नेपाल की आपदा ने नए सिरे से बढ़ाई भारत की चिंता
नेपाल के प्राकृतिक हादसे के बाद अब अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटे इलाके में चीन की ओर से बन रहे विशालकाय बांध को लेकर चिंता बढ़ रही है. साथ ही राज्य की पनबिजली परियोजनाओं के खतरों पर भी नए सिरे से चर्चा होने लगी है

नेपाल के प्राकृतिक हादसे के बाद अब अरुणाचल प्रदेश की सीमा से सटे इलाके में चीन की ओर से बन रहे विशालकाय बांध को लेकर चिंता बढ़ रही है. साथ ही राज्य की पनबिजली परियोजनाओं के खतरों पर भी नए सिरे से चर्चा होने लगी है.
भारत में खासकर पूर्वी हिमालय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर बनने वाली पनबिजली परियोजनाएं, इनके तहत बनने वाले बांध और सुरंगों से पैदा होने वाले खतरे अक्सर सुर्खियां बटोरते रहे हैं. लेकिन अब नेपाल के भयावह हादसे में बड़े पैमाने पर जान-माल के नुकसान ने विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है. उनको आशंका है कि जम्मू-कश्मीर के अलावा उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में कभी भी नेपाल जैसे हादसे का खतरा मंडरा रहा है.
हाल के वर्षों में इन राज्यों में भूस्खलन और सुरंग धंसने की अलग-अलग घटनाओं में कई लोग मारे जा चुके हैं. लेकिन इसके बावजूद पहाड़ों की कटाई करके ऐसी परियोजनाएं बनाने का काम जारी है. इनमें खासकर सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश की स्थिति सबसे चिंताजनक है.
अरुणाचल का संकट
चीन सरकार अरुणाचल प्रदेश से सटे इलाके में एक विशालकाय बांध बना रही है. बीते साल इसका निर्माण कार्य शुरू हुआ था. करीब डेढ़ सौ अरब अमेरिकी डॉलर की लागत वाली इस परियोजना के वर्ष 2033 तक पूरा होने का लक्ष्य है. विशेषज्ञ इसे वाटर बम बताते हैं. लेकिन भूवैज्ञानिकों की असली चिंता इस परियोजना का आकार नहीं बल्कि इसकी लोकेशन है. यह मेडॉग परियोजना उस फॉल्ट जोन के पास स्थित है, जहां भारतीय और यूरेशियन टेक्टोनिक प्लेटें मिलती हैं. इसकी वजह से यह इलाका भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील है. बीते साल भी तिब्बत के शिगात्से इलाके में रिक्टर स्केल पर 7.1 की तीव्रता वाले एक भूकंप के कारण वहां 120 से ज्यादा लोगों की मौत के अलावा कुछ बांधों को नुकसान पहुंचने की खबरें आई थी.
नेपाल आपदा के बाद भारत ने हिमालय पर निगरानी बढ़ाई
विशेषज्ञों का कहना है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाले बांध को भूकंपरोधी तकनीक से बनाने के बावजूद किसी बड़े भूकंप की स्थिति में जमीन धंसने और चट्टानों के टूटने का खतरा पैदा हो सकता है. इससे बांध पर तो खास असर नहीं होगा. लेकिन नदी के निचले हिस्से में स्थित भारतीय इलाकों को नेपाल जैसी आपदा झेलनी पड़ सकती है. इससे नदी का बहाव बदल सकता है. इससे पहले भी ऐसी कुछ घटनाएं हो चुकी हैं. वर्ष 2000 में तिब्बत में एक बांध टूटने से पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में बाढ़ आ गई थी. इससे पहले वर्ष 2017 में अरुणाचल प्रदेश की सियांग नदी का पानी अचानक काला पड़ गया था. तब इसके लिए तिब्बत में खनन गतिविधियों को जिम्मेदार ठहराया गया था. यही सियांग नदी असम में प्रवेश करने के बाद ब्रह्मपुत्र कहलाती है.
विशेषज्ञों ने चेताया है कि चीनी परियोजना के तहत बनने वाला विशालकाय बांध पूर्वोत्तर भारत में बड़े पैमाने पर तबाही ला सकता है.
भारत की जवाबी रणनीति
इसके असर की काट के लिए भारत सरकार ने भी राज्य के अपर सियांग में 11 हजार मेगावाट क्षमता वाली एक बहुउद्देशीय परियोजना बनाने का फैसला किया है. लेकिन स्थानीय लोग और संगठन इसका विरोध कर रहे हैं. उनका कहना है कि इससे डेढ़ लाख से ज्यादा लोगों के सामने विस्थापन का खतरा पैदा हो जाएगा. अरुणाचल प्रदेश में आधा दर्जन पनबिजली परियोजनाएं चल रही हैं जबकि करीब तीन दर्जन छोटी-बड़ी परियोजनाओं का काम चल रहा है. इनमें दिबांग, अपर सियांग, लोअर सुबनसिरी और इटालीन जैसी बड़ी परियोजनाएं शामिल हैं. राज्य सरकार ने 2025-35 को 'पनबिजली का दशक' घोषित किया है.
भूवैज्ञानिकों का कहना है कि अरुणाचल प्रदेश में हिमालय की संरचना भी उस नेपाल-तिब्बत सीमा जैसी है जो हाल में प्राकृतिक हादसे का शिकार हुआ है. खासकर इटालीन परियोजना तो भूकंप के प्रति बेहद संवेदनशील इलाके में है. वहां ग्लेशियल झीलों के फटने का खतरा भी बना हुआ है.
राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) ने देश भर में ऐसे 195 ग्लेशियल झीलों की पहचान की है जिनके फटने से बाढ़ आने का खतरा है. किसी ग्लेशियर के पिघलने से बनी झील को रोकने वाली बर्फ, चट्टान या मलबे जैसी प्राकृतिक दीवार के अचानक टूटने के बाद आने वाली बाढ़ को 'ग्लेशियल लेक आउटबर्स्ट फ्लड' या 'ग्लोफ' कहा जाता है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इनमें से 32 झीलें अकेले अरुणाचल में ही हैं.
क्या है विशेषज्ञों का आकलन?
पूर्वोत्तर के मशहूर भूवैज्ञानिक डा. प्रमोद चंद्र सरमा डीडब्ल्यू से कहते हैं, "हिमालय प्राकृतिक रूप से एक नाजुक पर्वतीय प्रणाली है.इसका पूर्वी क्षेत्र अभी युवा है. इस इलाके में हमेशा भूकंप, भूस्खलन, हिमस्खलन और अचानक आने वाली बाढ़ का खतरा बना रहता है. जलवायु परिवर्तन इस खतरे को और बढ़ा रहा है. इसके साथ ही पनबिजली परियोजनाओं के लिए बड़े पैमाने पर बनने वाले बांधों ने इस जोखिम को कई गुना बढ़ा दिया है."
पर्यावरणविद डी.के. अपांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "राज्य में प्रस्तावित तमाम बड़ी परियोजनाएं भूकंप के लिहाज बेहद संवेदनशील इलाकों में स्थित हैं. चीनी बांध परियोजना ने प्राकृतिक विपदा के खतरे को काफी बढ़ा दिया है."
क्या तिब्बत में आपदा के नुकसान को छिपा रहा है चीन?
सियांग बहुउद्देशीय परियोजना का लंबे समय से विरोध कर रहे सियांग इंडीजीनस फार्म्स फोरम (एसआईएफएफ) के प्रमुख जेजांग डीडब्ल्यू से कहते हैं, "अपर सियांग इलाका चीनी सीमा से सटा है. इसका निर्माण पूरा होने पर यहां भी नेपाल जैसा हादसा होने का खतरा बढ़ जाएगा."
क्या हैं बचाव के उपाय?
विशेषज्ञों का कहना है कि सरकार को अर्ली-वार्निंग सिस्टम पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए ताकि ऐसे हादसे के बारे में समय रहते जानकारी मिल सके. इसके साथ ही इलाके में मौसम और हिमालय की ऊंचाई पर बने ग्लेशियरों और झीलों की स्थिति पर चौबीसों घंटे निगरानी का तंत्र विकसित करना होगा.
केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी नाम नहीं छापने की शर्त पर डीडब्ल्यू को बताते हैं, "सरकार अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम कर रही है. पहले चरण में 46 बेहद संवेदनशील बांधों में से 40 में यह प्रणाली लागू की जा चुकी है. चरणबद्ध तरीके से दूसरी परियोजनाओं में भी इसे लागू किया जाएगा.
संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 में कहा था कि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से बीते करीब तीन दशकों के दौरान कार्बन का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करने वाले दो देशों, भारत और चीन के बीच स्थित नेपाल के ग्लेशियरों में जमा बर्फ की मात्रा एक-तिहाई कम हो गई है.
विशेषज्ञों का कहना है कि इसे ध्यान में रखते हुए इस मुद्दे पर गंभीरता से विचार करना जरूरी है कि भौगोलिक रूप से अस्थिर हिमालयी क्षेत्र में सियांग और उसके जैसे बड़े बांधों का निर्माण उचित है या नहीं?


