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ईरान युद्ध: रूस क्यों नहीं आ रहा ईरान की मदद के लिए सामने?

अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी कम सहयोगियों वाली ईरानी सरकार, अमेरिका और इस्राएल के जारी हमलों के बीच मॉस्को के समर्थन की उम्मीद कर रही थी. लेकिन अब तक तो उसे केवल निराशा ही हासिल हुई है

ईरान युद्ध: रूस क्यों नहीं आ रहा ईरान की मदद के लिए सामने?
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अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी कम सहयोगियों वाली ईरानी सरकार, अमेरिका और इस्राएल के जारी हमलों के बीच मॉस्को के समर्थन की उम्मीद कर रही थी. लेकिन अब तक तो उसे केवल निराशा ही हासिल हुई है.

28 फरवरी को ईरान पर इस्राएल और अमेरिका की बमबारी शुरू होने के कुछ घंटों बाद संयुक्त राष्ट्र में रूस के स्थायी प्रतिनिधि, वसिली नेबेन्जिया ने इसे "एक संप्रभु और स्वतंत्र संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देश के खिलाफ बिना किसी उकसावे के किया गया सशस्त्र हमला" ठहराया.

रूस की गिनती ईरान के गिने-चुने लेकिन मजबूत सहयोगियों में की जाती रही है. ऐसे में अगर ईरान की मौजूदा सरकार गिर जाती है, तो यह रूस के भूराजनैतिक और आर्थिक हितों के लिए बड़ा झटका साबित हो सकता है. लेकिन इसके बावजूद आखिर क्यों रूस तेहरान के समर्थन में सामने नहीं आ रहा है.

रूस-ईरान साझेदारी

रूस और मध्य-पूर्व के मामलों की जानकार अजरबाइजान आधारित स्वतंत्र विशेषज्ञ, निकिता स्मागिन ने डीडब्ल्यू को बताया कि रूस और ईरान साथ मिलकर कई आर्थिक परियोजनाओं पर काम कर रहे हैं, जो कि रूस के लिए काफी महत्वपूर्ण हैं. उन्होंने बताया, "नॉर्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर भी उसमें से एक है. ऐसा खासकर इसलिए भी है क्योंकि फरवरी 2022 से जबसे रूस ने यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला शुरू किया, तब से ही वह अपने पारंपरिक ट्रांजिट रास्तों से काफी हद तक कट गया था."

साथ ही, साल 2020 में रूस, भारत और ईरान ने संयुक्त रूप से एक 7,200 किलोमीटर लंबा मल्टी-मोड ट्रांसपोर्ट नेटवर्क बनाने के लिए आपसी समझौता किया था. यह नेटवर्क भी अजरबाइजान से होकर गुजरना तय है. सऊदी अरब के थिंक टैंक, गल्फ रिसर्च सेंटर के मुताबिक, इस परियोजना का लगभग 75 फीसदी काम पूरा हो चुका है.

सैन्य रूप से रूस के लिए ईरान हमेशा से ही अहम रहा है. साल 2023 से ईरान रूस को कथित 'शाहेद ड्रोन' उपलब्ध कराता आया है. अमेरिका के थिंक टैंक 'सेंटर फॉर नेवल एनालिसिस' के रूस स्टडीज प्रोग्राम के शोध विश्लेषक, यूलियान वालर ने बताया कि इस ड्रोन ने यूक्रेन युद्ध की पूरी रणनीति को काफी हद तक बदल के रख दिया. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "रूस के युद्ध प्रयासों में ईरान काफी अहम सहयोगी रहा है, भले ही अब ड्रोन का ज्यादातर उत्पादन रूस में ही होने लगा है और उनके डिजाइन में भी काफी सुधार किया गया है."

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कई रिपोर्टों के मुताबिक, रूस ने ईरान के साथ खुफिया जानकारियां साझा की है. साथ ही, तेहरान को मिसाइलें और गोला-बारूद भी भेजे हैं. स्मागिन के मुताबिक, "रूस और ईरान की साझेदारी विचारधारा पर आधारित नहीं है. बल्कि, रूसी नेता तो ईरान को पसंद भी नहीं करते हैं." उन्होंने आगे कहा, "लेकिन वह तेहरान को एक विश्वसनीय रणनीतिक साझेदार जरूर मानते हैं क्योंकि दोनों ही देश अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध झेल रहे हैं. जबकि, तुर्की या मिस्र कभी भी पश्चिमी देशों के दबाव में रूस के साथ व्यापार बंद कर सकते हैं."

लंदन के थिंक टैंक, चैथम हाउस के निदेशक, ग्रेगुआर रॉस का मानना है कि कुछ मामलों में तो तेहरान काफी हद तक मॉस्को का मार्गदर्शक तक बन गया है. उन्होंने डीडब्ल्यू से कहा, "ईरान के पास अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने का कई सालों का लंबा अनुभव रहा है और वह रूस को भी इससे कैसे बचना है, इस पर सलाह देता रहा है."

ईरान का अनुमान गलत?

इसके बावजूद, विशेषज्ञों का मानना है कि रूस के ईरान और अमेरिका-इस्राइल के युद्ध के बीच सक्रिय रूप से शामिल होने की संभावना कम ही है. वालर ने कहा, "दोनों देश के बीच कोई रक्षा समझौता नहीं है." साथ ही, कुछ अन्य विश्लेषकों का मानना है कि ऐसा इसलिए भी हो सकता है क्योंकि रूस और इस्राएल के बीच एक अनौपचारिक समझौता माना जाता है कि वह एक-दूसरे पर हमला नहीं करेंगे.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विशेषज्ञ और राजनीतिक विश्लेषक, मोजतबा हशेमी के अनुसार, ईरान कहीं न कहीं रूस से "मजबूत राजनीतिक और सैन्य समर्थन" की उम्मीद कर रहा था. उन्होंने डीडब्ल्यू को बताया, "वह केवल मौखिक समर्थन ही नहीं, बल्कि सैन्य-तकनीक का विस्तार, खुफिया जानकारी तक पहुंच और दुश्मनों के मन में डर पैदा करने वाले संदेश की उम्मीद कर रहा था." इसके साथ ही उन्होंने यह भी जोड़ा कि ईरानी शासन का अनुमान गलत साबित हुआ है.

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हशेमी ने कहा, "रूस और चीन के पास चिंता करने के लिए पहले ही कई बड़ी परेशानियां हैं. उनका समर्थन अब तक ईरानी सरकार को हथियार और लोगों को दबाने के साधन देने तक ही सीमित रहा है."

जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के लेक्चरर, मोहम्मद गैदी का मानना है कि रूस का समर्थन न मिलना ईरानी नेताओं के लिए कोई हैरानी की बात नहीं थी. उन्होंने कहा, "तेहरान लंबे समय से मॉस्को के समर्थन को लेकर शंका में रहा है. जैसा कि पूर्व ईरानी राष्ट्रपति, महमूद अहमदीनेजाद ने कहा था, 'रूस हमेशा से बस ईरानी मुल्क को बेचता आया है' और राष्ट्रपति, मसूद पेजेश्कियान ने 12 दिन के युद्ध के बाद बयान दिया कि 'जिन देशों को हमने दोस्त माना, उन्होंने युद्ध के दौरान हमारी मदद नहीं की.'"

रूस को ईरान युद्ध के कारण कैसे फायदे और नुकसान

चैथम हाउस के रॉस का मानना है कि अगर ईरान युद्ध लंबा खिचता है, तो रूस को फायदा भी पहुंचा सकता है. उन्होंने कहा, "इससे मीडिया का ध्यान यूक्रेन के राष्ट्रपति, वोलोदिमीर जेलेंस्की से हटकर पूरी तरह ईरान और इस युद्ध के बढ़ने ले पैदा होने वाले जोखिम की ओर मुड़ जाएगा." उन्होंने कहा, "वॉशिंगटन एक और युद्ध मोर्चा सहन नहीं कर सकता है, न तो कूटनीतिक रूप से और न ही सैन्य बल के लिहाज से. और साफ है, जब प्राथमिकता तय करने की बात आएगी तो ध्यान मध्य-पूर्व कि ओर ही जाएगा."

साथ ही, रूस को कुछ आर्थिक लाभ भी मिल सकते हैं. ईरान ने होर्मुज जलडमरुमध्य को लगभग बंद ही कर दिया है, जहां से दुनिया के लगभग 20 फीसदी तेल और गैस का परिवहन होता है. जिसके बाद तेल और गैस की कीमतें तेजी से बढ़ गई हैं.

यूलियान वालर के मुताबिक, "अगर आने वाले कुछ महीनों या साल भर भी तेल कि कीमतें लगातार ऊंची रहती हैं, तो यह तेल और गैस निर्यातक रूस के लिए फायदेमंद हो सकता है." उन्होंने आगे कहा कि ऐसी स्थिति रूस की घरेलू टैक्स दरें कम करने के लिए मददगार हो सकता है, जो कि अब तक युद्ध को वित्तपोषित करने के लिए इस्तेमाल हो रहा था.

रॉस का मानना है कि ईरानी शासन के संभावित पतन से रूस को गंभीत झटका लग सकता है. चूंकि, रूस खुद को एक महाशक्ति के तरह पेश करना पसंद करता है. उन्होंने कहा, "ईरान, सीरिया और चीन समेत रूस, कई देशों के एक समूह का हिस्सा है, जो पश्चिमी नेतृत्व के बजाय दुनिया में एक बहुध्रुवीय क्रम स्थापित करना चाहते हैं." उन्होंने आगे कहा, "इस समूह का इतना तेजी से पतन होने का मतलब है रूस के तथाकथित यूरो-एशियाई क्षेत्र में उसके प्रभाव को बड़ा नुकसान होना."

क्या रूस-ईरान साझेदारी आगे भी जारी रह सकती है?

हशेमी का मानना है कि रूस की तरफ से ईरान को दिया जाने वाला सीमित समर्थन उनकी साझेदारी को भारी चोट पहुंचा सकता है.

उन्होंने आगे कहा, "रूस और चीन ने ईरान को अक्सर पश्चिमी देशों के साथ अपने भू-राजनीतिक सौदों के लिए इस्तेमाल किया है. अगर मौजूद शासन और अधिक कमजोर होता है, तो रूस जरूर गिरती हुई सरकार के बजाय नए ईरानी शासन में भरोसे कि तलाश कर सकता है. इसी तरह, चीन भी अगली सरकार से कुछ रियायतें लेकर अपना प्रभाव बनाए रखने की कोशिश कर सकता है. हालांकि, दोनों ही देश इस बात को अच्छी तरह समझते हैं कि इस्लामिक रिपब्लिक के पतन के बाद ईरान के साथ उनके रिश्ते पहले जैसे नहीं रहेंगे."

हालांकि, जॉर्ज वॉशिंगटन यूनिवर्सिटी के गैदी का मानना है कि मौजूदा ईरानी सरकार रूस के साथ करीबी संबंध बनाए रखना चाहेगी, क्योंकि पश्चिम के साथ उनके संबंध पहले से ही तनावपूर्ण हैं. उन्होंने कहा, "तेहरान इस साझेदारी को खोने का जोखिम नहीं लेगा, खासकर तब, जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में रूस के पास वीटो करने की शक्ति है."


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