अफगानिस्तान में अफीम की खेती बंद होने से कुपोषित हुए बच्चे
अफीम की खेती पर प्रतिबंध से किसानों की कमाई इतनी घट गई है कि वे अपने बच्चों को पर्याप्त खाना भी नहीं खिला पा रहे हैं

अफगानिस्तान की अफीम एक समय पर दुनियाभर में स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती थी. अब अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगने से किसानों की कमाई इतनी घट गई है कि वे अपने बच्चों को पर्याप्त खाना भी नहीं खिला पा रहे हैं.
28 साल के मोहम्मद दाऊद अभी भी उस समय को याद करते हैं, जब अफीम की एक फसल से ही परिवार के साल भर के भरण पोषण का इंतजाम हो जाता था. लेकिन अब उनके दिन गेहूं और कपास के खेतों में बीतते हैं, जिन्हें बेचकर गुजारे लायक कमाई भी नहीं हो पाती. अफगानिस्तान के बल्ख प्रांत के बाबा यूसुफ गांव में रहने वाले दाऊद कहते हैं, "पहले हम अच्छे से रह रहे थे…अब मेरे बच्चे कुपोषित हैं.”
कुछ साल पहले तक अफगानिस्तान के खेतों में दुनिया की लगभग 80 फीसदी अफीम पैदा होती थी. इसका इस्तेमाल मॉर्फीन और हेरोइन जैसे ड्रग्स बनाने में होता था. चार साल पहले सत्ता में लौटने पर तालिबान ने अफीम की खेती पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसके बाद अफीम खेतों से गायब होने लगा. लेकिन इस प्रतिबंध की वजह से स्थानीय किसानों के सामने एक बड़ी समस्या खड़ी हो गई.
कई अफगान किसानों का कहना है कि वे अपने बच्चों का पेट भरने में असमर्थ हो रहे हैं. उनके मुताबिक, गेहूं और कपास जैसी जिन फसलों को उगाने की अनुमति है, उन्हें बेचकर उतना पैसा नहीं मिलता. दाऊद कहते हैं कि वे तालिबान द्वारा लगाए गए प्रतिबंध का पालन कर रहे हैं. लेकिन अब बुरी स्थिति में वे अफीम से होने वाली कमाई का चालीसवां हिस्सा ही कमा पाते हैं.
10 प्रांतों में गंभीर स्तर पर पहुंचा कुपोषण
सहायता समूहों का कहना है कि देश के कृषि क्षेत्रों में आर्थिक दबाव गंभीर हो गया है और इसका असर बच्चों में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है. संयुक्त राष्ट्र की एजेंसियों ने इस महीने चेतावनी दी है कि अफगानिस्तान के 34 में से 10 प्रांतों में इस साल बाल कुपोषण का स्तर गंभीर है और यह संख्या 2027 तक बढ़कर 14 हो सकती है.
एजेंसियों का कहना है कि बेहतर फसल होने के बावजूद, बढ़ती महंगाई और फसलों की घटती कीमतें गरीब किसानों पर दबाव डाल रही हैं और उनके लिए खाने की उपलब्धता को सीमित कर रही हैं. राजनयिकों का कहना है कि विदेशी सहायता में कटौती और अतंरराष्ट्रीय स्तर पर तालिबान को अलग-थलग किए जाने का भी इसमें योगदान है.
हालांकि, बल्ख के आलम खिल हेल्थ सेंटर में डॉक्टर और मरीज मुख्य तौर पर इसका दोष घटती कृषि आमदनी को देते हैं. उनके मुताबिक, खेती से होने वाली कमाई घटने की वजह से क्लीनिक में कुपोषण के अधिक मामले आ रहे हैं. यह क्लीनिक कपास के खेतों से घिरा हुआ है.
क्लीनिक के बाहर अपने सात महीने के बच्चे को लेकर बैठीं ताहिरा कहती हैं कि डॉक्टर ने उनके बच्चे को कुपोषित बताया है. उन्होंने कहा कि पहले उनकी जिंदगी अच्छी थी लेकिन अब गुजारा करना मुश्किल हो रहा है. क्लीनिक की एक नर्स सलीमा मोहम्मदी कहती हैं कि लोगों के पास खेत तो हैं लेकिन खेती से होने वाली कमाई साल दर साल घट रही है.
चोरी-छिपे शुरू हुई अफीम की खेती
बढ़ते कुपोषण के बीच कई किसानों ने दोबारा से चोरी-छिपे अफीम की खेती शुरू कर दी है. मोहम्मद दाऊद के कई पड़ोसी भी अब अफीम उगा रहे हैं. हालांकि, तालिबान के डर से ज्यादातर किसान अफीम उगाने की बात को स्वीकार नहीं करते हैं. वे तालिबानी अधिकारियों की नजरों से बचने के लिए अनाज के खेतों के अंदर या मिट्टी की दीवारों के पीछे अफीम उगा रहे हैं.
यूएन ऑफिस ऑन ड्रग्स एंड क्राइम ने गुरुवार, 29 अक्टूबर को बताया कि इस साल अफगानिस्तान में अफीम की खेती में तेजी आई है. यूएन ने सैटेलाइट तस्वीरों का विश्लेषण कर बताया है कि बीते साल के मुकाबले इस साल अफीम की खेती चार गुना बढ़कर करीब 43 हजार हेक्टेयर में फैल गई. हालांकि, यह साल 2021 के मुकाबले करीब एक चौथाई ही है, जब अफीम की खेती पर प्रतिबंध नहीं था.
यूएन का अनुमान है कि अफगानिस्तान में इस साल अफीम की बिक्री से 50 करोड़ डॉलर से अधिक की कमाई हुई. हालांकि, तालिबान ने इस रिपोर्ट के आंकड़ों को खारिज किया है. तालिबान के मुताबिक, अफीम की वास्तविक खेती यूएन के अनुमान के आधे के बराबर है और उसे भी खत्म करने के लिए प्रयास जारी हैं. तालिबान अफीम की खेती पर प्रतिबंध को अपनी प्रमुख उपलब्धियों में से एक मानता है.
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अफीम का असर
अफगानिस्तान के खेतों में क्या उगता है, इसका असर सिर्फ अफगानिस्तान तक सीमित नहीं रहता. विश्लेषकों का कहना है कि अफीम की खेती फिर शुरू होने से ग्लोबल ड्रग मार्केट पर गंभीर असर पड़ सकता है. कुछ साल पहले तक अफगानिस्तान में पैदा होने वाली अफीम दुनियाभर में स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बनती रही है. ऊंची कीमतों की वजह से इसकी तस्करी के मार्गों पर भ्रष्टाचार भी खूब फला-फूला है.
पैडी गिन जिनेवा स्थित ग्लोबल इनीशिएटिव अगेंस्ट ट्रांसनेशनल ऑर्गेनाइज्ड क्राइम के विश्लेषक हैं. उनका कहना है, "इसे देश के भीतर सक्रिय तस्करी नेटवर्क और देश से अफीम को बाहर निकालने के लिए चल रहे मजबूत तस्करी अभियानों के साथ मिला दें तो भविष्य के लिए एक बहुत ही निराशाजनक भविष्यवाणी सामने आती है." वहीं, यूएन ने कहा है कि कीमत बढ़ने से अफीम की खेती को और बढ़ावा मिल सकता है.


