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ओरबान को जिताने में जुटे ट्रंप, हंगरी चुनाव में अमेरिका की इतनी दिलचस्पी क्यों?

हंगरी के पीएम ओरबान सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी हार के आसार हैं. ट्रंप ओरबान को जिताने की कोशिश कर रहे हैं

ओरबान को जिताने में जुटे ट्रंप, हंगरी चुनाव में अमेरिका की इतनी दिलचस्पी क्यों?
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हंगरी के पीएम ओरबान सबसे मुश्किल चुनाव लड़ रहे हैं. उनकी हार के आसार हैं. ट्रंप ओरबान को जिताने की कोशिश कर रहे हैं. इसी क्रम में जेडी वैंस हंगरी पहुंचे, ओरबान को अगला पीएम बताया. क्या यूएस हंगरी चुनाव में दखल दे रहा है?

हंगरी के नागरिक 12 अप्रैल को संसदीय चुनाव के लिए मतदान करेंगे. साल 2010 से सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री विक्टर ओरबान लगातार पांचवां कार्यकाल पाने के लिए मुकाबले में हैं. चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में विपक्षी नेता पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी जीतती नजर आ रही है.

हंगरी के पीएम ओरबान ने बनाया नया धुर-दक्षिणपंथी गठबंधन

हंगरी को 'अनुदार लोकतंत्र' बनाने का श्रेय लेने वाले ओरबान ने इतने बरस की सत्ता में संविधान और चुनावी तंत्र को कुछ इस तरह तोड़ा-मरोड़ा है, जहां उनके और उनकी फिडेस पार्टी के हारने की ज्यादा गुंजाइश नहीं बचती. बावजूद इसके यह उनका सबसे मुश्किल राजनीतिक मुकाबला बन गया है. स्वतंत्र सर्वेक्षणों की मानें, तो ओरबान के हारने की संभावना है.

...मानो अकेले ओरबान नहीं लड़ रहे हैं चुनाव

ओरबान धुर-दक्षिणपंथी विचारधारा की राजनीति करते हैं. यूरोपीय संघ की राजनीति में भी वह फार-राइट खेमे के मुख्य चेहरों में हैं. उनके राजनीतिक सिद्धांतों की अपील, उनका जनाधार और भविष्य ऐसे विषय नहीं हैं जिनका असर हंगरी तक सीमित हो.

ओरबान की जीत या हार, अन्य यूरोपीय देशों की दक्षिणपंथी और धुर-दक्षिणपंथी पार्टियों पर भी खासा असर डाल सकती है. 'ब्रैंड ओरबान' की जीत एक तरह का राजनीतिक बैरोमीटर बन गया है, जिससे फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों में पहले ही मजबूत हो रही फार-राइट पार्टियों को भी मनमाफिक लय मिलने की उम्मीद है. इसीलिए, ओरबान की फिडेस पार्टी को यूरोप के दूसरे दक्षिणपंथी दलों से समर्थन मिल रहा है.

ओरबान के लिए चुनावी रैली करेंगे अमेरिकी उपराष्ट्रपति?

समर्थन या विरोध, बस यूरोपीय महाद्वीप तक सीमित नहीं है. ओरबान को डॉनल्ड ट्रंप प्रशासन से भी खुला समर्थन मिल रहा है. अमेरिका के उप राष्ट्रपति जेडी वैंस खुद दो दिन की यात्रा पर हंगरी पहुंचे हैं. 7 अप्रैल को बुडापेस्ट में ओरबान के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में वैंस ने एलान किया, "विक्टर ओरबान हंगरी में अगला चुनाव जीतने जा रहे हैं."

वैंस ने कहा, "इस चुनावी मौसम में, मैं प्रधानमंत्री (ओरबान) की जितनी मदद कर सकता हूं, करना चाहता हूं. हालांकि, मैं यह अपेक्षा नहीं करता कि हंगरी के लोग संयुक्त राज्य अमेरिका के उप राष्ट्रपति की बात सुनेंगे. लेकिन मैं हर किसी को एक संकेत देना चाहता हूं, खासतौर पर ब्रसेल्स में नौकरशाहों को, जिन्होंने हंगरी की जनता को कामयाब होने से रोकने के लिए वो सब किया जो वो कर सकते हैं, क्योंकि वो उस नेता (ओरबान) को पसंद नहीं करते जो वाकई हंगरी की जनता के लिए खड़ा हुआ."

अमेरिकी उपराष्ट्रपति की राय में, ओरबान और ट्रंप प्रशासन का आपसी सहयोग "पश्चिमी सभ्यता की हिफाजत" करता है और "ईसाई मूल्यों" पर आधारित है, "बहुत कुछ है जो अमेरिका और हंगरी को एक करता है. दुर्भाग्य से, बहुत ही कम लोग हैं जो पश्चिमी सभ्यता के मूल्यों के लिए खड़े होने को तैयार हैं."

वैंस की यात्रा पर एक ओर जहां हंगरी के विपक्षी नेता विदेशी हस्तक्षेप ना करने की चेतावनी दे रहे हैं, वहीं वैंस ने ब्रसेल्स पर दखलंदाजी का आरोप लगाते हुए दावा किया कि यह चुनाव उनकी देखी मिसालों में "विदेश में चुनावी हस्तक्षेप से सबसे खराब उदाहरणों में है." वैंस के मुताबिक, "ब्रसेल्स में ब्यूरोक्रैट्स ने हंगरी की अर्थव्यवस्था को तबाह करने की कोशिश की" क्योंकि वे "इस शख्स (ओरबान) से नफरत करते हैं." खबरों के मुताबिक, वह एक चुनावी रैली में भी ओरबान के साथ नजर आएंगे.

सवाल उठ रहे हैं कि क्या वैंस के इस कदम को हंगरी के चुनाव में "विदेशी हस्तक्षेप" माना जा सकता है? ओरबान के मुख्य चुनावी प्रतिद्वंद्वी पीटर माग्यार ने सोशल मीडिया पर बाहरी दखलंदाजी के खिलाफ चेताते हुए लिखा, "कोई भी बाहरी देश हंगरी के चुनाव में दखल नहीं दे सकता है. यह हमारा देश है. हंगरी का इतिहास वॉशिंगटन, मॉस्को या ब्रसेल्स में नहीं लिखा गया है. यह लिखा गया है हंगरी की गलियों और चौराहों पर."

ट्रंप की राजनैतिक-वैचारिक शैली का छाता, कौन-कौन आएगा?

यूरोप और यहां की लिबरल पार्टियों-लीडरों के लिए ट्रंप का स्वर अक्सर शिकायती और तीखा रहता है. दिनोदिन यूरोप से 'नाराज' व 'असंतुष्ट' होते और यूरोपीय नेताओं पर कटाक्ष करते ट्रंप वैचारिक समानता वाले दक्षिणपंथी नेताओं को बढ़ावा देने की कोशिश कर रहे हैं. यह कोशिश बस यूरोप में नहीं, बल्कि दक्षिण अमेरिका में भी नजर आती है. मसलन, ट्रंप ने अर्जेंटीना में जो किया.

नवंबर 2024 में जब ट्रंप दूसरे कार्यकाल के लिए चुने गए, तो अर्जेंटीना के राष्ट्रपति हावियर मिलेई उनसे मिलने फ्लोरिडा पहुंचे. वह ट्रंप की जीत के बाद उनसे मिलने आए पहले विदेशी लीडर थे. ट्रंप ने कहा मिलेई उनके "पसंदीदा राष्ट्रपति" हैं.

वहीं मिलेई, ट्रंप को अपना वैचारिक संदर्भ बिंदु बताते हैं. अक्टूबर 2025 में अर्जेंटीना में हुए चुनाव में ट्रंप ने मिलेई को समर्थन दिया. देश का आर्थिक संकट बड़ा मुद्दा था, तो मिलेई की संभावनाएं बढ़ाने के लिए बेलआउट पैकेज देकर ट्रंप ने बड़ी मदद भी की.

हंगरी चुनाव में ओरबान को जिताने में जुटे हैं ट्रंप

हंगरी में ट्रंप की दिलचस्पी का केंद्र हैं, ओरबान. ट्रंप और ओरबान, एक-दूसरे के समर्थक और प्रशंसक हैं. ट्रंप प्रशासन ने यह बताने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी है कि उसके लिए हंगरी का चुनाव और ओरबान की जीत अहमियत रखती है. ट्रंप ने ओरबान को खुला सपोर्ट दिया और उन्हें "एक मजबूत और ताकतवर नेता" बताया.

फरवरी में अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रुबियो हंगरी आए और उन्होंने ओरबान के लिए जीत की कामना की. एक संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में रुबियो ने कहा, "मैं पूरे यकीन के साथ आपसे कह सकता हूं कि राष्ट्रपति ट्रंप, आपकी सफलता के लिए गहराई से प्रतिबद्ध हैं क्योंकि आपकी कामयाबी हमारी कामयाबी है."

कैसा यूरोप चाहते हैं ट्रंप?

अब चुनाव से ऐन पहले वैंस का हंगरी आना और व्यक्तिगत रूप से ओरबान को चुनावी समर्थन देना, वैचारिक समानता और बयानबाजी से आगे की बात है. विश्लेषक इसे मुश्किल चुनाव में फंसे ओरबान को समर्थन देने की एक दुर्लभ चेष्टा के तौर पर देख रहे हैं.

जैसा कि पॉलिटिको मैगजीन ने वैंस की हंगरी यात्रा को "ऑपरेशन सेव ओरबान" का शीर्षक देते हुए लिखा, "ट्रंप प्रशासन यूरोप में अपने नंबर 1 सहयोगी को बचाने के लिए" पूरा जोर लगा रहा है.

यूरोप में मध्यममार्गी और प्रगतिशाली विचारधारा की सरकारों/ नीतियों को नापसंद करने और इनकी सख्त आलोचना करने के मामले में ट्रंप, वैंस और ओरबान तीनों एक स्वाभाविक गठबंधन बनाते हैं. ट्रंप 2.0 दबे-छिपे तरीके से नहीं, बल्कि सार्वजनिक तौर पर किसी और देश के चुनाव में अपनी वैचारिक और विदेश नीति प्राथमिकताओं से मेल खाने वाले नेताओं को समर्थन देती दिख रही है.

कौन हैं जॉर्ज सोरोस, जिन्हें कई लीडर कहते हैं "पपेट मास्टर"

अस्लाई डंतसबस, ब्रूकिंग्स इंस्टिट्यूट थिंक टैंक में एक विजिटिंग फैलो हैं. वैंस की यात्रा के संदर्भ में रॉयटर्स से बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, "जेडी वैंस की यात्रा कोई सामान्य कूटनीति नहीं, बल्कि विक्टर ओरबान की जिंदगी के सबसे मुश्किल चुनाव के पहले स्पष्ट तौर पर उनका एंडॉर्समेंट है."

ट्रंप प्रशासन के लिए ओरबान की भूमिका रेखांकित करते हुए उन्होंने आगे कहा, "ट्रंप प्रशासन के लिए ओरबान केवल एक रूढ़िवादी साथी नहीं, बल्कि यूरोप के भीतर एक अनुदार धड़ा स्थापित करने की कोशिशों का मुख्य चेहरा हैं. अगर ओरबान हारते हैं, तो इस अभियान को नुकसान होगा."

हंगरी के चुनाव में दिलचस्पी बस अमेरिका की ही नहीं है

हंगरी के चुनाव में बस अमेरिका नहीं, रूस की भी रुचि बताई जा रही है. ओरबान, मॉस्को समर्थक हैं. बल्कि वह ईयू के सबसे बड़े पुतिन सपोर्टर हैं. यूक्रेन युद्ध से जुड़े मसलों पर ओरबान का रुख, रूसी हितों के ज्यादा करीब है.

दिलचस्पी ईयू की भी कम नहीं है, हालांकि ब्लॉक के लिए हंगरी एक अंदरूनी मसला है. एक तो ओरबान ईयू के विरोधी और तीखे आलोचक हैं. ऊपर से उनके वीटो ईयू के लिए बड़ी परेशानी बन गए हैं. सदस्य देशों की सर्वसम्मति की व्यवस्था में हंगरी का वीटो कई अहम मुद्दों पर ईयू के हाथ-पैर बांध देता है. स्थिति यह है कि ओरबान के वीटो के कारण ईयू के नियमों में सुधार की अपील की जा रही है.

हंगरी और ईयू का रिश्ता: इट्स टू कॉम्प्लिकेटेड

फरवरी 2022 में यूक्रेन पर हमले के बाद से चाहे रूस पर प्रतिबंध लगाना हो या यूक्रेन की मदद करना हो, ओरबान ईयू के लिए गतिरोध खड़े करते आए हैं. न्यायिक स्वतंत्रता, मीडिया की आजादी, भ्रष्टाचार और निष्पक्ष लोकतांत्रिक संस्थाओं जैसे अहम विषयों पर ओरबान की नीतियां, ईयू मूल्यों से मेल नहीं खातीं.

विश्लेषकों के मुताबिक, यह चुनाव ईयू और हंगरी के रिश्ते में "आर या पार" साबित हो सकता है. हंगरी की कथित ब्लैकमेलिंग से ईयू में काफी झुंझलाहट है. मसलन, बीते दिनों जब यूक्रेन को 90 बिलियन यूरो के लोन देने की डील पर ओरबान मुकर गए तो यूरोपीय परिषद के अध्यक्ष अंटोनियो कोस्टा जाहिर तौर पर नाराज दिखे.

यूक्रेन की मदद के लिए 90 अरब यूरो कैसे जुटाएगा ईयू?

कोस्टा ने कहा, "यूरोपीय संघ की संस्थाओं को कोई भी ब्लैकमेल नहीं कर सकता." 'ब्लूमबर्ग' की खबर के अनुसार, ओरबान ने ईयू से कहा कि जब तक रूस से तेल की खरीद फिर नहीं शुरू की जाती, वह यूक्रेन को आर्थिक मदद देने की सहमति नहीं देंगे.

डानिएल फ्रॉइंड, यूरोपीय संसद में ग्रीन्स/ ईएएफ ग्रुप के सांसद और जर्मन नेता हैं. उन्होंने संसद की एक अंदरुनी रिपोर्ट के हवाले से बताया कि ईयू के अब तक के इतिहास में ओरबान से ज्यादा कभी किसी लीडर ने वीटो नहीं किया. समाचार एजेंसी एपी से बातचीत में उन्होंने कहा, "यह चौंकाने वाला है. कोई और करीब भी नहीं आया. ईयू के डिजाइन में यह सबसे बड़ा खोट है, जिसे उन्होंने (ओरबान) एक्सपोज कर दिया है."

यूक्रेन को फंड देने के तरीके पर क्या ईयू में बन पाएगी सहमति?

चीन भी चाहता है ओरबान जीतें?

ओरबान, चीन समर्थक भी हैं. इस मामले में भी वह ईयू में नंबर एक समझे जाते हैं. जैसा कि 'सेंटर फॉर यूरोपियन एनालिसिस' (सीईपीए) ने पिछले साल अपने एक विश्लेषण में लिखा कि हंगरी, यूरोप में सबसे ज्यादा प्रो-चाइना देश है. यूक्रेन युद्ध के बाद रूस को जिस तरह चीन से मदद मिली, उसे ईयू में काफी संशय से देखा गया और कई देशों ने बीजिंग से दूरी बना ली. मगर, ओरबान के रिश्ते और गाढ़े हो गए.

बीजिंग सम्मेलन से पहले बढ़ा ईयू और चीन का व्यापारिक तनाव

साल 2023 में बीजिंग में आयोजित 'बेल्ट एंड रोड फोरम' में हिस्सा लेने पहुंचे वह ईयू के अकेले नेता थे. यहां पुतिन की उपस्थिति के कारण बाकी ईयू देशों ने हिस्सा नहीं लिया. फिर 2024 में चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हंगरी यात्रा पर आए. दोनों देशों ने एक विस्तृत साझेदारी पर भी दस्तखत किया. यह आशंका थी कि बीजिंग के साथ उनकी नजदीकी, ट्रंप के साथ दोस्ती में अड़चन बन सकती है. लेकिन ऐसा नहीं हुआ.

विश्लेषकों के अनुसार, विक्टर ओरबान की जीत में चीन की भी दिलचस्पी है. 6 अप्रैल को 'साउथ चाइना मॉर्निंग पोस्ट' ने एक आर्टिकल छापा, जिसका शीर्षक था- कगार पर ओरबान: क्या हंगरी का चुनाव यूरोप में चीन के प्रभाव पर चोट पहुंचाएगा?

आर्टिकल के मुताबिक चीन, रूस और ट्रंप का अमेरिका, तीनों के लिए ओरबान की हार एक ऐसे सहयोगी को राह से हटा देगी, जिसने ईयू के सामाजिक और ग्रीन अजेंडा के तहत बार-बार उनके खिलाफ उठाए गए कदमों को रोका.

रिकॉर्ड मतदान की उम्मीद

सरकार समर्थित सर्वेक्षणों में ओरबान की फिडेस पार्टी और केडीएनपी का गठबंधन जीतता दिख रहा है. वहीं, स्वतंत्र सर्वेक्षण संकेत दे रहे हैं पीटर माग्यार के नेतृत्व में तिसा पार्टी लैंडस्लाइड जीत हासिल करने वाली है. विश्लेषकों को उम्मीद है कि इसबार जमकर मतदान होगा, वोटर टर्नआउट 75 से 80 फीसदी तक जा सकता है.

ओरबान पर पहले ही सत्ता के जोर पर विपक्ष और आलोचकों को दबाने के गंभीर आरोप लगते रहे हैं. इस बार रूसी दखलंदाजी, मतदाताओं को धमकाने व वोट खरीदने के आरोप और घरेलू खुफिया विभाग की मदद से विपक्षी तिसा पार्टी को नुकसान पहुंचने के इल्जाम भी लग रहे हैं. राजनीतिक और चुनावी संस्थाओं पर सरकार के प्रभाव को देखते हुए यह सवाल बना हुआ है कि हंगरी के चुनाव कितने निष्पक्ष हैं.


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