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चीन और अमेरिका के परे, नए वैश्विक गठबंधन की अपील करते मैर्त्स

जर्मन चांसलर ने जापान से नियम आधारित व्यवस्था के लिए नए वैश्विक गबंधन का समर्थन करने की अपील की है.

चीन और अमेरिका के परे, नए वैश्विक गठबंधन की अपील करते मैर्त्स
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जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने जापान से नियम आधारित व्यवस्था के लिए नए वैश्विक गबंधन का समर्थन करने की अपील की है. ट्रंप और शी के रुख के चलते मैर्त्स ऐसा गठबंधन बनाने की भरपूर कोशिश कर रहे हैं.

बुधवार को सिंगापुर से जापान पहुंचे जर्मन चांसलर फ्रीडरिष मैर्त्स ने टोक्यो में एक कारोबारी सम्मेलन को संबोधित किया. इस दौरान मैर्त्स ने कहा कि "एक जैसी सोच वाले साझेदारों" का गठबंधन, टैरिफों और बढ़ती आर्थिक दादागिरी का प्रतिरोध कर सकेगा.

सीधे तौर पर अमेरिका और चीन का नाम न लेते हुए मैर्त्स ने कहा, "क्या दूसरों को वैश्विक कारोबार सिस्टम के नियम तोड़ने चाहिए, क्या आर्थिक दादागिरी का इस्तेमाल किया जाना चाहिए, हम गठबंधन के तहत अपने तालमेल भरे कदम उठा सकते हैं और एक एकजुट मोर्चा पेश कर सकते हैं."

कहां से आया गठबंधन का ये विचार

जर्मन चांसलर जिस तरह से गठबंधन का प्रस्ताव रख रहे हैं, वह काफी हद तक कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी के आइडिया से मिलता है. इसी साल जनवरी में अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के व्यवहार से तंग आकर, कार्नी ने मध्यम ताकत वाले देशों से एकजुट होकर आर्थिक महाशक्तियों के दबाव का जवाब देने की अपील की.

अमेरिका के साथ सीमा साझा करने वाला कनाडा, ट्रंप के टैरिफों, तानों और साझा झीलों के नाम बदलने से दुखी है. नाराजगी जाहिर करने के बाद भी जब अमेरिकी राष्ट्रपति नहीं रुके तो कार्नी ने दूसरे देशों के साथ रिश्तों को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया. बीते कुछ महीनों से यूरोप भी कार्नी जैसा रास्ता अपनाता दिख रहा है.

कार्नी के जनवरी वाले भाषण की एक पंक्ति दोहराते हुए टोक्यों में मैर्त्स ने कहा, "अगर हम साथ मिलकर आगे बढ़ते हैं, तो ये सवाल पैदा नहीं होगा कि हम खाने के मेन्यू पर हैं या फिर टेबल पर बैठे हैं."

एक सी सफलता के बाद, एक जैसी मुश्किल में घिरे जर्मनी और जापान

जर्मनी यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और जापान एशिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था. दोनों देशों की समृद्धि का रास्ता व इतिहास भी काफी मिलता जुलता है. 1945 में दूसरा विश्वयुद्ध खत्म होते होते, जर्मनी और जापान बुरी तरह बर्बाद हो चुके थे. अमेरिका और पश्चिमी देशों के सहयोग से दोनों औद्योगिक रूप से फिर ना सिर्फ खड़े हुए बल्कि आविष्कारों और नई तकनीकों का पावरहाउस भी बन गए. दूसरे महायुद्ध के बाद अपनी सैन्य ताकत न्यूनतम स्तर पर करने के बावजूद दोनों मजबूत आर्थिक ताकत बन गए.

लेकिन अब वैश्विक हालात बदल चुके हैं. सस्ते श्रम और बड़े बाजार के चलते चीन में किया गया विदेशी निवेश अब बीजिंग को उद्योग, तकनीक व मैनुफैक्चरिंग का पावरहाउस बना चुका है. चीन उन सब क्षेत्रों में जबरदस्त ढंग से कारोबार फैला चुका है, जो कभी जर्मनी और जापान की धुरी हुआ करते थे. चीन ने आर्थिक समृद्धि का बड़ा हिस्सा अपनी सेनाओं को मजबूत और आधुनिक करने में खर्च किया है. और अब जापान समेत दक्षिण पूर्वी एशिया के कई पड़ोसी, उसका सैन्य दबाव भी झेल रहे हैं.

दूसरी तरफ, दूसरी बार अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद से डॉनल्ड ट्रंप ने जिस तरह के फैसले कर रहे हैं, उससे जापान और जर्मनी समेत अमेरिका के कई करीबी साझेदार देश सकते में हैं. चीन की बढ़ती ताकत और अमेरिका का घटता व हैरान करने वाला समर्थन, 2026 में जापान और जर्मनी इसी हकीकत के सामने हैं. जापान जहां रणनीतिक रूप से चीन से ज्यादा चिंतित है, वहीं जर्मनी, रूस को लेकर आशंकित है. इन समीकरणों के चलते दूसरे विश्वयुद्ध के बाद पहली बार जर्मनी और जापान अपनी सेनाओं को बड़ा और मजबूत बनाने पर काम शुरू कर चुके हैं.

चीन को लेकर इतनी चिंताएं क्यों

जर्मनी, चीन को बड़े कारोबारी साझेदार और रणनैतिक प्रतिद्वंद्वी के तौर पर देखता है. चीन, जर्मनी का सबसे बड़ा कारोबारी साझेदार है. लेकिन 2026 में एक बार फिर चीन से व्यापार जर्मनी के लिए घाटे का सौदा रहा. जर्मनी और पश्चिमी देश आरोप लगाते हैं कि चीन अपनी सरकारी कंपनियों को अथाह आर्थिक मदद देता है, जिसके चलते उनके उत्पाद बेहद सस्ते हो जाते हैं. इसके चलते दूसरे देशों के उत्पाद चीनी प्रोडक्ट्स का मुकाबला नहीं कर पाते हैं और बाजार पर चीनी नियंत्रण फैल जाता है.

दूसरी तरफ, बीते एक दशक से चीन पर दुर्लभ खनिजों के निर्यात को रणनैतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने का आरोप भी लगता रहा है. कई अत्याधुनिक तकनीकों में यह धातुएं लगती हैं और इनकी करीब 90 फीसदी प्रोसेसिंग चीन करता है. चीन, अगर दूसरे देशों पर रेयर अर्थ निर्यात से जुड़ी पाबंदियां लगा दे, तो उनके कई सेक्टर प्रभावित होने लगते हैं. बीते बरसों में चीन, जापान, अमेरिका और यूरोपीय देशों पर ऐसी पाबंदियां लगा चुका है.

ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम में शामिल होगा जर्मनी?

टोक्यो में जर्मन चांसलर ने जापान और जर्मनी के बीच रक्षा सहयोग को बढ़ाने का एलान भी किया है. मैर्त्स ने कहा कि दोनों देश मिलकर एक लड़ाकू विमान विकसित करने पर विचार कर सकते हैं. फिलहाल, जापान, ब्रिटेन और इटली के साथ मिलकर 2035 तक अगली पीढ़ी का लड़ाकू विमान विकसित करने जा रहा है. तीनों देशों के इस अभियान को ग्लोबल कॉम्बैट एयर प्रोग्राम (जीकैप) नाम दिया गया है.

अक्टूबर अपने पहले बर्लिन दौरे पर आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री एंडी बर्नम कह चुके हैं कि, वो चाहेंगे कि जर्मनी भी इस प्रोग्राम में शामिल हो. टोक्यो में जापानी प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची और मैर्त्स की बातचीत के बाद इस बारे में ज्यादा जानकारी सामने आ सकेगी.

टोक्यो में जर्मन चांसलर के इस संबोधन का चीन ने भी जबाव दिया है. बुधवार को चीन के विदेश मंत्रालय ने कहा कि बीजिंग को उम्मीद है कि जर्मनी और यूरोपीय संघ "उद्देश्यपूर्ण व तार्किक" रहेंगे और कारोबार व सप्लाई चेन की स्थिरता बहाल करने के प्रति वचनबद्ध रहेंगे.

गुरुवार को मैर्त्स जापान से दक्षिण कोरिया रवाना होंगे. उनका पांच दिन का एशिया दौरा काफी हद तक बता देगा कि ये एशियाई देश और यूरोप कैसा साझा भविष्य देखने की तैयारी कर रहे हैं.


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