Top
Begin typing your search above and press return to search.

म्यूनिख में अमेरिका के सामने एकजुट यूरोप

जर्मनी में चल रहे म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में यूरोपीय नेता अमेरिका के सामने एकजुट हो कर खड़े होने का संदेश देते दिख रहे हैं. वहीं अमेरिका ने दोस्ती बरकरार रखने का संकेत दिया है

म्यूनिख में अमेरिका के सामने एकजुट यूरोप
X

जर्मनी में चल रहे म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन में यूरोपीय नेता अमेरिका के सामने एकजुट हो कर खड़े होने का संदेश देते दिख रहे हैं. वहीं अमेरिका ने दोस्ती बरकरार रखने का संकेत दिया है.

म्यूनिख सुरक्षा सम्मेलन के पहले दिन जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने कड़े शब्दों में अमेरिका के साथ दोस्ती पर पुनर्विचार करने की बात कही. वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों ने मैर्त्स की बातों को दोहराते हुए कहा कि यूरोप को अब खुद को इतना मजबूत करना होगा कि पूरी दुनिया उससे सीख ले सके.

जर्मनी के म्यूनिख में पिछले छह दशकों से इस सुरक्षा सम्मेलन को आयोजित किया जाता रहा है. शुरुआत हुई थी शीत युद्ध के दौरान जब नाटो सदस्य आपस में मिल कर यूरोप और अमेरिका की सुरक्षा पर चर्चा करते थे. नब्बे के दशक में शीत युद्ध के खत्म होने के बाद इसे बाकी के देशों के लिए भी खोला गया. लेकिन यहां उद्घाटन के दौरान जर्मन चांसलर के भाषण देने का चलन नहीं रहा है. इस साल इस चलन को बदला गया.

चांसलर मैर्त्स ने उद्घाटन के दौरान अपने भाषण में कहा कि मौजूदा हालात को देखते हुए उनके लिए जरूरी था कि वे शुरू में ही आ कर सम्मेलन को सही दिशा दे सकें. करीब पैंतालीस मिनट चले उनके भाषण में यूरोप के आदर्श और अमेरिका के सामने उसका एकजुट हो कर खड़े रहना केंद्र में रहा.

अमेरिका बनाम यूरोप

मैर्त्स को सम्मेलन की शुरुआत में ही जगह देने की बड़ी वजह रहे अमेरिका के उपराष्ट्रपति जेडी वैन्स, जिन्होंने पिछले साल यहां उद्घाटन भाषण दिया था और कड़े शब्दों में यूरोपीय नेताओं और उनकी नीतियों की निंदा की थी. इस साल पहले दिन की शुरुआत मैर्त्स और अंत फ्रांस के राष्ट्रपति इमानुएल माक्रों के भाषणों से करना अमेरिका को जवाब देने जैसा रहा, जिसका असर अगली सुबह अमेरिका के विदेश मंत्री मार्को रूबियो के भाषण में देखने को मिला.

जेडी वैन्स से बिलकुल उलट रूबियो यूरोप की तारीफ करते और अमेरिका की संस्कृति की नींव को यूरोप में दिखाते हुए नजर आए. उन्होंने इतिहास के पन्ने खोलकर दिखाने की कोशिश की और मजाकिया अंदाज में अमेरिका के पॉप कल्चर, यहां तक कि वहां की बीयर और काओ-बॉय संस्कृति के बीज यूरोप में होने की बात कही. अपनी पूरी स्पीच में रूबियो इस बात को दोहराते दिखे कि अमेरिका यूरोप के साथ दोस्ती बरकरार रखना चाहता है लेकिन इस दोस्ती की शर्तें अब बदल रही हैं.

नाटो का भविष्य

रूबियो के ये बयान मैर्त्स के भाषण के जवाब में दिखे, जिसमें उन्होंने कहा था कि अमेरिका को यह समझने की जरूरत है कि ना केवल नाटो को उसकी जरूरत है, बल्कि उसे भी नाटो की जरूरत है. मैर्त्स ने अमेरिका को चेतावनी भरे स्वर में कहा कि अकेले रह कर वह उतना ताकतवर नहीं रह पाएगा.

अपने भाषण में मैर्त्स ने सीधे तौर पर डॉनल्ड ट्रंप का नाम कहीं भी नहीं लिया. लेकिन वे लगातार अमेरिका की ओर निशाना साधते रहे. उन्होंने कहा कि अमेरिका को यह समझना होगा कि वह दुनिया का नेतृत्व करने का जो दावा करता रहता है, अब उसे अब चुनौती दी जा चुकी है और वह इस हक को खो चुका है. उसके सामने अब चीन खड़ा है. और यूरोप भी अब अपनी गलतियों को समझ चुका है और उन्हें सुधारने की शुरुआत कर चुका है. इसमें यूरोपीय देशों के रक्षा बजट को बढ़ाने को जीडीपी का करीब पांच फीसदी हिस्से सैन्य निवेश में लगाना शामिल है.

पहले यूक्रेन, फिर ग्रीनलैंड

ऐसा पहली बार नहीं है जब यूक्रेन का मुद्दा म्यूनिख में छाया रहा हो. लेकिन युद्ध खत्म करने की प्रतिबद्धता अब अधिक देखने को मिली. यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की ने मैर्त्स से मुलाकात की. लेकिन मार्को रूबियो ने अकेले में उनसे मिलने से इंकार कर दिया. हालांकि कड़े भाषणों के बीच रूबियो और मैर्त्स ने द्विपक्षीय बातचीत की. सूत्रों के मुताबिक इस बातचीत में टैरिफ और ग्रीनलैंड का मुद्दा अहम रहा.

ट्रंप के ग्रीनलैंड को ले कर डेनमार्क को धमकाने को यूरोपीय नेताओं के इस तरह से एकजुट होने का मुख्य कारण बताया जा रहा है. मैर्त्स अपने भाषण में यह कहते हुए बिलकुल भी नहीं कतराए कि वे डेनमार्क के साथ संपर्क में हैं और डेनमार्क उन पर भरोसा कर सकता है. कॉन्फ्रेंस के दौरान रूबियो बंद दरवाजों के पीछे ग्रींडलैंड के मुद्दे पर भी चर्चा करने वाले हैं.

ईयू, यूएन, यूएस और चीन

कॉन्फ्रेंस की शुरुआत में सम्मेलन के अध्यक्ष वोल्फगांग इशिंगर ने यूरोपीय संघ, संयुक्त राष्ट्र, अमेरिका और चीन से सीधे सवाल किए. उन्होंने पूछा कि ईयू के पास सिर्फ बातें करने और भाषण देने के आगे भी क्या कोई ठोस कदम हैं, जिससे वह अपनी सीमाओं की सुरक्षा को सुनिश्चित कर सके. क्या यूएन परमाणु संधि के तहत उन देशों को अतिरिक्त सुरक्षा दिलाने के लिए कुछ कर रहा है, जिनके पास परमाणु हथियार नहीं हैं. क्या ट्रंप सरकार वाकई मित्रों और साझेदारों में भरोसा रखती है और उनके साथ दोस्ताना व्यवहार रखना चाहती है. और चीन, यूक्रेन में चल रहे युद्ध को खत्म कराने के लिए रूस के साथ किस हद तक काम करने के लिए तैयार है. इस साल की कॉन्फ्रेंस इन्हीं चार बिंदुओं पर केंद्रित नजर आती है.


Next Story

Related Stories

All Rights Reserved. Copyright @2019
Share it