Top
Begin typing your search above and press return to search.

मध्यस्थ नहीं संदेशवाहक की भूम‍िका में था पाकिस्तान : र‍िपोर्ट

पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका असल में किसी “मध्यस्थ” जैसी नहीं बल्कि एक “कुरियर” यानी संदेश पहुंचाने वाले की तरह थी

मध्यस्थ नहीं संदेशवाहक की भूम‍िका में था पाकिस्तान : र‍िपोर्ट
X

काबुल। पाकिस्तान की अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ की भूमिका असल में किसी “मध्यस्थ” जैसी नहीं बल्कि एक “कुरियर” यानी संदेश पहुंचाने वाले की तरह थी। उसके पास न तो कोई खास दबदबा था, न ही कोई ठोस समाधान पेश करने की क्षमता, और न ही वह दोनों पक्षों को समझौते की ओर मजबूती से धकेल सकता था।

एक रिपोर्ट के मुताबिक पाकिस्तान सिर्फ एक ऐसा कूटनीतिक रास्ता बना, जिसके जरिए चीन जैसे बड़े देश अपने संदेश आगे पहुंचा सके, वह भी बिना सीधे तौर पर सामने आए।

रिपोर्ट में कहा गया कि आठ अप्रैल को जब अमेरिका और ईरान दो हफ्ते के सीजफायर पर सहमत हुए, तो दुनिया ने राहत और हैरानी के मिले-जुले भाव के साथ इस खबर को देखा। इस समझौते का श्रेय पाकिस्तान को “मध्यस्थ” के रूप में दिया गया, जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि अचानक काफी बढ़ गई। फील्ड मार्शल असीम मुनीर को इसका बड़ा श्रेय मिला, और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों, तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन और संयुक्त राष्ट्र महासचिव से बधाई संदेश भी मिले।

लेकिन रिपोर्ट के अनुसार, दिखावे के पीछे कहानी थोड़ी ज्यादा जटिल है। असल में पाकिस्तान ने किसी फैसले को तय करने वाली भूमिका नहीं निभाई, बल्कि वह सिर्फ एक ऐसा माध्यम बना जिसके जरिए अमेरिका और चीन जैसे बड़े देश एक-दूसरे तक बात पहुंचा सके।

रिपोर्ट में बताया गया कि पाकिस्तान के विदेश मंत्री इशाक डार की बीजिंग यात्रा के कुछ ही दिनों बाद पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर चीन-पाकिस्तान की संयुक्त शांति योजना के कुछ हिस्से उस सीजफायर में दिखने लगे, जिसे बाद में वॉशिंगटन और तेहरान दोनों ने स्वीकार किया।

इस प्रस्ताव में उन मुद्दों से बचा गया जिनसे चीन को कूटनीतिक नुकसान हो सकता था, खासकर “स्ट्रेट ऑफ होर्मुज” जैसे संवेदनशील क्षेत्र पर ज्यादा ध्यान दिया गया, जबकि बाकी जटिल राजनीतिक मुद्दों को जानबूझकर अस्पष्ट रखा गया।

रिपोर्ट के अनुसार, अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह खुलकर मानना राजनीतिक रूप से मुश्किल होता कि चीन ने इस प्रक्रिया में मदद की है, क्योंकि इससे यह संदेश जा सकता था कि वह बीजिंग के प्रभाव पर निर्भर हैं।

वहीं चीन के लिए भी खुलकर सामने आकर बड़ी भूमिका निभाना जोखिम भरा था, क्योंकि “बीजिंग आमतौर पर ऐसी हाई-प्रोफाइल कूटनीतिक भूमिकाओं से बचता है जहां असफलता उसकी छवि को नुकसान पहुंचा सकती है।”

रिपोर्ट में कहा गया, “पाकिस्तान ने इस खाली जगह को भरा। उसने अमेरिका को ऐसा साझेदार दिया जिसे वह सार्वजनिक रूप से स्वीकार कर सकता था, और चीन को ऐसा गुप्त चैनल दिया जिसके जरिए वह ईरान पर अपना प्रभाव बिना ज्यादा ध्यान खींचे इस्तेमाल कर सकता था।”

आगे कहा गया कि इशाक डार की बीजिंग यात्रा में संभवतः इस बात पर चर्चा हुई होगी कि किसी भी समझौते के लिए चीन को गारंटर के रूप में कैसे शामिल किया जाए। और पाकिस्तान ने यह बातचीत बिना अमेरिका और चीन दोनों की पहले से किसी न किसी स्तर की सहमति के बिना आगे नहीं बढ़ाई होगी। व्यवहार में, ईरान किसी भी समझौते में अंतिम गारंटर के रूप में चीन को ही देखेगा।


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it