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जर्मन राज्य में सत्ता के करीब एएफडी, भारतीयों में कितना डर

जर्मनी के सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में एएफडी चुनावी बढ़त हासिल करती दिख रही है. भारतीय समेत प्रवासी समुदायों में चिंता है.

जर्मन राज्य में सत्ता के करीब एएफडी, भारतीयों में कितना डर
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जर्मनी के सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य में एएफडी चुनावी बढ़त हासिल करती दिख रही है. आर्थिक असंतोष और प्रवासन की बहस के बीच भारतीय समेत कई प्रवासी समुदायों में भविष्य को लेकर चिंता बढ़ी है.

सड़कों पर कम लोग, एक जैसी दिखने वाली इमारतें और बुजुर्गों से भरे कैफे-रेस्तरां. बर्लिन से आधे दामों पर फास्टफूड बिक रहा है और हर कुछ मिनट में ट्राम गुजरती दिखाई देती है. पर तमाम पश्चिमी शहरों की तरह भारत की छाप यहां भी है. जर्मनी के शहर हाले के सेंटर में भी आपको पटेल मार्केट, बॉलीवुड स्टोर और भारतीय ग्रोसरी की दुकानें आसानी से मिल जाएंगी. जबकि इन्हीं के आसपास कई जर्मन दुकानें बंद भी नजर आती हैं.

हाले में बदलती आबादी और बदलती अर्थव्यवस्था की छाप चप्पे-चप्पे पर दिखती है. इलाके में लोगों की कमाई बाकी जर्मनी के मुकाबले कम है. यानी वो बाकी जर्मनी के लोगों जितना खर्च नहीं कर सकते. यही बात है कि खाना और सुविधाएं यहां बाकी जर्मनी से सस्ते हैं. मुख्य बाजार इलाके में कई दुकानों के शटर बंद हैं और कुछ जगहों पर सड़कें काफी सुनसान दिखाई देती हैं. यह इस इलाके के सिर्फ एक शहर का हाल नहीं है. हाले तो सैक्सनी-अनहाल्ट राज्य का बड़ा शहर है, यहां के छोटे शहरों की स्थिति और भी खराब है.

इतिहास का गढ़ रहा है सैक्सनी-अनहाल्ट

जर्मनी के 16 संघीय राज्यों में से एक सैक्सनी-अनहाल्ट आकार में भले ही बहुत बड़ा ना हो, लेकिन इतिहास, संस्कृति, उद्योग और अब राजनीति के लिहाज से इसकी देश-दुनिया में अलग पहचान है. इसी राज्य के डेसाउ शहर में बाउहाउस आंदोलन ने आधुनिक आर्किटेक्चर की दिशा बदलने वाले आर्किटेक्चरों को जन्म दिया. यही मार्टिन लूथर की कर्मभूमि भी रहा, जिन्होंने विटेनबर्ग के चर्च के दरवाजे पर अपने 95 सिद्धांत टांगकर यूरोप में धार्मिक सुधार आंदोलन की शुरुआत की थी. राज्य का पूर्वी हिस्सा लोएना और बिटरफेल्ड जैसे औद्योगिक शहरों के कारण जर्मनी के केमिकल ट्रायंगल का गढ़ रहा. यहां से कंपनियां दुनियाभर में अहम केमिकल सप्लाई करती रही हैं.

करीब 21 लाख की आबादी वाला यह राज्य जर्मनी के सबसे कम आबादी घनत्व वाले क्षेत्रों में गिना जाता है. राज्य में राजधानी माग्देबुर्ग और हाले ही ऐसे दो शहर हैं जिनकी आबादी दो लाख से अधिक है. पर इस बार सैक्सनी-अनहाल्ट राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सुर्खियों में अपनी संस्कृति या इतिहास की वजह से नहीं बल्कि राजनीति की वजह से है. सितंबर में होने वाले राज्य चुनावों में पहली बार एक ऐसे दल का नेता यहां सरकार की कमान संभाल सकता है, जिसे जर्मनी की घरेलू खुफिया एजेंसियों ने धुर-दक्षिणपंथी संगठन घोषित किया हुआ है. नए चुनावी सर्वे आल्टरनेटिव फॉर जर्मनी यानी एएफडी के उम्मीदवार उलरिष जीगमुंड को लेकर यही संकेत दे रहे हैं.

बर्बाद हुई इंडस्ट्रियल पहचान

राज्य में एएफडी की लोकप्रियता केवल चुनावी गणित का मामला नहीं है, बल्कि इसके पीछे लंबे समय से जमा सामाजिक और आर्थिक असंतोष भी है. 1990 में जर्मनी के एकीकरण के बाद पूर्वी जर्मनी के अनेक औद्योगिक क्षेत्रों की तरह सैक्सनी-अनहाल्ट को भी बड़े बदलावों का सामना करना पड़ा. लिग्नाइट कोयला उद्योग और रासायनिक उत्पादन क्षेत्र में हजारों नौकरियां खत्म हुईं. हाले की तरह ही ज्यादातर शहरों और कस्बों में आर्थिक गतिविधियां कमजोर पड़ गईं. हालांकि हाल के वर्षों में नए निवेश आए हैं और कुछ क्षेत्रों में औद्योगिक पुनर्निर्माण भी हुआ है, लेकिन बड़ी संख्या में लोगों को अब भी लगता है कि पश्चिमी जर्मनी की तुलना में उनका क्षेत्र विकास की दौड़ में पीछे रह गया.

सैक्सनी-अनहाल्ट में कई बड़े उद्योग पिछले दशकों में बंद हो गए हैं या आकार में बहुत छोटे रह गए हैं. हजारों नौकरियां गईं और कई युवा बेहतर अवसरों की तलाश में दूसरे शहरों की ओर चले गए. राज्य में 20 साल से कम उम्र के युवा अब 20 फीसदी ही रह गए हैं. पढ़ाई और नौकरी के लिए यहां से निकले अनेक युवा कभी वापस नहीं लौटे. इसके साथ ही युवाओं में पुरुषों की संख्या महिलाओं से काफी अधिक है, जिससे सामाजिक असंतुलन भी पैदा हुआ है. राज्य के मुख्यमंत्री स्वेन शुल्त्से खुद कहते रहे हैं कि नौकरी से निकल रहे दो लोगों के मुकाबले एक ही नया इंसान नौकरी में आ रहा है.

विदेशी कर्मचारियों ने दिया सहारा

यही वजह है कि राज्य में कारोबार और कामकाज चलाने के लिए विदेशी श्रमिकों की जरूरत है. पिछले एक दशक में विदेशी श्रमिक यहां आए भी हैं. 6 सितंबर को राज्य में विधानसभा का चुनाव होना है और माइग्रेशन चुनाव में सबसे बड़ा राजनीतिक मुद्दा है. इसके बावजूद कि राज्य में विदेशी नागरिकों की हिस्सेदारी अब भी जर्मनी के राष्ट्रीय औसत से कम है. यह जरूर है कि राज्य में पिछले दस वर्षों में विदेशी आबादी दोगुनी से अधिक हुई है, लेकिन फिर भी कुल आबादी में उसका हिस्सा अपेक्षाकृत छोटा ही है. जर्मन सरकार के आंकड़ों के मुताबिक हाले में विदेशी नागरिकों की आबादी करीब 9 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 15 फीसदी से काफी कम है.

हाले की एक भारतीय किराना दुकान चलाने वाले दुकानदार ने पहचान जाहिर नहीं करने की शर्त पर डीडब्ल्यू से बात की. वह कहते हैं, "यहां कारोबार करना आसान नहीं है, खासकर अगर आप दूसरे देश से हों." उनके मुताबिक, "यहां बड़ी आबादी बुजुर्गों की है. वे कभी-कभार ही बाहर निकलकर खरीदारी करते हैं. उनकी खरीदने की क्षमता कम है और वे बाजार में ज्यादा पैसा खर्च नहीं करते. यहां दुकानदारी में मुनाफा भी कम है, शायद दो-तीन फीसदी."

अब माइग्रेशन ही सबसे बड़ा मुद्दा

जर्मनी की धुर-दक्षिणपंथी पार्टी एएफडी ने महंगाई, बेरोजगारी और औद्योगिक पतन के मुद्दों को बड़े पैमाने पर उठाया है और हालात बदलने का दावा भी किया है. पार्टी कई बार महंगाई, कम आय और रोजगार से जुड़ी समस्याओं के लिए शरणार्थियों और प्रवासन को जिम्मेदार ठहराती है. अभी पार्टी 'रीमाइग्रेशन', यानी तथाकथित अवैध प्रवासियों को वापस भेजने की नीति बनाने की बात भी कर रही है.

चुनाव से पहले जारी अधिकांश जनमत सर्वेक्षणों में एएफडी को 40 प्रतिशत से अधिक समर्थन मिलता दिख रहा है. यह आंकड़ा राज्य की राजनीति में दशकों से प्रभावशाली रही क्रिश्चियन डेमोक्रेटिक यूनियन यानी सीडीयू से काफी आगे है. जर्मनी के रीयूनिफिकेशन के बाद से राज्य में ज्यादातर सीडीयू ही सत्ता के केंद्र में रही है, लेकिन इस बार पार्टी का समर्थन 23 से 26 प्रतिशत के बीच बताया जा रहा है.

इस राजनीतिक माहौल का असर यहां रहने वाले प्रवासियों पर भी पड़ रहा है. सिटी सेंटर में एक किराना स्टोर चलाने वाली हरियाणा की पूजा (बदला हुआ नाम) को जर्मनी में रहते एक दशक से ज्यादा समय हो चुका है. वह कहती हैं, "कई लोगों को लगता है जो भी उनसे अलग दिखता है, वह इस जगह का हिस्सा नहीं है. कई स्थानीय समझते हैं सभी बाहरी अवैध और अपराधी हैं. जबकि वो अपने टैक्स से उनका कामकाज चला रहे हैं."

पूजा ने एक घटना का जिक्र करते हुए बताया, "एक या दो साल पहले यहां मार्केट में चोरी हुई थी. तब कुछ स्थानीय लोगों ने नारा लगाया था, ‘आउसलैंडर राउस', यानी बाहरी लोग यहां से निकल जाओ." वो कहती हैं, "जर्मन लोगों को लगता है कि सभी बाहरी लोग एक जैसे हैं." पूजा यह भी बताती हैं, "यहां आम काम करने वालों की भारी कमी है. सफाई, दुकानों में मदद करने वाले और मजदूर हर तरह के काम में प्रवासी नजर आते हैं."

विश्वयुद्ध के बाद पहली बार सत्ता में आएंगे धुर-दक्षिणपंथी?

इस माहौल के बीच चिंता, अनिश्चितता, डर और संदेह की भावनाएं यहां की हवा में घुली हुई हैं. अब पूरा जर्मनी जानना चाहता है कि यदि एएफडी चुनाव जीतकर सत्ता के करीब पहुंची तो पूरे जर्मनी पर इसका कैसा प्रभाव होगा. आलोचकों को डर है कि पार्टी राज्य की संस्थाओं और प्रशासनिक ढांचे के चरित्र को बदलने की कोशिश कर सकती है. हालांकि कई विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि जर्मनी में एक राज्य की शक्तियां सीमित होती हैं और एएफडी अभी जर्मनी की राजनीतिक व्यवस्था को मूल रूप से नहीं बदल सकती. फिर भी सैक्सनी-अनहाल्ट का चुनाव देश के लिए एक अहम संकेतक माना जा रहा है, क्योंकि यह बताएगा कि आर्थिक असंतोष, जनसंख्या में बदलाव और माइग्रेशन बहस किस तरह मुख्यधारा राजनीति को चुनौती दे रहे हैं.

यही कारण है कि जर्मनी के बीचोबीच स्थित यह छोटा सा राज्य अब राष्ट्रीय राजनीति की सबसे बड़ी प्रयोगशालाओं में बदल गया है. जिस भूमि को कभी मार्टिन लूथर, बाउहाउस और औद्योगिक पुनर्निर्माण के लिए जाना जाता था, वह आज जर्मन लोकतंत्र के सामने खड़े नए राजनीतिक प्रश्नों का केंद्र बन चुकी है. यह चुनाव केवल राज्य की नई सरकार का फैसला नहीं करेगा, बल्कि यह बताएगा कि आने वाले वर्षों में जर्मनी की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ने वाली है.



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