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साढ़े चार साल में पहली बार मिले जर्मन और रूसी विदेश मंत्री

2022 में यूक्रेन में रूस की तरफ से छेड़े गए युद्ध के बाद यह दोनों देशों के सर्वोच्च राजनयिकों की पहली सीधी मुलाकात रही.

साढ़े चार साल में पहली बार मिले जर्मन और रूसी विदेश मंत्री
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न्यूयॉर्क में शनिवार को जर्मनी और रूस के विदेश मंत्रियों की मुलाकात हुई. 2022 में यूक्रेन में रूस की तरफ से छेड़े गए युद्ध के बाद यह दोनों देशों के सर्वोच्च राजनयिकों की पहली सीधी मुलाकात रही.

जर्मन विदेश मंत्री योहान वाडेफुल और रूसी विदेश मंत्री सेर्गेई लावरोव के बीच यह मुलाकात करीब 20 मिनट तक चली और इसके आखिर में दोनों ने हाथ मिलाया. रूसी विदेश मंत्री की प्रवक्ता मारिया जाखरेवा के हवाले से रूसी समाचार एजेंसी तास ने लिखा कि जर्मन पक्ष के आग्रह पर यह बैठक हुई. जर्मन और रूसी प्रतिनिधि 2022 के बाद से विभिन्न बैठकों में एक साथ हिस्सा लेते रहे हैं, लेकिन आमने-सामने हुई यह दोनों पक्षों की पहली मुलाकात थी. दोनों देशों के विदेश मंत्री संयुक्त राष्ट्र महासभा में हिस्सा लेने के लिए न्यूयॉर्क गए हुए हैं.

कुछ भी नया नहीं

इस मुलाकात के बाद पत्रकारों के बात करते हुए लावरोव ने कहा कि वाडेफुल ने बस वही बातें दोहराईं जो जर्मन नेता हर दिन आधिकारिक और सार्वजनिक तौर पर करते रहते हैं. उन्होंने आगे कहा, "मैंने कुछ भी नया नहीं सुना. मैंने उन्हें साफ तौर पर बता भी दिया. मैंने कहा, "मैंने सोचा था कि आपने पास कहने को कुछ दिलचस्प, कुछ अनोखा होगा, लेकिन आप बस कॉल करके यह भी कह सकते थे, मेरी भाषण पढ़ लेना".

वहीं, समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने जर्मन प्रतिनिधिमंडल के एक सूत्र के हवाले खबर दी है कि वाडेफुल ने रूस आग्रह किया है कि वह काले सागर के जरिए अनाज के निर्यात पर समझौता करने के लिए हर संभव कदम उठाए. हाल के महीनों में रूस और यूक्रेन एक दूसरे के बंदरगाहों, विकास के बुनियादी ढांचों और जहाजों को निशाना बना रहे हैं, ऐसे में काले सागर से दोनों ही देशों का निर्यात बहुत सीमित हो गया है.

अब यूक्रेन और उसके सहयोगी काले सागर में एक सीमित संघर्षविराम पर सहमति बनाने के लिए दबाव डाल रहे हैं और वो यह भी चाहते हैं कि ऊर्जा इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमले पर हमले रोके जाएं. लेकिन रूस ने अभी तक ऐसा कोई संकेत नहीं दिया है कि वह इस तरह की पहलों का समर्थन करता है.

एक सूत्र के मुताबिक, वाडेफुल ने लावरोव से कहा, "समय बहुत अहम है. कई देशों, खासकर दक्षिणी गोलार्ध में खाद्य संकट को देखते हुए सभी पक्षों को रचनात्मक तरीके से बातचीत के लिए तैयार रहना चाहिए.” सूत्र ने बताया कि वाडेफुल ने लावरोव से यह भी कहा कि एक व्यावहारिक समाधान आगे के ठोस कदमों का रास्ता खोल सकता है.

जर्मनी की भूमिका अहम

यूक्रेन में युद्ध शुरू होने के बाद से ही रूस और जर्मनी के संबंध बेहद तनावपूर्ण रहे हैं. जर्मनी यूक्रेन का करीबी सहयोगी है. इस साल जर्मनी के शहर लाइपजिष में ड्रोन से जुड़ी एक घटना के बाद दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया. वाडेफुल ने कुछ दिन पहले ही आरोप लगाया था कि रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन लगातार बढ़ रहे हायब्रिड हमलों के जरिए यूरोप में तनाव बढ़ा रहे हैं.

जर्मन सरकार ने लाइपजिष एयरपोर्ट पर ड्रोन हमले की नाकाम कोशिश के लिए भी रूस को जिम्मेदार ठहराया और इसके जवाब में रूस पर लगाए जाने वाले प्रतिबंधों का एलान किया. इसमें बर्लिन के रशियन हाउस का कॉन्ट्रैक्ट खत्म करना भी शामिल है, जिस पर सांस्कृतिक गतिविधियों की आड़ में जासूसी करने का संदेह है. रूसी सरकार ने इन आरोपों को खारिज किया और बदले की कार्रवाई करते हुए अपने यहां गोएथे इंस्टिट्यूट्स को बंद करने का आदेश दिया.

वहीं, रूसी राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के उप प्रमुख दिमित्री मेदवेदेव ने कहा है कि जर्मनी ने "रूस विरोधी नीति" अपनाकर खुद अपनी सजा कमाई है. पूर्व रूसी राष्ट्रपति मेदवेदेव ने जर्मनी में उन हथियार कंपनियों को "सीधा निशाना" बनाने की बात कही जो यूक्रेन को सैन्य साजोसामान की आपूर्ति करती हैं. यूक्रेन में जारी युद्ध को पांचवां साल चल रहा है, जिसमें पश्चिमी देश आर्थिक और सैन्य रूप से उसकी मदद कर रहे हैं. जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने यूक्रेन अपनी मदद घटाई है, तब से यूरोप और खासकर जर्मनी की भूमिका अहम हो गई है.


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