लद्दाख हिंसा पर प्रशासन का बड़ा एक्शन, 50 लोग गिरफ्तार, कहा - शांति लौट आई है
बर्फीले रेगिस्तान लद्दाख में पहली बार हुई अपने किस्म की प्रथम हिंसा में चार लोगों की मौत के उपरांत प्रशासन ने 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लेकर शांति के लौट आने का दावा किया है

जम्मू। बर्फीले रेगिस्तान लद्दाख में पहली बार हुई अपने किस्म की प्रथम हिंसा में चार लोगों की मौत के उपरांत प्रशासन ने 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लेकर शांति के लौट आने का दावा किया है। हालांकि इस शांति को बनाए रखने के लिए लेह में कर्फ्यू और करगिल में धारा 163 लागू की गई है। वैसे इस हिंसा पर तीव्र प्रतिक्रियाएं भी सामने आई हैं।
लद्दाख प्रशासन ने आज दावा किया कि लेह शहर में एक दिन की अशांति के बाद शांति लौट आई है। इस हिंसा को लेकर 50 से अधिक लोगों को हिरासत में लिया गया है। अधिकारियों ने कहा कि आगे तनाव बढ़ने से रोकने के लिए प्रतिबंध लागू रहेंगे, जबकि राजनीतिक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते आक्रोश को दूर करने के लिए नई दिल्ली से बातचीत करने का आग्रह किया है।
उपराज्यपाल कविंदर गुप्ता ने भी हिंसा की निंदा की और पीड़ितों के परिवारों के प्रति संवेदना व्यक्त की। एक वीडियो संदेश में, उन्होंने कहा कि झड़पें लद्दाख की परंपराओं के खिलाफ हैं और उन्होंने जवाबदेही की मांग की। गुप्ता ने कहा कि नई दिल्ली पहले ही मांगों पर बातचीत शुरू करने के लिए सहमत हो गई है और उन्होंने कुछ समूहों पर अराजकता पैदा करने की कोशिश करने का आरोप लगाया।
इस बीच सामाजिक कार्यकर्ता, सोनम वांगचुक ने एक्स पर पोस्ट किए गए एक वीडियो संदेश में कहा कि हमारा आंदोलन हमेशा शांतिपूर्ण रहा है... मैं युवाओं से हिंसा को अस्वीकार करने का आग्रह करता हूं, यह उन सभी चीजों के खिलाफ है, जिनके लिए हमने पिछले पांच वर्षों में काम किया है। वांगचुक ने कहा कि गुस्सा सरकार की चुप्पी से उपजा है। उन्होंने कहा कि हम लेह से दिल्ली तक पैदल चले हैं, हमने उपवास किया है, हमने ज्ञापन सौंपे हैं, लेकिन कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली है। उन्होंने अधिकारियों से बातचीत शुरू करने और युवाओं से अहिंसक तरीकों पर लौटने की अपील की।
इस बीच हुर्रियत कांफ्रेंस के अध्यक्ष मीरवाइज उमर फारूक ने कहा कि यह जम्मू कश्मीर को विभाजित करने और दर्जा घटाने के एकतरफा फैसले का नतीजा हैं। मीरवाइज ने सोशल मीडिया प्लेटफार्म एक्स पर लिखा, कि लद्दाख में प्रदर्शनों में लोगों की जान जाने से बेहद दुखी हूं। जम्मू कश्मीर राज्य को विभाजित करने और उसका दर्जा घटाने के एकतरफा फैसले और उसके बाद वहां के लोगों से किए गए वादों को पूरा नहीं करने के ये दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम हैं।
जबकि नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख फारूक अब्दुल्ला ने कहा कि लद्दाख के लोग अपनी स्टेटहुड के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं। पहले उन्होंने अपनी बात शांति से रखी थी लेकिन जब उनसे किये हुए कोई भी वादे नहीं किए गए तब उन्होंने गांधी का रास्ता छोड़ कर आंदोलन का रास्ता चुना।
जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने कहा कि लद्दाख में हालात खराब हैं। अफसोस है की लोगों की जानें गई हैं. वहां के लोगों से अपील करुंगा कि वह कानून अपने हाथ में न लें। आपसी भाईचारा बना रहे इसके लिए काम करना होगा।
उमर अब्दुल्ला ने हिंसा को लेकर कांग्रेस पर लग रहे आरोपों पर कहा कि भाजपा की हुकूमत है वह कुछ भी कह सकती है। अगर वहां कांग्रेस इतनी मजबूत है तो वहां उनका काउंसलर क्यों नहीं बना? जब भाजपा के पास कहने को कुछ नहीं होता तो वह ऐसा कहती है की विदेशी ताकतें हैं।
भारतीय संविधान की छठी सूची चाहिए लद्दाख को
भारतीय संविधान की छठी अनुसूची में असम, मेघालय, त्रिपुरा और मिजोरम राज्यों के जनजातीय क्षेत्रों के प्रशासन से संबंधित प्रावधान हैं। यह स्थानीय समुदायों को इन क्षेत्रों के प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने का अधिकार देती है। लद्दाख में प्रदर्शनकारी युवा मांग कर रहे हैं कि इसे छठी अनुसूची के संरक्षण में लाया जाए।
छठी अनुसूची के अनुसार, जिन जनजातीय क्षेत्रों को स्वायत्त जिला माना गया है और अगर उस क्षेत्र में अलग-अलग अनुसूचित जनजातियां हैं तो उन्हें राज्यपाल द्वारा क्षेत्रों में विभाजित किया जा सकता है। प्रत्येक स्वायत्त जिले के लिए, एक जिला परिषद होगी, जिसमें 30 से अधिक सदस्य नहीं होंगे। राज्यपाल चार से अधिक सदस्यों को मनोनीत नहीं करेंगे, जबकि शेष सदस्यों का चुनाव वयस्क मताधिकार के आधार पर किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, प्रत्येक स्वायत्त क्षेत्र के लिए एक अलग क्षेत्रीय परिषद की स्थापना की जाएगी।
छठी अनुसूची के अनुसार, क्षेत्रीय परिषदों वाले किसी स्वायत्त जिले में जिला परिषद के पास क्षेत्रीय परिषद के अधिकार क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले क्षेत्रों के संबंध में केवल वही शक्तियां होंगी जो क्षेत्रीय परिषद द्वारा उसे प्रत्यायोजित की जाएंगी। ऐसे क्षेत्रों के संबंध में इस अनुसूची द्वारा उसे प्रदत्त शक्तियों के अतिरिक्त। यह अनुसूची स्वायत्त जिलों और क्षेत्रों में जिला परिषदों और क्षेत्रीय परिषदों की कानून बनाने और न्याय प्रशासन की शक्तियों को भी परिभाषित करती है। यह सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 और दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 के तहत क्षेत्रीय , जिला परिषदों और कुछ मुकदमों, मामलों और अपराधों की सुनवाई के लिए कुछ न्यायालयों -अधिकारियों को प्रदत्त शक्तियों का भी उल्लेख करती है।
इस अनुसूची के तहत, राज्यपाल को एक आयोग की सिफारिश पर किसी जिले या क्षेत्रीय परिषद को भंग करने की शक्ति प्राप्त है। संसद समय-समय पर कानून द्वारा, किसी भी प्रावधान को जोड़कर, परिवर्तित करके या निरस्त करके अनुसूची में संशोधन कर सकती है। कानून में कहा गया है कि जब अनुसूची में इस प्रकार संशोधन किया जाता है, तो संविधान में इस अनुसूची के किसी भी संदर्भ को संशोधित संस्करण के संदर्भ के रूप में समझा जाएगा।


