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इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की साख दांव पर, गादी आइसेनकोट और नाफ्ताली बेनेट से कड़ी चुनौती

इस चुनाव में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन और पूर्व प्रधानमंत्री नाफ्ताली बेनेट से चुनौती मिल रही है। दोनों नेता सुरक्षा और युद्ध संबंधी नीतियों को लेकर नेतन्याहू की आलोचना करते रहे हैं।

इजरायल चुनाव में नेतन्याहू की साख दांव पर, गादी आइसेनकोट और नाफ्ताली बेनेट से कड़ी चुनौती
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यरुशलम : इजरायल में मंगलवार को होने वाले संसदीय चुनाव प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के राजनीतिक भविष्य के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं। इस चुनाव के नतीजों से पता चलेगा कि सात अक्टूबर, 2023 को हमास के हमले और उसके बाद गाजा में शुरू हुए सैन्य अभियान को लेकर इजरायली जनता नेतन्याहू सरकार के प्रदर्शन का किस तरह मूल्यांकन करती है। करीब तीन साल से जारी संघर्ष के बावजूद क्षेत्र में स्थायी शांति स्थापित नहीं हो सकी है। गाजा के अलावा लेबनान के दक्षिणी हिस्से में भी इजरायली सेना की कार्रवाई जारी रहने से सुरक्षा और विदेश नीति चुनाव के प्रमुख मुद्दे बने हुए हैं।

नेतन्याहू के सामने सत्ता बचाने की चुनौती

दक्षिणपंथी लिकुड पार्टी के नेता बेंजामिन नेतन्याहू अलग-अलग कार्यकालों में करीब 19 साल तक इजरायल के प्रधानमंत्री रह चुके हैं। वह देश के सबसे लंबे समय तक इस पद पर रहने वाले नेता हैं। अब एक बार फिर सत्ता में वापसी की कोशिश कर रहे नेतन्याहू अपनी सरकार की सुरक्षा नीति और सैन्य कार्रवाइयों को उपलब्धि के रूप में पेश कर रहे हैं। हालांकि, हमास के हमले के बाद सुरक्षा व्यवस्था को लेकर उठे सवाल, गाजा में लंबे समय से जारी युद्ध और बंधकों की रिहाई जैसे मुद्दे उनके लिए चुनौती बने हुए हैं। चुनाव को इस लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि मतदाता नेतन्याहू के नेतृत्व पर दोबारा भरोसा जताते हैं या राजनीतिक बदलाव का रास्ता चुनते हैं।

गादी आइसेनकोट और बेनेट ने बढ़ाई मुश्किलें

इस चुनाव में नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को पूर्व सेना प्रमुख गादी आइसेनकोट के नेतृत्व वाले गठबंधन और पूर्व प्रधानमंत्री नाफ्ताली बेनेट से चुनौती मिल रही है। दोनों नेता सुरक्षा और युद्ध संबंधी नीतियों को लेकर नेतन्याहू की आलोचना करते रहे हैं। आइसेनकोट मध्यमार्गी राजनीति से जुड़े नेता हैं। हमास के साथ युद्ध के दौरान वह नेतन्याहू की युद्धकालीन कैबिनेट का हिस्सा थे। हालांकि, जून 2024 में उन्होंने सरकार की युद्ध नीति पर असहमति जताते हुए इस्तीफा दे दिया था। उनका तर्क था कि सरकार के पास युद्ध को लेकर स्पष्ट रणनीति नहीं है। दूसरी ओर, पूर्व प्रधानमंत्री नाफ्ताली बेनेट भी नेतन्याहू की नीतियों को चुनौती दे रहे हैं। वह कई दक्षिणपंथी दलों से जुड़े राजनीतिक समीकरणों के जरिए अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।

73 लाख मतदाता चुनेंगे 120 सांसद

इजरायल में मंगलवार को होने वाले मतदान में लगभग 73 लाख मतदाता 120 सदस्यीय संसद नीसेट के लिए प्रतिनिधियों का चुनाव करेंगे। इजरायल की चुनाव प्रणाली भारत से अलग है। यहां मतदाता किसी एक उम्मीदवार को सीधे वोट देने के बजाय राजनीतिक पार्टी या गठबंधन को वोट देते हैं। संसद में प्रतिनिधित्व पाने के लिए किसी पार्टी को कम से कम 3.25 प्रतिशत मत हासिल करना जरूरी है। नीसेट का सामान्य कार्यकाल चार साल का होता है, लेकिन राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति में संसद समय से पहले भंग होकर नए चुनाव का रास्ता खोल सकती है। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों में किसी भी गठबंधन को स्पष्ट बहुमत मिलता नहीं दिख रहा है। ऐसे में छोटे दलों की भूमिका सरकार गठन में निर्णायक हो सकती है। चुनाव के बाद गठबंधन बनाने और समर्थन जुटाने की प्रक्रिया इजरायल की अगली सरकार का स्वरूप तय करेगी।

फलस्तीन राष्ट्र का मुद्दा चुनाव में पीछे

इस चुनाव की एक उल्लेखनीय बात यह है कि मुख्य मुकाबले में शामिल किसी भी प्रमुख दल की ओर से स्वतंत्र फलस्तीन राष्ट्र के गठन का स्पष्ट समर्थन सामने नहीं आया है। इससे संकेत मिलता है कि इजरायल की राजनीति में सुरक्षा, सैन्य रणनीति और क्षेत्रीय स्थिरता के मुद्दे फिलहाल अधिक प्रभावशाली बने हुए हैं। गाजा में स्थायी शांति की संभावनाएं, लेबनान में सैन्य कार्रवाई और हमास के साथ संघर्ष का भविष्य अगली सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां होंगी। चुनाव परिणाम इन मुद्दों पर इजरायल की आगे की नीति को प्रभावित कर सकते हैं।

ट्रंप के बयान पर इजरायली राष्ट्रपति की नाराजगी

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बेंजामिन नेतन्याहू को इजरायल के लिए जरूरी नेता बताया है। हालांकि, इजरायल के राष्ट्रपति इसाक हरजोग ने चुनाव के दौरान ट्रंप के इस बयान पर असहमति जताई है। इससे इजरायल के आंतरिक राजनीतिक मामलों में अमेरिकी समर्थन को लेकर भी चर्चा तेज हुई है।

भारत-इजरायल संबंधों पर क्या होगा असर?

इजरायल में सत्ता परिवर्तन हो या नेतन्याहू दोबारा प्रधानमंत्री बनें, भारत के साथ संबंधों में बड़े बदलाव की संभावना फिलहाल कम मानी जा रही है। रक्षा सहयोग, तकनीक, कृषि और व्यापार दोनों देशों के रिश्तों के प्रमुख आधार हैं। हालांकि, पश्चिम एशिया की बदलती परिस्थितियां और क्षेत्रीय संघर्ष भारत-इजरायल संबंधों की प्राथमिकताओं को प्रभावित कर सकते हैं। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या नेतन्याहू अपनी सत्ता बचा पाएंगे या इजरायली मतदाता नए नेतृत्व को मौका देंगे।


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