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फ्रांस में सिर्फ वोट देकर नहीं विरोध प्रदर्शन से बनते हैं नागरिक

फ्रांस के इतिहास, संस्कृति और संविधान का हिस्सा है विरोध प्रदर्शन.

फ्रांस में सिर्फ वोट देकर नहीं विरोध प्रदर्शन से बनते हैं नागरिक
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हाल में हुई हिंसा और तोड़फोड़ से विरोध प्रदर्शनों पर उपद्रव का ठप्पा लग गया. हालांकि फ्रांस प्रदर्शनों से मुक्त होगा इसके आसार बिल्कुल नहीं हैं. फ्रांस के इतिहास, संस्कृति और संविधान का हिस्सा है विरोध प्रदर्शन.

जब फ्रेंच लोग ईंधन पर ऊंचे कर का विरोध करते हैं तो पीली जैकेट पहन कर मार्च करते हैं. बेहतर भुगतान चाहने वाले सैकड़ों किसान ट्रैक्टर लेकर शां एलिसी पर चले जाते हैं और जब म्यूजियम के कर्मचारी सैलानियों का बेहतर प्रबंधन चाहते हैं तो हड़ताल कर लूव्र म्यूजियम को बंद कर देते हैं. यह फ्रांस है. विरोध की ऐसी आजादी और तौर तरीकों की मिसालें दुनिया में दूसरी जगहों पर आसानी से नहीं मिलतीं.

भावुक सार्वजनिक विरोध उतना ही फ्रांसीसी है जितना कि उनका राष्ट्रगान "ला मासायेस." 1792 के इस राष्ट्रगान में अन्याय के खिलाफ संघर्ष को सार्वजनिक कर्तव्य माना गया है. हालांकि इस महीने हुए विरोध प्रदर्शन और उनके खिलाफ सख्ती से चिंता पैदा हो गई है.विरोध पर दंगों का साया भारी पड़ गया और बढ़ती महंगाई और स्कूलों की दुर्दशा के खिलाफ लाखों लोगों का शांतिपूर्ण प्रदर्शन कहीं पीछे रह गया.

सिर्फ शनिवार, 17 अक्टूबर को ही फ्रांस के कई शहरों से 2,400 लोगों को गिरफ्तार किया गया. प्रदर्शनों के दौरान हुए दंगों के बाद इन लोगों की गिरफ्तारी हुई. दंगों में पुलिस के साथ झड़पें हुईं, कारों को आग लगाया गया, सार्वजनिक इमारतों में जबरन घुसने और दुकानो में लूटपाट के अलावा एक ऐतिहासिक टाउनहॉल की इमारत को जला दिया गया. अभी विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला थमा नहीं है, आने वाले दिनों में और प्रदर्शन होने वाले हैं.

रविवार को राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने पूछा, "फ्रेंच लोग फ्रांस के साथ ऐसा कैसे कर सकते हैं? हम सब नाराज और शर्मिंदा हैं." हालांकि फ्रेंच इतिहास का कोई भी छात्र जानता है कि देश का गौरव रहे रंग बिरंगे और तेज नारों वाले प्रदर्शन कभी-कभी हिंसक हो जाते हैं. इसकी शुरुआत 1789 में राजतंत्र को उखाड़ फेंकने वाली क्रांति के दौरान किंग लुई सोलहवें की हत्या से हुई थी.

विरोध की संस्कृति का जन्म

इतिहासकारों का कहना है कि क्रांति के दौर में ही यह आधुनिक परंपरा जन्मी कि सार्वजनिक और राजनीतिक जीवन में भागीदारी प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है. सिर्फ वोटिंग ही बदलाव लाने का अकेला रास्ता नहीं है, प्रदर्शन को भी एक प्रमुख तरीका माना गया जिससे कि कुलीन वर्ग आम लोगों की बात सुने और आजादी की रक्षा हो. जब कोई बच्चा एक कार्यकर्ता बन जाता है तो उसे पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा में शामिल होने का पहला कदम माना जाता है. विरोध के अधिकार को संविधान में भी संरक्षित किया गया है.

बोर्दो के फ्रेंच नेशनल सेंटर फॉर साइंटिफिक रिसर्च में राजनीति शास्त्र के रिसर्च निदेशक मागाली डेला सुडा कहती हैं, "यह साझी पहचान और राजनीतिक समुदाय बनाने का एक तरीका है."

क्रांति के बाद का फ्रांस का इतिहास विरोध और सुधारों की कोई ठोस कहानी नहीं है बल्कि लोकप्रिय विरोधों, दमन, लामबंदी और राजनीतिक रियायतों के चक्र हैं. यह परंपरा 1871 में दुखद हो गई जब सरकार के सैनिकों ने नई "पेरिस कम्यून" यानी म्युनिसिपल प्रशासन के खिलाफ बल प्रयोग किया और हजारों लोगों की मौत हुई.

एक लिहाज से साझी कार्रवाई की 1968 में जीत हुई जब छात्रों के प्रदर्शन और आम हड़ताल ने सरकार को न्यूनतम मजदूरी जैसी कुछ छूट देने पर विवश किया. हाल के वर्षों में "येलो वेस्ट्स" ईंधन कर में प्रस्तावित इजाफे के खिलाफ हुआ प्रदर्शन था. इसने जीवन चलाने का खर्च और असमानता जैसे मुद्दों को बड़ा किया. 2018 और 2019 में हुए कुछ विरोध प्रदर्शनों में भी कारें जलीं, लूटपाट और पुलिस के साथ झड़पें हुईं. फ्रांस में विरोध प्रदर्शनों के दौरान हुई हिंसा असामान्य बात नहीं है लेकिन इससे शांतिपूर्ण प्रदर्शनों की छवि खराब होती है.

यही हाल सप्ताहांत में हुए प्रदर्शनों का हुआ जो शिक्षा की व्यवस्था और दूसरी चिंताओं को लेकर था. हालांकि दुनिया को इसमें पुलिस के साथ झड़प और लूटमार के नाटकीय दृश्य ही दिखे. अभी यह साफ नहीं है कि दुकानों को लूटने वालों में कितने लोग ऐसे थे जो सचमुच प्रदर्शन करने आए थे. लाखों की भीड़ में बहुत से मौकापरस्त लोग भी थे. सरकार ने कई इलाकों में रात का कर्फ्यू लगा दिया है, इस सप्ताहांत में भी प्रदर्शन के लिए अह्वान किया जा रहा है.

पुलिस हिंसा पर आरोप

विरोध प्रदर्शनों के दौरान होने वाली हिंसा के लिए अकसर पुलिस पर आरोप लगते हैं, विरोध प्रदर्शनों के इतिहास और पुलिसिंग का अध्ययन करने वाले राजनीतिक शास्त्री फाबियान जोबार्ड का कहना है कि पिछले महीने प्रदर्शन जिन वजहों से भड़के उनके पीछे हाल की कुछ फ्रेंच परंपराओं की भूमिका है.

जोबार्ड के मुताबिक 1990 के दशक से ही फ्रांस में बार-बार ये लहर उठती रही है जिसे फ्रेंच लोग "शहरी अशांति" नाम देते हैं, अमेरिका में इसी को दंगा कहा जाता है. ये अकसर पुलिस की हिंसा से भड़क उठते हैं. 2005 में पुलिस से बचकर भागते हुए दो किशोरों की मौत हुई. इसी तरह 2023 में जब एक अधिकारी ने 17 साल के किशोर को ट्रैफिक स्टॉप पर गोली मार दी. इन दोनों घटनाओं के बाद हिंसक प्रदर्शन हुए. जोबार्ड का कहना है, "उपनगरों में रहने वाले युवाओं के लिए दंगा एक तरह की सामूहिक अभिव्यक्ति है."

सरकार के आलोचक और मानवाधिकर समूहों ने पिछले महीने हुई गैरजरूरी हिंसा के लिए पुलिस की तिकड़मों पर आरोप लगाया है. सबसे ज्यादा आलोचना रबर बुलेट लॉन्चरों की हो रही है जिन्हें फ्रांस में एलबीडी कहा जाता है. इसके अलावा स्टन ग्रेनेड भी निशाने पर है, जिनसे प्रदर्शनकारी गंभीर रूप से घायल हुए.

डेला सुडा ने ध्यान दिलाया कि 17 अक्टूबर तक बीते हफ्तों में हुई गिरफ्तारियों की संख्या 8,000 तक पहुंच गई. जबकि 1998 में 500,000 लाखों छात्रों के विरोध प्रदर्शन के दौरान महज कुछ दर्जन लोग ही गिरफ्तार हुए थे. उस समय भी स्कूलों की खराब हालात के खिलाफ छात्रों ने प्रदर्शन किया था.

प्रदर्शनकारियों को यह भी लगा कि उनकी बात नहीं सुनी जा रही है. "येलो वेस्ट" प्रदर्शनों के दौरान लोगों की शिकायत सुनने के लिए एक डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाया गया जिससे "एक राष्ट्रीय बहस" शुरू हुई. इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ. डेला सुडा का कहना है, इन सब वजहों से "अविश्वास बढ़ रहा है."


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