विवादित माना जाता है. युद्ध के समय सैनिकों या लड़ाकों को निशाना बनाया जा सकता है, लेकिन किसी राजनीतिक नेता की जानबूझकर हत्या करना ‘योजना बनाकर की गई हत्या' की श्रेणी में आता है. खासकर तब, जब वह हमला खुद संयुक्त राष्ट्र के नियमों के हिसाब से सही न हो. यही वजह है कि अमेरिका और इस्राएल के साझा हमले में खामेनेई की मौत इस पूरे संघर्ष की अब तक की सबसे संवेदनशील कानूनी घटना बन गई है.

निया ने कहा, "इस हमले में ईरान के पूर्व सर्वोच्च नेता की मौत हुई है, जो पिछले कई सालों में लाखों ईरानियों की हत्या के लिए जिम्मेदार थे. खास तौर पर, इसी साल 8 और 9 जनवरी को हुआ नरसंहार आधुनिक इतिहास के सबसे भयानक नरसंहारों में से एक था. इस लिहाज से, बहुत से ईरानी लोग खामेनेई के इस अंत के लिए शुक्रगुजार हैं. हालांकि, उनमें से कुछ यह भी कह रहे हैं कि काश वे सर्वोच्च नेता को किसी अदालत के कठघरे में देख पाते. वे चाहते थे कि वह अपने गुनाहों का जवाब दें. इसलिए, यह मामला बहुत पेचीदा है.”

योजनाबद्ध हत्याओं पर रोक लगाने वाले अमेरिकी कानूनों का क्या?

अमेरिका में योजना बनाकर की जाने वाली हत्या में शामिल होने पर भी प्रतिबंध है. यह प्रतिबंध एक एग्जीक्यूटिव ऑर्डर के जरिए लागू किया गया था, जिस पर सबसे पहले 1976 में राष्ट्रपति गेराल्ड फोर्ड ने हस्ताक्षर किए थे. बाद में दूसरे राष्ट्रपतियों ने इसमें कुछ बदलाव भी किए. इसमें कहा गया है कि अमेरिकी सरकार के लिए काम करने वाला या उसकी ओर से काम करने वाला कोई भी व्यक्ति योजना बनाकर किसी की हत्या नहीं करेगा और न ही ऐसी साजिश में शामिल होगा.

फिर भी पिछले कई दशकों में अमेरिका ने इस प्रतिबंध को धीरे-धीरे कमजोर कर दिया है. ब्रिटेन के स्वानसी यूनिवर्सिटी में अंतरराष्ट्रीय संबंधों के एसोसिएट प्रोफेसर लुका ट्रेंटा ने कहा, "शुरू में यह लाइन बहुत महीन थी.” उन्होंने समझाया कि अमेरिका ने ऐसी नीति अपना ली थी कि अगर कोई कार्रवाई आत्म-रक्षा में की जाती है, तो उसे इस प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं माना जाएगा.

अली लारीजानी, जो पर्दे के पीछे से चला रहे हैं ईरान की हुकूमत

उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया कि अगर किसी विदेशी नेता की मौत सैन्य कमांड सेंटरों या उनके ठिकानों पर किए गए हमलों के दौरान होती है, तो उसे अब योजना बनाकर की गई हत्या नहीं माना जाता. उन्होंने 1986 के उस अमेरिकी हवाई हमले का उदाहरण दिया जिसमें लीबियाई नेता मुअम्मर गद्दाफी को मारने की कोशिश की गई थी लेकिन वे बच गए थे. उन्होंने आगे कहा, "मुझे लगता है कि यहां फर्क सिर्फ इतना है कि अमेरिकी सरकार और ट्रंप सोशल मीडिया के जरिए खुलकर इस हत्या की पूरी जिम्मेदारी ले रहे हैं.”

क्या ईरान को इस्राएल और अमेरिकी ठिकानों पर जवाबी हमला करने की अनुमति थी?

हमले शुरू होने के तुरंत बाद ईरान ने इस्राएल, अमेरिकी सैन्य ठिकानों और खाड़ी देशों के अन्य ठिकानों पर मिसाइलें और ड्रोन दागे. तेहरान का तर्क है कि वह खुद पर हुए हमले के जवाब में ‘आत्मरक्षा' के तहत यह कदम उठा रहा है. अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, अगर किसी देश पर हथियारों से हमला होता है, तो वह पलटवार कर सकता है. लेकिन इस्राएल और दुबई जैसे शहरों में आम नागरिक इलाकों को निशाना बनाना कानूनी सीमाओं का उल्लंघन है. अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून के तहत, नागरिकों पर हमले और उन देशों को युद्ध में घसीटने की मनाही है जो इस लड़ाई का हिस्सा नहीं हैं.

विशेषज्ञ ईरान के इन कदमों को ‘गलत दिशा में की गई आत्मरक्षा' कह रहे हैं. ऐसा इसलिए है क्योंकि ईरान ने अपनी मिसाइलें सिर्फ उन देशों (अमेरिका और इस्राएल) पर नहीं दागीं जिन्होंने उस पर हमला किया था, बल्कि उन पड़ोसी देशों पर भी हमले किए जहां अमेरिकी सेना के बेस मौजूद हैं. ईरान से चली मिसाइलों और ड्रोनों के बहरीन, कतर, यूएई, कुवैत, जॉर्डन, सऊदी अरब, ओमान और यहां तक कि साइप्रस जैसे कई देशों में गिरने की खबरें मिली हैं.

अमेरिका के सहयोगी देश क्या कहते हैं?

यूरोप में अमेरिकी सहयोगियों ने बहुत संभलकर अपनी प्रतिक्रिया दी है. कई देशों की सरकारों ने अमेरिका और इस्राएल की सीधे तौर पर आलोचना करने से परहेज किया, हालांकि उन्होंने इस बात पर चिंता जताई कि यह जंग बड़े इलाके में फैल सकती है. यूरोपीय नेताओं ने ईरान के पलटवार की तो कड़ी निंदा की, लेकिन अमेरिका और इस्राएल द्वारा किए गए शुरुआती हमलों की कानूनी वैधता पर पूरी तरह चुप्पी साध ली.

युद्ध खत्म होने के बाद कैसा दिख सकता है ईरान का भविष्य

जर्मनी के चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने रविवार को कहा, "आजकल अंतरराष्ट्रीय कानून सहित मौजूदा नियमों का पालन कम होता जा रहा है.” हालांकि, उन्होंने आगे यह भी कहा कि "यह समय अपने सहयोगियों (अमेरिका और इस्राएल) को उपदेश देने का नहीं है.” उन्होंने तर्क दिया कि पिछले कई दशकों से अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर ईरान को सुधारने की बहुत कोशिशें की गईं, लेकिन उन सबका ‘साफ तौर पर कोई असर नहीं हुआ'.

जर्मनी के विदेश मंत्री योहान वाडेफुल ने सोमवार को ‘डॉयचलांडफुंक' रेडियो पर कहा कि इस हमले को अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में रखने को लेकर ‘बड़े सवाल' और ‘शंकाएं' हैं. हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने ईरान से पैदा होने वाले गंभीर खतरे की ओर भी इशारा किया.

यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला फॉन डेय लाएन ने ईरान के घटनाक्रमों को ‘अत्यंत चिंताजनक' बताया. उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि आम नागरिकों की सुरक्षा करना और अंतरराष्ट्रीय कानून का सम्मान करना बेहद जरूरी है. यूरोप के बाहर इस पर मिली-जुली प्रतिक्रियाएं मिली हैं. ऑस्ट्रेलिया और कनाडा जैसे करीबी साथियों ने अमेरिका का समर्थन किया, जबकि अन्य देशों ने इस मामले से दूरी बनाए रखी.

वहीं दूसरी ओर, रूस और चीन ने अमेरिका और इस्राएल के इस अभियान की कड़ी आलोचना की. रूसी सरकार, जिसने खुद अपने पड़ोसी देश यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला किया है, ने बयान दिया, "रूस, हमेशा की तरह अंतरराष्ट्रीय कानून के आधार पर शांतिपूर्ण समाधान निकालने में मदद करने के लिए तैयार है.”

क्या यह युद्ध अंतरराष्ट्रीय कानून के कमजोर होने का संकेत है?

विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यह संघर्ष एक निर्णायक मोड़ साबित हो सकता है. अगर शक्तिशाली देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की अनुमति के बिना अपनी मर्जी से किसी देश पर एकतरफा हमले करते हैं और आत्मरक्षा की परिभाषा को व्यापक बना देते हैं, तो इससे युद्ध रोकने के लिए बनाए गए नियम खत्म होने लगते हैं.

ईरान युद्ध: रूस क्यों नहीं आ रहा ईरान की मदद के लिए सामने?

राजनीति विज्ञानी लुका ट्रेंटा ने डीडब्ल्यू को बताया, "मुझे लगता है कि हम विदेशी हस्तक्षेप के एक ऐसे क्रूर रूप को उभरते हुए देख रहे हैं, जहां घरेलू या अंतरराष्ट्रीय कानूनी सीमाओं की कोई परवाह नहीं की जा रही है.”

उन्होंने कहा कि अब तक ट्रंप प्रशासन ने जब भी सैन्य हमले या ऑपरेशन किए हैं, उसने अंतरराष्ट्रीय कानून के मानकों के आधार पर अपने कदमों को सही ठहराने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई है. उन्होंने कहा, "यह बात वेनेजुएला में निकोलस मादुरो की गिरफ्तारी के मामले में भी देखी जा सकती है. उस समय जो सफाई दी गई थी, उसमें अंतरराष्ट्रीय कानून को पूरी तरह से नजरअंदाज कर दिया गया और सिर्फ अमेरिकी घरेलू कानून के हिसाब से बात की गई थी.”

ट्रेंटा ने कहा कि वे इस बात से विशेष रूप से चिंतित हैं कि दुनिया अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ‘योजना बनाकर की जाने वाली हत्याओं के बढ़ते दौर' को देख रही है. उनका मानना है कि दूसरे देश भी इस तरीके को अपना सकते हैं और आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय विवादों को सुलझाने के लिए इस तरह की हत्याएं सामान्य बात बन सकती हैं.


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