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क्या सऊदी अरब पर भारी पड़ रहे हैं हूथी?

आखिर सऊदी अरब अपने पड़ोसी देश यमन में हूथियों से पैदा हुए खतरे को कैसे कम कर सकता है या मदद के लिए किसके पास जा सकता है?

क्या सऊदी अरब पर भारी पड़ रहे हैं हूथी?
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आखिर सऊदी अरब अपने पड़ोसी देश यमन में मौजूद हूथियों से पैदा हुए खतरे को कैसे कम कर सकता है या मदद के लिए किसके पास जा सकता है? अमेरिका इसमें दिलचस्पी लेता नहीं दिख रहा और ना ही और कोई देश ईरान के साथ खुला टकराव चाहता है.

पिछले हफ्ते, सऊदी अरब में कुछ छात्रों से कहा गया कि वे घर पर ही रहें और ऑनलाइन क्लास अटेंड करें, क्योंकि पड़ोसी देश यमन में मौजूद हूथी ग्रुप से हमले का लगातार खतरा बना हुआ था. हालांकि, ठीक अगले ही दिन उन्हें जानकारी दी गई कि सब ठीक हो गया है. अब वे स्कूल जाकर पढ़ाई कर सकते हैं.

ऐसा लगता है कि सऊदी अरब और यमन के हूथी मिलिशिया के बीच संघर्ष अब सऊदी अरब में रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन गया है. कुछ समय की शांति के बाद, हूथियों ने जुलाई से सऊदी पर हमले बढ़ा दिए हैं और सीमा पार से कई मिसाइलें व ड्रोन दागे हैं.

पिछले कुछ हफ्तों में, हूथी गुट यमन में और आगे तक बढ़ गए हैं. उन्होंने यमन के तटीय इलाकों और लाल सागर के कई द्वीपों पर अपना कब्जा जमा लिया है. इसका सीधा मतलब यह है कि अब वे बाब अल-मंदेब स्ट्रेट से गुजरने वाले समुद्री जहाजों पर सीधी नजर रख सकते हैं. यही वह मुख्य रास्ता है जो लाल सागर को अदन की खाड़ी से जोड़ता है.

होर्मुज का बैकअप प्लान तैयार करने के लिए बेचैन खाड़ी देश

हूथी विद्रोहियों के नए हमलों से सऊदी अरब के ‘विजन 2030' प्रोजेक्ट पर खतरा मंडरा रहा है. सऊदी नेता क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान का यह महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट देश को तेल से होने वाली कमाई पर निर्भरता से बाहर निकालने के लिए शुरू किया गया था. ‘विजन 2030' को हकीकत बनाने के लिए सऊदी अरब को स्थिरता की जरूरत है, लेकिन अभी हालात इसके उलट होते दिख रहे हैं.

मार्कुस श्नाइडर, मिडल ईस्ट में फ्रीडरिष एबर्ट फाउंडेशन के ‘रीजनल पीस एंड सिक्योरिटी प्रोजेक्ट' के प्रमुख हैं. उन्होंने कहा, "यमन में बढ़ता तनाव सऊदी अरब को क्षेत्रीय युद्ध में खींच रहा है. जबकि, सऊदी अरब इस युद्ध से बचना चाहता था.”

दुनिया में ऊर्जा की आपूर्ति पर असर

सऊदी अरब का ऊर्जा ढांचा हूथी हमलों के प्रति बेहद संवेदनशील है. इन हमलों ने पहले ही लगभग 1,200 किलोमीटर लंबी ‘ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन' को बाधित कर दिया है. इस पाइपलाइन का इस्तेमाल तेल की ढुलाई के लिए तब किया जा रहा था जब अमेरिका, इस्राएल और ईरान के बीच लड़ाई के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे अन्य समुद्री रास्ते खतरनाक हो गए थे.

हूथी हमलों की वजह से पाइपलाइन बंद हो गई थी, हालांकि हफ्ते भर पहले की खबरों से लगता है कि इसे फिर से चालू कर दिया गया है. हूथियों की वजह से ही ‘बाब अल-मंदेब' स्ट्रेट, जिसे ‘गेट ऑफ टियर्स' भी कहते हैं उस पर भी दबाव बढ़ रहा है.

अमेरिकी थिंक टैंक ‘कार्नेगी एंडोमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस' के मिडल ईस्ट प्रोग्राम में नॉन-रेजिडेंट स्कॉलर एंड्रयू लेबर इसे "पाइपलाइन हमलों और लाल सागर पर कब्जे की दोहरी मार” कहते हैं. असल में, इससे सऊदी अरब को अपने तेल निर्यात करने के लिए एक बार फिर से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज का इस्तेमाल करने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है. जबकि, उस रास्ते पर अभी भी कई तरह की पाबंदियां लगी हुई हैं.

कौन करेगा सऊदी की मदद?

सऊदी अरब के सबसे बड़े मददगार अमेरिका से किसी बड़ी मदद की उम्मीद बहुत कम ही लग रही है. वॉशिंगटन ने कहा है कि वह खुफिया जानकारी और निगरानी के जरिए सऊदी अरब की मदद करेगा, लेकिन राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप हूथियों के खिलाफ सीधे सैन्य अभियान में शामिल होने से हिचकिचाते दिख रहे हैं.

अमेरिका के थिंक टैंक ‘सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक एंड इंटरनेशनल स्टडीज' (सीएसआईएस) का मानना है कि इसकी एक वजह यह भी हो सकती है कि वे ईरान के खिलाफ अपनी लगातार चल रही जंग और अभियानों से भारी दबाव झेल रहे हैं.

सीएसआईएस ने पिछले हफ्ते एक टिप्पणी में लिखा, "खबरों के अनुसार, अमेरिकी सेना को गंभीर चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है, जिसमें कुछ अत्याधुनिक इंटरसेप्टर मिसाइलों की कमी भी शामिल है.” ‘काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस' (सीएफआर) ने भी पैट्रियट और इंटरसेप्टर मिसाइलों के साथ-साथ क्रूज मिसाइलों के घटते स्टॉक के बारे में लिखा है.

इसीलिए, ईरान के साथ पहले से चल रही तनातनी के बीच यमन में एक और नया मोर्चा खोलना अमेरिका के लिए कोई अच्छी बात नहीं होगी.

वैसे भी, अमेरिकी हवाई हमलों से हूथी समस्या का समाधान होने की संभावना कम ही है. काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस (सीएफआर) का कहना है कि हूथी खतरे को खत्म करने के लिए एक बड़े और तालमेल वाले जमीनी ऑपरेशन की जरूरत है, खासकर अगर सेनाएं यमनी गुटों को उन इलाकों से पीछे धकेलना चाहती हैं जिन पर उन्होंने हाल ही में बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य के आसपास कब्जा किया है.

सऊदी अरब भी इसे लेकर बहुत उत्साहित नहीं है. अमेरिका और पड़ोसी संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) की मदद के बावजूद, 2015 और 2022 के बीच हूथियों के खिलाफ लड़ने वाला सऊदी गठबंधन कोई निर्णायक जीत हासिल करने में विफल रहा. इसने सऊदी सैन्य शक्ति की सीमाओं को भी उजागर किया.

दोनों के बीच सैन्य ताकत में साफ फर्क दिखता है. सऊदी अरब के पास आधुनिक हथियार हैं और वह अपनी सेना पर भारी रकम खर्च करता है. लेकिन हूथियों को कोई पारंपरिक युद्ध जीतने की जरूरत नहीं है. उनके लिए बुनियादी ढांचे को नुकसान पहुंचाने और समुद्री जहाजों की आवाजाही को बाधित करने के लिए मिसाइलों और ड्रोनों का इस्तेमाल करना ही काफी है.

श्नाइडर ने डीडब्ल्यू को बताया, "हूथी यमन में मजबूती से जमे हुए हैं और बड़े हमलों का सामना कर सकते हैं. दूसरी ओर, सऊदी अरब को अपने 2030 के आर्थिक विजन के लिए सबसे ज्यादा स्थिरता की जरूरत है. फिलहाल यह लक्ष्य पहले से कहीं ज्यादा दूर नजर आ रहा है.”

क्या यूरोप से मदद मिलेगी?

2024 की शुरुआत से, ‘ऑपरेशन एस्पाइड्स' के जरिए यूरोप लाल सागर में अंतरराष्ट्रीय शिपिंग की सुरक्षा कर रहा है. इटली ने हाल ही में कहा है कि वह अपनी नौसेना के साथ अपने व्यापारिक जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहता है. कुछ दिन पहले फ्रांस ने कहा कि वह ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के अंतिम छोर यानी लाल सागर स्थित यानबू बंदरगाह की सुरक्षा के लिए सऊदी अरब को सैनिक, रडार सिस्टम और एयर डिफेंस भेजेगा.

इसके बावजूद, यूरोपीय देशों के इन कदमों से यमन में कोई बड़ा रणनीतिक बदलाव आने की उम्मीद बहुत कम है. विशेषज्ञों का भी तर्क है कि यूरोप वहां लंबे समय तक चलने वाले युद्ध की राजनीतिक और सैन्य कीमत चुकाने को तैयार नहीं है.

ईरान और अमेरिका की रंजिश की कहानी

श्नाइडर ने बताया, "फ्रांस की ओर से ठोस सैन्य मदद करने की घोषणा का रियाद में बहुत गर्मजोशी से स्वागत किया गया है. फिर भी यह सवाल बना हुआ है कि क्या इससे सैन्य संतुलन में कोई बुनियादी बदलाव आ सकता है.”

पाकिस्तान और तुर्की के साथ हाल ही में हुए रक्षा समझौते ‘मक्का गठबंधन' की भी अपनी सीमाएं हैं. तीनों देशों के सैन्य नेताओं ने हाल ही में हुए हूथी हमलों पर आपस में विचार-विमर्श तो किया है, लेकिन तुर्की और पाकिस्तान भी ऐसे संघर्ष में घिसटने से कतरा रहे हैं जो उन्हें सीधे ईरान के आमने-सामने खड़ा कर दे.

कूटनीतिक कोशिशें कितनी सफल होंगी?

इसका मतलब है कि कूटनीतिक कोशिशें शायद फिर से ज्यादा अहम हो जाएंगी. डीडब्ल्यू को दिए एक पुराने इंटरव्यू में ‘सना सेंटर फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज' के अब्दुलगनी अल-इरियानी ने इस बात का जिक्र किया था कि हूथी असल में सऊदी अरब के साथ रिश्ते बेहतर करने या बनाए रखने में दिलचस्पी रखते हैं.

उन्होंने कहा, "यमन आर्थिक रूप से पूरी तरह सऊदी अरब पर निर्भर है. चाहे वह मानवीय सहायता हासिल करना हो या यमनी प्रवासियों के लिए काम-धंधे और नौकरियों के बाजार के तौर पर हो.”

पिछले कुछ सालों में सऊदी अरब ने कूटनीति के जरिए और आपस में बंटे यमन के सरकारी गुटों को एक साथ लाकर हूथियों का असर कम करने की काफी कोशिश की है. हालांकि, जिस तरह से हूथी विद्रोही लगातार आगे बढ़ रहे हैं, उससे सऊदी की इस रणनीति की सीमाएं साफ दिखाई देने लगी हैं.


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