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मध्य पूर्व संकट से इंडो-पैसिफिक रणनीति पर असर

खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष अमेरिका की इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) रणनीति को कमजोर कर सकता है

मध्य पूर्व संकट से इंडो-पैसिफिक रणनीति पर असर
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अमेरिकी संसाधन खाड़ी में खिंचे, एशिया चिंतित

  • भारत समेत एशियाई देशों में बढ़ी बेचैनी
  • पूर्व अधिकारियों की चेतावनी: लंबा असर तय
  • चीन से मुकाबले की तैयारी पर संकट का साया
  • मध्य पूर्व पर अमेरिका का फोकस: हिंद-प्रशांत क्षेत्र के लिए बढ़ सकती हैं चुनौतियां

वाशिंगटन। खाड़ी क्षेत्र में जारी संघर्ष अमेरिका की इंडो-पैसिफिक (हिंद-प्रशांत) रणनीति को कमजोर कर सकता है। इससे भारत जैसे देशों की चिंता बढ़ रही है, क्योंकि अमेरिका का ध्यान और सैन्य संसाधन एशिया से हटकर खाड़ी की ओर जा रहे हैं। अमेरिका के पूर्व वरिष्ठ अधिकारियों ने यह चेतावनी दी है।

एक पूर्व अधिकारी ने कहा कि इस संकट का असर अब अमेरिका की अन्य क्षेत्रों, खासकर एशिया से जुड़ी योजनाओं पर दिखने लगा है, जहां अमेरिका चीन के खिलाफ अपनी ताकत मजबूत करना चाहता था।

दूसरे पूर्व अधिकारी ने भी माना कि इसका असर साफ दिखाई देगा। उन्होंने कहा कि इससे अमेरिका के सैन्य संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है।

उन्होंने बताया कि अमेरिका ने अपने कई अहम संसाधन, जैसे वायु रक्षा प्रणाली, पहले ही खाड़ी क्षेत्र में भेज दिए हैं। इनमें से कई सिस्टम एशिया से हटाकर वहां लगाए गए हैं।

अधिकारी ने कहा, "अभी इस क्षेत्र में हमारी लगभग सभी हवाई रक्षा प्रणालियां मौजूद हैं, और उनमें से कई एशिया से ही लाई गई हैं।"

ये टिप्पणियां नई दिल्ली सहित एशियाई राजधानियों में एक बड़ी चिंता को उजागर करती हैं कि मध्य पूर्व में लंबे समय तक चलने वाला संघर्ष इंडो-पैसिफिक पर अमेरिका के ध्यान को कम कर सकता है।

अमेरिका के एक पूर्व वरिष्ठ अधिकारी ने कहा कि इस तरह के बदलावों का अक्सर लंबे समय तक असर रहता है। उन्होंने बताया कि एक बार सेना की तैनाती बदल दी जाए, तो उसे जल्दी वापस नहीं लाया जाता।

उन्होंने कहा, “स्थिति को संभालने में काफी लंबा समय लग सकता है, और इसके लिए अमेरिका को उस क्षेत्र में लंबे समय तक अपनी सेना रखनी पड़ेगी।” अधिकारी ने पुराने उदाहरण देते हुए बताया कि पहले भी संकट के समय जो सैन्य बल भेजे गए थे, वे बाद में भी लंबे समय तक वहीं बने रहे।

दूसरे अधिकारी ने कहा कि समय के साथ इसका असर वैश्विक स्तर पर दिखेगा और अमेरिका की अन्य क्षेत्रों में तैयारी भी प्रभावित हो सकती है। उन्होंने कहा, “सिर्फ पैसा इस समस्या का समाधान नहीं है, क्योंकि इसमें समय और भौतिक सीमाओं की भी चुनौती है।”

सैन्य संसाधनों के अलावा, यह संकट अमेरिका के शीर्ष नेतृत्व का ध्यान भी अपनी ओर खींच रहा है। विश्लेषकों का कहना है कि इससे एशिया से जुड़े रणनीतिक फैसलों की रफ्तार धीमी हो सकती है।

पहले अधिकारी ने कहा, “अभी वरिष्ठ नेताओं का समय और ध्यान कहीं और लगा हुआ है,” और यह भी बताया कि इतिहास में भी मध्य पूर्व के संकटों ने अमेरिका का ध्यान अन्य क्षेत्रों से हटाया है।

भारत और अन्य इंडो-पैसिफिक देशों के लिए यह स्थिति चिंता बढ़ाने वाली है, क्योंकि इससे अमेरिका की रणनीतिक प्रतिबद्धता पर सवाल खड़े हो सकते हैं, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा बढ़ रही है।

अधिकारी ने कहा कि इस संकट से पहले भी एशियाई देशों और अमेरिका के बीच व्यापार और आर्थिक मुद्दे पूरी तरह सुलझे नहीं थे, जिससे संबंधों पर दबाव बना हुआ है। उन्होंने कहा, “अमेरिका और एशिया के लगभग हर देश के बीच कुछ महत्वपूर्ण मुद्दे अभी भी लंबित हैं।”

साथ ही, खाड़ी का यह संघर्ष अमेरिका के सहयोगी देशों पर नई जिम्मेदारियां भी डाल सकता है। अधिकारी ने कहा, “ज्यादातर एशियाई देश यह मानकर चल रहे हैं कि उनसे किसी न किसी रूप में खाड़ी में अमेरिका की भूमिका का समर्थन करने के लिए कहा जा सकता है।”

हालांकि, ऐसा समर्थन जुटाना आसान नहीं होगा। उन्होंने कहा कि यह युद्ध न केवल यूरोप में बल्कि एशिया के कई देशों में भी लोकप्रिय नहीं है, जिससे वहां की सरकारों पर घरेलू दबाव है।

पिछले कुछ वर्षों में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र अमेरिका की रणनीति का केंद्र रहा है, खासकर चीन के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए। भारत के लिए इस क्षेत्र में अमेरिका की सक्रिय भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है।

लेकिन इतिहास बताता है कि मध्य पूर्व के संकट अक्सर अमेरिका का ध्यान और संसाधन एशिया से हटा देते हैं। अगर खाड़ी का यह संघर्ष लंबा चलता है, तो अमेरिका के वैश्विक दायित्वों और इंडो-पैसिफिक प्राथमिकताओं के बीच संतुलन बिगड़ सकता है।


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