जर्मनी की समृद्धि के लिए गरीब बच्चों पर खर्च करना जरूरी
गरीबी में पलने वाले बच्चों को भी अगर सुविधाएं मिले तो वे देश के लिए बहुत बड़े योगदान दे सकते हैं.

गरीबी में पलने वाले बच्चों को भी अगर सुविधाएं मिले तो वे देश के लिए बहुत बड़े योगदान दे सकते हैं. जर्मनी में एक रिसर्च ने दिखाया है कि गरीबी और सुविधाओं में पलने वाले बच्चों से देश की समृद्धि को कितना फर्क पड़ता है.
बचपन जितना स्वस्थ रहते हुए अच्छी पढ़ाई-लिखाई में बीते, उतना ही उनके देश का फायदा होता है. जर्मनी में एक रिसर्च से पता चला है कि स्वस्थ, सफल इंसान वंचित बचपन वालों की तुलना में देश की अर्थव्यवस्थाऔर सार्वजनिक धन में लाखों यूरो यानी करोड़ों रुपये ज्यादा का योगदान करते हैं.
हर एक बच्चे से देश पर लाखों यूरो का असर
गरीबी में और पढ़ाई-लिखाई की कम सुविधा के साथ पलने वाले बच्चे जर्मनी के सार्वजनिक धन में दूसरे बच्चों की तुलना में 2,16,500 यूरो यानी लगभग 2 करोड़ रुपये कम का योगदान करते हैं. यह आंकड़ा उनके पूरे जीवनकाल के लिए है जो रिसर्च से निकला है. यह दिखाता है कि अगर उन वंचित बच्चों को भी पर्याप्त सुविधाएं मिलें तो वो देश और समाज के लिए अधिक उपयोगी हो सकते हैं.
यूरोप में 2 करोड़ से अधिक बच्चे गरीबी में हैं
संयुक्त राष्ट्र की बच्चों के लिए काम करने वाली शाखा यूनिसेफ जर्मनी की ओर से 'जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट' (आईडब्ल्यू) ने एक अध्ययन के बाद यह आंकड़े सामने रखे हैं. इसमें बताया गया है कि जर्मनी में एक औसत आदमी अपने पूरे जीवननकाल में सरकार के उसपर किए उसके कुल खर्च की तुलना में 3,00,000 यूरो यानी 3 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान करता है.
यह रकम टैक्स या फिर दूसरी चीजों के लिए किए उसके भुगतान का योग है. शिक्षा हासिल करने के स्तर से इस रकम में काफी बदलाव को देखा गया है.
जर्मनी में यूनिवर्सिटी की डिग्री हासिल करने वाले लोग अपने जीवनकाल में नेट 9,43,000 यूरो (9.5 करोड़ रुपये) का योगदान जर्मनी के सार्वजनिक धन में करते हैं. उनकी तुलना में वोकेशनल कोर्स करने वाले लोगों का योगदान महज 1,17,600 यूरो है. अध्ययन में पता चला है कि जिन लोगों के पास कोई मानक पेशेवर डिग्री नहीं है उनका योगदान माइनस 3,77,100 यूरो है.
जर्मनी में हर सातवें बच्चे पर गरीबी की खतरा
बचपन की आदतें भी देश पर बनती हैं बोझ
आईडब्ल्यू के अर्थशास्त्री आक्सेल प्लुनेके ने वंचित बच्चों को पूरे दिन के लिए स्कूल और फैमिली सेंटर जैसे उपायों से होने वाले फायदों की ओर ध्यान दिलाया है. बच्चों के स्वास्थ्य की भी इसमें बड़ी भूमिका है. जो लोग बचपन से ही फल-सब्जियां खाने और कसरत करने जैसी अच्छी आदतें पालते हैं वे दूसरे लोगों की तुलना में सार्वजनिक धन के लिए ज्यादा योगदान करते हैं.
अमीर दोस्त हों तो बड़े हो कर धनी बनते हैं बच्चे
बचपन में लापरवाही या सेहत के लिहाज से बुरी आदतें पालने वालों की तुलना में यह फर्क 1,30,000 यूरो से ज्यादा का है. इतना ही नहीं, प्लुनेके का कहना है कि तनाव से जूझने वाले लोगों का योगदान पूरे जीवन में माइनस 3,45,500 यूरो तक हो सकता है.
कुल मिला कर गरीबी में पलने वाले बच्चे अपने पूरे जीवनकाल में दूसरों के मुकाबले सार्वजनिक धन में 2,16,500 यूरो का कम योगदान करते हैं. प्लुनेके का कहना है कि वंचित बच्चों को बेहतर सहयोग के जरिए उन्हें ज्यादा सफल वयस्क बनाने में मदद दे सकता है. सफल होने पर वे ज्यादा टैक्स देंगे और सार्वजनिक मदद पर कम निर्भर होंगे.
बच्चों पर खर्च बेहतर भविष्य पर निवेश है
जर्मनी में बुजुर्गों की बढ़ती संख्या के बीच सार्वजनिक धन को लेकर चिंताएं बढ़ रही हैं. उम्र बढ़ने पर लोगों की देखभाल पर ज्यादा खर्च होता है. अगर उसी अनुपात में युवाओं और कामकाजी लोगों की संख्या ना बढ़े तो सार्वजनिक धन पर दबाव बढ़ जाता है. जर्मनी फिलहाल इसी तरह की स्थिति से गुजर रहा है और आने वाले वर्षों में यह स्थिति और ज्यादा बिगड़ने वाली है.
जर्मनी में सरकारी पेंशन अच्छा जीवन जीने के लिए काफी नहीं
यूनिसेफ के मुताबिक, जर्मनी में 10 लाख से ज्यादा ऐसे बच्चे हैं जिनका बचपन मुश्किलों में गुजरता है. यहां हर साल 65,000 से ज्यादा किशोर बिना पढ़ाई पूरी किए स्कूल छोड़ देते हैं. यूनिसेफ जर्मनी के प्रमुख गेयोर्ग ग्राफ वाल्डरसी का कहना है, "हमें बच्चों पर होने वाले खर्च को सिर्फ कीमत के रूप में देखना बंद करना चाहिए. वंचित बच्चों में निवेश करना सिर्फ निष्पक्षता का मसला नहीं है यह आर्थिक रूप से भी सार्थक है." जाहिर है कि देश को बच्चों पर खर्च होने वाला धन उनके बड़े होने पर ब्याज समेत वापस मिलता है .


