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फ्रांस को ऐतिहासिक क्रांति के सबक याद दिलाते छात्र

फ्रांसीसी जीवनशैली, कई विदेशी समाजों को आकर्षित करती है. क्रांति का प्रसिद्ध नारा और सबसे के लिए अच्छी शिक्षा के अवसर, इसकी बुनियाद रहे हैं. छात्रों का देशव्यापी प्रदर्शन इसी बुनियाद के गलने की गवाही है.

फ्रांस को ऐतिहासिक क्रांति के सबक याद दिलाते छात्र
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क्लेमेंस रेमी अपनी दो बेटियों के साथ 2020 में फ्रांस के नॉत शहर आईं. रेमी ने दोनों का दाखिला एक सरकारी स्कूल में कराया. वहां अच्छे टीचर भी थे, लेकिन स्कूल का स्टाफ बहुत हड़ताल करने लगा था. बेटियों की पढ़ाई बाधित ना हो, इसलिए रेमी ने दो बेटियों को उस सरकारी स्कूल से निकालकर प्राइवेट स्कूल में डाल दिया.

रेमी के मुताबिक, उनकी बेटियों के सरकारी स्कूलों में आम तौर पर हड़ताल की सूचना, आखिरी मिनटों में दी जाती थी. इसके चलते रेमी को कई बार बहुत ही शॉर्ट नोटिस पर अपने काम से छुट्टी लेनी पड़ती थी. रेमी कहती हैं, "स्कूल एक ऐसा संस्थान है, जिस पर हम सबको भरोसा करना चाहिए. लेकिन अंत में आपको अहसास होता है कि आप इस सिस्टम के भरोसे नहीं रह सकते हैं."

सरकारी स्कूलों की बुरी दशा के चलते अब फ्रांस, कई दशकों बाद सबसे बड़े और उग्र आंदोलनों का सामना कर रहा है. राजधानी पेरिस के उत्तर में एक गरीब उपनगर से शुरू हुए ये प्रदर्शन अब पूरे देश में फैल चुके हैं. मुद्दा है, सरकारी स्कूलों में टीचरों और स्टाफ की कमी, जर्जर ढांचा, शिक्षा का गिरता स्तर और खराब क्वालिटी की टीचिंग सामग्री. इन कमियों की जड़ में है, सार्वजनिक खर्च पर सरकार की कैंची.

फ्रांस की बुनियाद पर आघात

फ्रांस के सरकारी स्कूलों को लंबे समय तक फ्रांसीसी गणतंत्र का आदर्श माना जाता था. देश के सरकारी स्कूल ऐसी जगह हुआ करते थे, जहां अमीर और गरीब परिवारों के बच्चे एक साथ, अलग-बगल बैठकर उच्च स्तर की शिक्षा पा सकते थे. 18वीं शताब्दी के आखिर में हुई फ्रांस की क्रांति से "आजादी, समानता और बंधुत्व" का जो नारा निकला, वह सरकारी स्कूलों में मूर्त रूप में दिखाई पड़ता था. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इस नारे को फ्रांस के संविधान में अनुच्छेद दो में शामिल कर दिया गया.

लेकिन आज सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत, इसी भावना पर आघात कर रही है. पेंशन की अथाह देनदारी के चलते सरकार, सार्वजनिक खर्च में काफी कटौती कर चुकी है. डगमगाती वित्तीय व्यवस्था को सुधारने के लिए सरकार के पास बहुत कम गुंजाइश बची है. सार्वजनिक संस्थानों के बजट में हुई कटौतियों का सीधा असर सरकारी स्कूलों पर भी पड़ा है. इसके नतीजे में, अमीर अभिभावकों ने अपने बच्चों को सरकारी स्कूल से निकालकर प्राइवेट स्कूलों में भर्ती करा दिया है.

लग्जमबर्ग यूनिवर्सिटी के समाजशास्त्री लुई शॉवेल कहते हैं, "50 साल पहले, महत्वाकांक्षी परिवार, सरकारी स्कूलों में दाखिले का लक्ष्य रखते थे. आज अगर आप अपने बच्चे को मिलने वाले मौकों को बढ़ाना चाहते हैं तो निजी संस्थानों को ज्यादा बेहतर आंका जाता है."

सरकारी स्कूलों में शिक्षा का स्तर कितना गिरा

सन 2003 से फ्रांस में 15 साल के छात्र का गणित हल करने और फ्रेंच भाषा पढ़ने का स्तर लगातार गिरता जा रहा है. 2025 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, अब यह ओईसीडी देशों के औसत से भी नीचे जा चुका है. 2024-25 के शैक्षणिक सत्र में देश के सरकारी माध्यमिक विद्यालय, 10 फीसदी टीचिंग ऑवर्स (पढ़ाने के घंटे) पूरा करने के लिए पर्याप्त टीचर नहीं रख सके. छुट्टी पर रहने वाले शिक्षकों को जोड़ने पर अंत में पढ़ाई के कुल घंटों में दो तिहाई कमी दर्ज की गई.

2025 में एक सरकारी विभाग की अपनी रिपोर्ट में कहा गया कि देश में 10 से 20 फीसदी सरकारी स्कूलों की इमारत जर्जर हो रही है. फ्रांस का 2027 का शिक्षा बजट 64 अरब यूरो है. इस मद के अलावा सेवानिवृत्त हो चुके टीचरों की पेंशन पर करीब 18 अरब यूरो खर्च होने हैं. सरकार के सामने चुनौती है कि वह इस रकम की भरपाई, किसी और सरकारी योजना के पैसे में कटौती कर या फिर कर्ज लेकर ही सकती है.

फ्रांस सरकार के सामने पेंशन कितनी बड़ी चुनौती

2027 में फ्रांस सरकार जितना पैसा खर्च करेगी, उसमें से 436 अरब यूरो सिर्फ पेंशन पर खर्च होंगे. यह रकम देश के कुल आर्थिक उत्पादन का 14 फीसदी है. बीते दो दशकों में देश में पेंशन पर होने वाला खर्च किसी भी दूसरे सरकारी खर्च के मुकाबले ज्यादा तेजी से बढ़ा है.

पेंशन खर्च के बोझ को कम करने के लिए फ्रांस की सरकार सेवानिवृत्ति की उम्र को बढ़ाना चाहती है. एक दूसरा विकल्प है पेंशन घटाना. लेकिन जब भी सरकार ने इन दोनों विकल्पों को आजमाने की कोशिश की, तब उसे मतदाताओं की नाराजगी की सामना करना पड़ा है. इसके साथ ही देश में औसत जीवन प्रत्याशा भी बढ़ रही है. रिटायर हो चुके लोग, लंबा जी रहे हैं और ज्यादा वक्त तक पेंशन ले रहे हैं.

फ्रांस के अर्थशास्त्री इरवान टिसों, मौजूदा पेंशन सिस्टम को शिक्षा के लिए भस्मासुर करार देते हैं. वहीं अर्थशास्त्र के लिए नोबेल पुरस्कार जीत चुके पॉल क्रूगमान ने गुरुवार को लिखा कि "फ्रांस बुजुर्गों को असरदार तरीके से बड़ी सब्सिडी दे रहा है, वो भी अन्य सबकी कीमत पर. छात्रों के व्यापक राष्ट्रीय प्रदर्शन से किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए."

अमीरों के बच्चे प्राइवेट स्कूल में

फ्रांस में ज्यादातर प्राइवेट स्कूल "कॉन्ट्रैक्ट" मॉडल के तहत चलते हैं. इन स्कूलों के टीचरों को तनख्वाह सरकार देती है. स्कूली फीस से गैर शैक्षणिक खर्चे पूरे किए जाते हैं. कैथोलिक संस्थाओं द्वारा चलाए जाने वाले ऐसे करीबन सभी प्राइवेट स्कूलों के पास वैकल्पिक टीचरों का भी एक बड़ा समूह होता है. किसी टीचर के छुट्टी लेने या हड़ताल होने का असर इन स्कूलों पर कम पड़ता है.

2023 की एक आधिकारिक ऑडिट रिपोर्ट के मुताबिक, फ्रांस में करीब 20 लाख बच्चे, 7,500 से ज्यादा ऐसे अनुबंधित प्राइवेट स्कूलों में पढ़ते हैं. रेमी के शहर नॉत में कम उम्र के 38 प्रतिशत बच्चे प्राइवेट स्कूलों में जा रहे हैं. रेमी अपनी एक बेटी के लिए महीने में 191 यूरो फीस देती हैं. वह मानती हैं कि हर कोई इतनी महंगी फीस वहन नहीं कर सकता है. लेकिन बेटियों को भविष्य को लेकर उन्हें ये फीस चुकाने में कोई मलाल नहीं है.

इसी दौरान नॉत में लगातार प्रदर्शन कर रहे छात्र बीच बीच में नारे लगाते हैं, "आजादी, समानता और बंधुत्व." प्रदर्शनकारी पूछ रहे हैं कि क्या बेहतर शिक्षा अब सिर्फ उन बच्चों का अधिकार रह गई है, जिनके माता-पिता इसकी कीमत चुका सकते हैं?


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