अमेरिकी चुनाव में भारतीय-अमेरिकियों पर उम्मीदवारों की नजर, कोई बना रहा डोसा तो कोई पहुंच रहा मंदिर
भारतीय-अमेरिकी समुदाय की मजबूत मौजूदगी कैलिफोर्निया, टेक्सास, न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, इलिनोइस, पेंसिल्वेनिया और जॉर्जिया जैसे राज्यों में है। इन राज्यों में मतदाताओं की संख्या और राजनीतिक भागीदारी के कारण समुदाय चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

वॉशिंगटन: अमेरिका में मध्यावधि चुनावों की सरगर्मी तेज होने के साथ ही भारतीय-अमेरिकी मतदाता राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों के लिए महत्वपूर्ण हो गए हैं। उन्हें अपने पक्ष में करने के लिए उम्मीदवार अलग-अलग तरीके अपना रहे हैं। कोई भारतीय रेस्तरां में डोसा बनाकर समुदाय से जुड़ने की कोशिश कर रहा है तो कोई मंदिरों में पहुंचकर धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में हिस्सा ले रहा है। उम्मीदवारों की इन गतिविधियों के पीछे भारतीय-अमेरिकी समुदाय के बढ़ते राजनीतिक प्रभाव और चुनावी राज्यों में उसके वोटों की अहमियत को बड़ा कारण माना जा रहा है। डेमोक्रेटिक उम्मीदवार जेम्स टैलेरिको इसका ताजा उदाहरण हैं। टेक्सास में अमेरिकी सीनेट सीट के लिए रिपब्लिकन उम्मीदवार केन पैक्सटन को चुनौती दे रहे टैलेरिको हाल ही में डलास के उपनगर इरविंग के एक भारतीय रेस्तरां पहुंचे। यहां उन्होंने डोसा बनाने की कोशिश की। इरविंग में भारतीय-अमेरिकी समुदाय की बड़ी आबादी रहती है। टैलेरिको ने भारतीय व्यंजन तैयार करने की प्रक्रिया में हिस्सा लेकर स्थानीय लोगों से जुड़ने का संदेश दिया।
रेस्तरां में डोसा बनाकर समुदाय तक पहुंचने की कोशिश
काले सूट और सफेद कमीज पहने टैलेरिको ने सबसे पहले एक कटोरे से डोसे का घोल निकाला। इसके बाद उन्होंने उसे गर्म तवे पर फैलाया और ऊपर से मसालेदार आलू का मिश्रण डाला। डोसा तैयार होने पर उन्होंने उसे मोड़कर केले के पत्ते पर रखी थाली में परोसा। इस गतिविधि के जरिए उन्होंने भारतीय खानपान और संस्कृति में रुचि दिखाने की कोशिश की। अमेरिकी चुनावों में उम्मीदवारों के लिए अब केवल बड़ी रैलियां और राजनीतिक भाषण ही मतदाताओं तक पहुंचने का जरिया नहीं रह गए हैं। स्थानीय समुदायों के बीच जाकर उनकी परंपराओं और जीवनशैली को समझना भी चुनाव प्रचार का हिस्सा बनता जा रहा है। भारतीय रेस्तरां में डोसा बनाने जैसी गतिविधियां इसी रणनीति का हिस्सा हैं।
मंदिरों में पहुंच रहे उम्मीदवार
भारतीय-अमेरिकी समुदाय तक पहुंचने के लिए मंदिर भी उम्मीदवारों और जनप्रतिनिधियों के प्रमुख पड़ाव बन रहे हैं। खासकर उन राज्यों में मंदिरों में नेताओं की मौजूदगी बढ़ी है, जहां भारतीय मूल के मतदाताओं की संख्या उल्लेखनीय है। कनेक्टिकट के गवर्नर नेड लैमोंट, जो दोबारा चुनाव लड़ रहे हैं, ने स्टेट कैपिटल में आयोजित दिवाली समारोह में हिस्सा लिया। इस दौरान उनके साथ उप विदेश सचिव जेनिफर बाराहोना भी मौजूद थीं। ओहियो के सांसद ग्रेग लैंड्समैन ने शेरोनविले स्थित बीएपीएस स्वामीनारायण मंदिर की वर्षगांठ के कार्यक्रम में भाग लिया। न्यू जर्सी के अमेरिकी सीनेटर कोरी बुकर भी अक्षरधाम मंदिर में आयोजित दिवाली समारोह में पहुंचे। वहीं, सांसद रैंडी फाइन और स्कॉट पेरी ने पेंसिल्वेनिया के हैरिसबर्ग स्थित एक मंदिर में जाकर समुदाय के लोगों से संपर्क साधा। इन कार्यक्रमों में नेताओं की भागीदारी को भारतीय-अमेरिकी मतदाताओं के साथ संवाद बढ़ाने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है।
हिंदू-अमेरिकी समुदाय की परंपराओं को समझने पर जोर
मिशिगन के सांसद जान जेम्स भी एक स्वामीनारायण मंदिर पहुंचे। उनका उद्देश्य वहां पूजा स्थल की परंपराओं और हिंदू-अमेरिकी समुदाय की सामाजिक भूमिका को समझना था। उन्होंने मंदिर में समुदाय की सेवा भावना और सांस्कृतिक गतिविधियों को करीब से देखने में रुचि दिखाई। अमेरिका में भारतीय मूल के लोग धार्मिक और सांस्कृतिक संस्थानों के साथ-साथ कारोबार, शिक्षा और सार्वजनिक जीवन में भी सक्रिय हैं। ऐसे में मंदिर और सामुदायिक आयोजन राजनीतिक उम्मीदवारों के लिए लोगों से सीधे संवाद करने का अवसर उपलब्ध कराते हैं। उम्मीदवार इन कार्यक्रमों के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के साथ समुदाय की चिंताओं और अपेक्षाओं को समझने की कोशिश कर रहे हैं।
स्विंग स्टेट में एक-दो फीसदी वोट भी अहम
भारतीय-अमेरिकी समुदाय की मजबूत मौजूदगी कैलिफोर्निया, टेक्सास, न्यू जर्सी, न्यूयॉर्क, वाशिंगटन, इलिनोइस, पेंसिल्वेनिया और जॉर्जिया जैसे राज्यों में है। इन राज्यों में मतदाताओं की संख्या और राजनीतिक भागीदारी के कारण समुदाय चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है। विशेष रूप से जॉर्जिया, पेंसिल्वेनिया, मिशिगन और उत्तरी कैरोलिना जैसे राज्यों में मुकाबला काफी करीबी हो सकता है। ऐसे चुनावी राज्यों में एक या दो प्रतिशत वोट भी नतीजों को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसलिए उम्मीदवार छोटे-छोटे मतदाता समूहों को भी नजरअंदाज नहीं करना चाहते।


