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फैक्ट चेक: क्या जर्मनी का विश्व कप फुटबॉल मैच देखने स्टेडियम में हिटलर का हमशक्ल मौजूद था?

फैक्ट चेक: क्या जर्मनी का विश्व कप फुटबॉल मैच देखने स्टेडियम में हिटलर का हमशक्ल मौजूद था?
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कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक तस्वीर तेजी से वायरल हुई जिसमें दावा किया गया कि जर्मनी की कुरासाओ पर 7-1 की जीत के दौरान स्टेडियम में हिटलर जैसा दिखने वाला एक फुटबॉल फैन मौजूद था. लेकिन क्या यह वायरल तस्वीर असली है?

बीते रविवार को फीफा वर्ल्ड कप मैच के दौरान जर्मनी का पूरा ध्यान अपनी राष्ट्रीय टीम की कुरासाओ पर 7-1 की शानदार और एकतरफा जीत पर था. हालांकि, मैदान के बाहर, सोशल मीडिया पर बहुत से लोग एक बिल्कुल अलग चीज पर अटक गए थे. वह था स्टेडियम के अंदर के एक प्रशंसक की तस्वीर, जिसने जर्मनी की जर्सी पहन रखी थी, हाथ में जर्मनी का झंडा थाम रखा था और जिसका चेहरा हूबहू हिटलर से मिल रहा था.

यह तस्वीर कई प्लेटफॉर्म पर शेयर की गई और इसे लाखों बार देखा गया. मसलन, एक्स पर इस पोस्ट को 30 लाख से ज्यादा बार देखा गया. जबकि, इंस्टाग्राम पर इस पोस्ट को 4,60,000 से ज्यादा लाइक मिले. यह दावा कई अन्य भाषाओं में भी वायरल हुआ. जैसे, फेसबुक पर स्पेनिश भाषा में और थ्रेड्स पर रूसी भाषा में. कुछ सोशल मीडिया पोस्ट में जर्मन विरोधी भावना का असर भी दिखा. जैसे, रेडिट की एक पोस्ट में ताना मारते हुए लिखा गया था, "यह देखना हमेशा ही लाजवाब होता है कि जब प्रशंसक अपनी टीम का हौसला बढ़ाने के लिए इस तरह खुलकर सामने आते हैं!”

हालांकि, यह तस्वीर असली नहीं है. डीडब्ल्यू ने फैक्ट चेक में पाया कि यह तस्वीर नकली है और एआई की मदद से छेड़छाड़ करके तैयार की गई है. इस तस्वीर की सच्चाई का पता लगाने के लिए, हमने कई तरीके अपनाए.

1. असली तस्वीर देखें

हिटलर जैसे दिखने वाले शख्स की यह कथित तस्वीर मैच के टीवी ब्रॉडकास्ट का एक स्क्रीनशॉट लगती है, जिसमें पहले हाफ के स्टॉपेज टाइम का टाइमस्टैम्प भी है. यह ठीक उसी समय की बात है, जब काई हावेर्त्स ने पेनल्टी को गोल में बदलकर जर्मनी को 3-1 की बढ़त दिला दी थी. उस वक्त स्टेडियम में मौजूद प्रशंसक बेहद खुश थे और जश्न मना रहे थे.

जब मैच के असली ब्रॉडकास्ट को दोबारा देखा गया, तो उसमें फैंस का वही समूह हावेर्त्स के गोल के बाद जश्न मनाता हुआ दिखाई देता है, लेकिन उसमें एक अहम अंतर दिखा. हिटलर जैसा दिखने वाला वह कथित शख्स उस पूरी फुटेज में कहीं भी नहीं दिखा. इसके बजाय, असली फुटेज में भूरे बालों वाला एक व्यक्ति दिखता है, जो हिटलर जैसा बिल्कुल नहीं लगता.

ऊपर दी गई दोनों तस्वीरों के बीच स्लाइड करके, यह अंतर साफ तौर पर देखा जा सकता है. एक तस्वीर असली ब्रॉडकास्ट की है, जो दाईं ओर जर्मन पब्लिक ब्रॉडकास्टर एआरडी की फुटेज है. जबकि, दूसरी तस्वीर वह है जिससे एआई की मदद से छेड़छाड़ करके तैयार किया गया है. यहां यह समझना जरूरी है कि वर्ल्ड कप जैसे बड़े खेल आयोजनों के लिए, मैच का मुख्य लाइव वीडियो खुद आयोजन करने वाली संस्था तैयार करती है. इस मामले में, फीफा ने तैयार किया है. फिर इसी मुख्य वीडियो फीड को दुनिया भर के पार्टनर चैनलों और ब्रॉडकास्टर्स को सेंट्रल फीड के तौर पर दिया जाता है.

इसका मतलब यह है कि सभी चैनलों पर दिखाए जाने वाले मुख्य वीडियो (मैच के दृश्य) बिल्कुल एक जैसे होते हैं. बस, अलग-अलग चैनल अपनी जरूरत के हिसाब से उसमें छोटे-मोटे बदलाव करते हैं, जैसे कि अपना लोगो लगाना या स्कोरबोर्ड का रंग बदलना. लाइव टेलीकास्ट के अलावा, उस फैंस के समूह में कौन-कौन लोग शामिल थे, इसका एक और सुराग उन फोटो एजेंसियों की तस्वीरों को देखकर लगाया जा सकता है जिन्हें इस मैच को कवर करने की आधिकारिक अनुमति मिली हुई थी.

उदाहरण के लिए, बर्लिन की एक एजेंसी इमागो की नीचे दी गई तस्वीर देखिए. इमागो अक्सर बड़े खेल आयोजनों को कवर करती है. इस फोटो में प्रशंसकों के उसी समूह को एक अलग एंगल से दिखाया गया है और यहां भी हिटलर जैसा दिखने वाला कोई शख्स मौजूद नहीं है.

भले ही, फोटो एजेंसी द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर उस सटीक समय का पता लगाना मुमकिन नहीं था, जब यह तस्वीर खींची गई थी. फिर भी, इसे इस बात का एक और पक्का सबूत माना जा सकता है कि प्रशंसकों के उस समूह में हिटलर जैसा कोई भी आदमी शामिल नहीं था.

2. क्या यह एआई से तैयार की गई तस्वीर है?

इस तस्वीर के असली होने की जांच करने का अगला कदम यह पता लगाना है कि क्या इसे आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का इस्तेमाल करके बनाया गया है या इसमें कोई बदलाव किया गया है. कई एआई चैटबॉट्स अब यह जांच करने की सुविधा भी देते हैं कि क्या उनके सिस्टम का इस्तेमाल किसी तस्वीर को बनाने या उसमें कोई बदलाव करने के लिए किया गया था.

यह इसलिए मुमकिन है, क्योंकि ऐसे एआई टूल तस्वीर के अंदर एक डिजिटल वॉटरमार्क छिपा देते हैं. यह वॉटरमार्क हमारी खुली आंखों से दिखाई नहीं देता, लेकिन जब इस तकनीक (टूल) का इस्तेमाल करके तस्वीर की जांच की जाती है, तो इसे आसानी से पकड़ा जा सकता है.

चैटजीपीटी बनाने वाली अमेरिकी संस्था ‘ओपनएआई' के जरिए की गई जांच से पता चलता है कि हिटलर जैसे दिखने वाले शख्स की इस तस्वीर को बनाने के लिए वाकई उनके ही एआई टूल का इस्तेमाल किया गया था. ओपनएआई के विश्लेषण में कहा गया कि उसे ‘तस्वीर के भीतर एक सिंथ-आईडी वॉटरमार्क मिला है जो खुद ओपनएआई सिस्टम से ही तैयार हुआ था.”

गूगल के जेमिनी टूल की मदद से की गई एक और जांच से कुछ नए सबूत मिलते हैं. इससे पता चलता है कि इमेज में बदलाव करने के लिए, गूगल एआई के किसी सिस्टम का इस्तेमाल नहीं किया गया था, लेकिन इसमें यह भी कहा गया है कि "तस्वीर का विश्लेषण करने और उसके संदर्भ की जांच करने से साफ पता चलता है कि इस फोटो में डिजिटल तौर पर बदलाव किया गया है या इसे डिजिटल तरीके से बनाया गया है.”

एक तीसरा टूल है, एक्स का ग्रोक. यह टूल इस इमेज को ‘पूरी तरह नकली' बताता है. यह वायरल पोस्ट के नीचे, एक्स पर एक यूजर के सवाल का जवाब देते हुए ऐसा कहता है. इसमें आगे कहा गया है, "यह तस्वीर असली नहीं है. इसमें डिजिटल तौर पर बदलाव (एआई या फोटोशॉप) करके, 2026 वर्ल्ड कप की भीड़ में हिटलर को दिखाया गया है.

हालांकि, इन टूल का इस्तेमाल हमेशा सावधानी से किया जाना चाहिए, क्योंकि इनसे कभी-कभी गलतियां हो सकती हैं. लेकिन, इस मामले में तीन अलग-अलग टूल एक जैसे नतीजे पर पहुंचे, जिससे ओरिजिनल फुटेज के आधार पर किए गए विश्लेषण की पुष्टि हुई.

3. संदर्भ के बारे में सोचें

एक तरफ जहां वर्ल्ड कप को एक बड़े उत्सव के रूप में देखा जाता है जो दुनिया भर के प्रशंसकों और संस्कृतियों को एक साथ लाता है. वहीं, दूसरी तरफ अगर स्टेडियम में सचमुच उस नाजी तानाशाह जैसा कोई प्रशंसक मौजूद होता जिसने दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत की थी और जो होलोकॉस्ट (यहूदियों के नरसंहार) का जिम्मेदार था, तो इससे स्टेडियम में बहुत बड़ा विवाद खड़ा हो जाता.

ऐसी घटना पर ब्रॉडकास्टर्स या स्टेडियम के अधिकारियों का ध्यान तुरंत जाता. साथ ही, स्टेडियम में मौजूद कई जर्मन प्रशंसक भी इस पर कड़ा विरोध जताते.

इसके अलावा, ध्यान देने वाली बात यह भी है कि इस तस्वीर में हिटलर जैसा दिखने वाला वह कथित शख्स काले, लाल और सुनहरे रंग की जर्मनी की जर्सी पहने हुए दिखाई दे रहा है. ये राष्ट्रीय रंग जर्मनी की लोकतांत्रिक परंपरा और संघीय गणराज्य की पहचान हैं.

भले ही, दक्षिणपंथी चरमपंथियों और लोकलुभावन राजनीति करने वाले नेताओं ने लंबे समय से इन रंगों और झंडे को अपने स्वार्थ के लिए इस्तेमाल करने की कोशिश की है, लेकिन काला, लाल और सुनहरा रंग असल में जिन मूल्यों और विचारों का प्रतीक है, वे हिटलर और नाजीवाद की सोच के बिल्कुल खिलाफ हैं. हिटलर की नजर में ये रंग एक कमजोर संसदीय प्रणाली के प्रतीक थे, जिसे उसने आगे चलकर पूरी तरह से खत्म कर दिया था.

यह फर्जी तस्वीर झूठी और भ्रामक खबरों के उस बड़े ट्रेंड का हिस्सा है जिसमें से ज्यादातर को एआई की मदद से तैयार किया गया है या बदलाव किया गया है. ऐसी तस्वीरें वर्ल्ड कप शुरू होने से पहले से लेकर मैच खेले जाने के दौरान लगातार इंटरनेट पर वायरल हो रही हैं.


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