अली लारीजानी, जो पर्दे के पीछे से चला रहे हैं ईरान की हुकूमत
अमेरिका और इस्राएल के हवाई हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और अन्य बड़े नेताओं के मारे जाने के बाद, अब अनुभवी नेता अली लारीजानी ही सारे बड़े फैसले ले रहे हैं

अमेरिका और इस्राएल के हवाई हमलों में ईरान के सुप्रीम लीडर खामेनेई और अन्य बड़े नेताओं के मारे जाने के बाद, अब अनुभवी नेता अली लारीजानी ही सारे बड़े फैसले ले रहे हैं.
अमेरिका-इस्राएल और ईरान के बीच छिड़ी इस जंग की शुरुआती कार्रवाई में तेहरान स्थित सुप्रीम लीडर के घर पर हवाई हमला किया गया. इस हमले में 86 वर्षीय अयातोल्लाह अली खामेनेई के साथ-साथ ईरान की सरकार और सेना चलाने वाले कई बड़े अधिकारी मारे गए.
खामेनेई की मौत के बाद अभी यह तय नहीं हुआ है कि देश का अगला नेता कौन होगा. हालांकि, फिलहाल सत्ता के इस खालीपन को देश के शीर्ष सुरक्षा अधिकारी अली लारीजानी भरते नजर आ रहे हैं. खबरों के मुताबिक, खामेनेई को सिर्फ लारीजानी जैसे कुछ ही लोगों पर भरोसा था कि वे उनकी मौत के बाद शासन को बचाए रख सकेंगे.
तेहरान पर हुए हमले के करीब 24 घंटे बाद, अली लारीजानी ने नेशनल टेलीविजन और सोशल मीडिया के जरिए अपनी बात रखी. उन्होंने अमेरिका और इस्राएल की कड़ी निंदा करते हुए कहा कि इन हमलों ने ‘ईरानी राष्ट्र के दिल में आग लगा दी है'. उन्होंने कहा, "हम उनके दिल को जला देंगे. हम इन जायोनी अपराधियों और बेशर्म अमेरिकियों को ऐसा सबक सिखाएंगे कि उन्हें अपने किए पर पछतावा होगा.”
लारीजानी का इस तरह के तीखे बयान देना कोई नई बात नहीं है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनकी पहचान एक व्यावहारिक और समझदार नेता की भी रही है. अपने दशकों लंबे राजनीतिक करियर में, उन्होंने खुद को सरकार के भीतर एक कठोर और ताकतवर नेता के रूप में स्थापित किया है. साथ ही, वे रूस, चीन और यहां तक कि अमेरिका के साथ बातचीत करने वाले एक कुशल वार्ताकार भी माने जाते हैं.
हालांकि, अमेरिका और ईरान के बीच जारी सीधी जंग के बीच, 67 वर्षीय लारीजानी ने राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप के उस दावे को दोटूक अंदाज में खारिज कर दिया है जिसमें ट्रंप ने कहा था कि ईरानी नेता ‘बातचीत करना चाहते हैं'. ट्रंप ने रविवार को ‘द अटलांटिक' मैगजीन को दिए इंटरव्यू में यह दावा किया था. इसके जवाब में लारीजानी ने ‘एक्स' पर लिखा, "हम अमेरिका के साथ कोई समझौता नहीं करेंगे”.
रसूखदार खानदान से आते हैं लारीजानी
ईरान की सत्ता में सबसे ऊपर लारीजानी का आना थोड़ा हैरान करने वाला है, क्योंकि उनके पास औपचारिक रूप से अली खामेनेई का उत्तराधिकारी बनने का कोई मौका नहीं है. इसका कारण यह है कि खामेनेई और उनसे पहले के रुहोल्लाह खौमेनी, दोनों शिया इस्लाम के बड़े धर्मगुरु थे, जिन्हें 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद बनी इस धार्मिक व्यवस्था का सर्वोच्च नेता चुना गया था.
इराक में जन्मे अली लारीजानी खुद कोई धर्मगुरु नहीं हैं, लेकिन वे एक ऐसे परिवार का हिस्सा हैं जिसके रिश्ते ईरान की धार्मिक और राजनीतिक सत्ता में बहुत गहरे हैं. एक समय ‘टाइम' मैगजीन ने उनके परिवार को ‘ईरान का केनेडी परिवार' बताया था.
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लारीजानी के पिता एक ‘ग्रैंड अयातोल्लाह' यानी बहुत बड़े धर्मगुरु थे. उनके भाई सादिक अर्देशिर लारीजानी ने भी अयातोल्लाह का पद हासिल किया और 2009 से 2019 के बीच ईरान की न्यायपालिका की कमान संभाली. एक और भाई, मोहम्मद-जवाद लारीजानी, विदेश नीति के बड़े विशेषज्ञ हैं और दिवंगत खामेनेई के सलाहकार रहे हैं. खामेनेई की मौत से पहले ही यह चर्चा हो रही थी कि लारीजानी परिवार अपने ही किसी सदस्य को अगला सर्वोच्च नेता बनाने की बिसात बिछा रहा है.
अली लारीजानी के ससुर, दिवंगत मोर्तेजा मोताहारी भी रुहोल्लाह खौमेनी के बहुत करीबी दोस्त थे और 1979 की क्रांति के दौरान उनके मुख्य सहयोगी रहे थे. भले ही लारीजानी का परिवार प्रभावशाली है, लेकिन उन्होंने अपनी असली ताकत ईरान की राजनीतिक प्रणाली के जरिए हासिल की है. वे दशकों तक देश के महत्वपूर्ण पदों पर रहे हैं और सिस्टम के भीतर अपनी जगह पक्की की है.
1958 में जन्मे लारीजानी 1981 में इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (आईआरजीसी) में शामिल हुए और ईरान-इराक युद्ध के शुरुआती सालों में कमांडर के तौर पर काम किया. उन्होंने धार्मिक शिक्षा भी ली, लेकिन फिर कंप्यूटर साइंस और गणित में डिग्री हासिल की. इसके बाद, उन्होंने तेहरान यूनिवर्सिटी से वेस्टर्न फिलॉसफी में मास्टर और पीएचडी की डिग्री ली. 1995 में उनकी पीएचडी का मुख्य विषय मशहूर जर्मन दार्शनिक इमानुएल कांट पर था.
अहमदीनेजाद से पिछड़ गए
जब लारीजानी दर्शनशास्त्र की पढ़ाई कर रहे थे, उसी दौरान उन्होंने अपने सैन्य अनुभव और पारिवारिक संबंधों का इस्तेमाल अपना राजनीतिक करियर बनाने के लिए किया. नतीजा यह रहा कि महज 35-36 साल की उम्र में वे ईरान के संस्कृति मंत्री बन गए.
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1994 में अयातोल्लाह खामेनेई ने अली लारीजानी को ईरान के सरकारी मीडिया का प्रमुख नियुक्त किया, जहां वे अगले 10 साल तक रहे. लारीजानी ने इस संस्था का इस्तेमाल सरकारी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए किया. उनके दौर में ‘होवियत' (पहचान) जैसे कार्यक्रम प्रसारित किए गए, जिनमें शासन के खिलाफ बोलने वाले विचारकों और बुद्धिजीवियों को ‘पश्चिम से फंड लेने वाले गद्दार' के रूप में पेश किया गया.
लारीजानी ने पहली बार 2005 में राष्ट्रपति बनने की कोशिश की थी, लेकिन पहले दौर में उन्हें 6 फीसदी से भी कम वोट मिले. वे कभी दूसरे दौर तक नहीं पहुंच पाए और अंत में चुनाव कट्टरपंथी नेता महमूद अहमदीनेजाद ने जीत लिया.
चुनाव हारने के बाद, लारीजानी ईरान की सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल (एसएनएससी) के सेक्रेटरी-जनरल और देश के मुख्य परमाणु वार्ताकार बने. हालांकि, राष्ट्रपति अहमदीनेजाद के साथ मतभेदों के चलते उन्होंने 2007 में इस पद से इस्तीफा दे दिया.
ईरान के साझेदारों और दुश्मनों का सामना
कट्टरपंथियों से लगातार हो रहे टकराव के बावजूद, अली लारीजानी ने 2008 में पार्लियामेंट्री स्पीकर का पद हासिल किया और लगातार 12 वर्षों तक इस पर काबिज रहे. उनके कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि 2015 का परमाणु समझौता (जेसीपीओए) था. इस समझौते को कानूनी मंजूरी दिलाने में उन्होंने बड़ी भूमिका निभाई थी. यह समझौता ईरान और दुनिया की छह बड़ी शक्तियों (अमेरिका, चीन, रूस, जर्मनी, ब्रिटेन और फ्रांस) के बीच हुआ था. इसका मकसद ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाना था, जिसके बदले में ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील दी जानी थी.
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2018 में डॉनल्ड ट्रंप ने अपने पहले कार्यकाल के दौरान परमाणु समझौते को पूरी तरह खत्म कर दिया था. इसके बाद, 2020 में लारीजानी को चीन के साथ एक रणनीतिक ‘25-वर्षीय सहयोग समझौते' की जिम्मेदारी सौंपी गई, जिसे अगले ही साल अंतिम रूप दे दिया गया.
2021 और 2024 के चुनाव लड़ने पर प्रतिबंध
लारीजानी ने चीन के साथ 400 अरब डॉलर के 25 वर्षीय निवेश समझौते को अपनी सबसे बड़ी कामयाबी के रूप में पेश किया. इस समझौते का मकसद ईरान के ऊर्जा क्षेत्र में चीनी निवेश लाना था. इसी सफलता के दम पर उन्होंने खुद को ईरान की डूबती अर्थव्यवस्था के तारणहार के रूप में पेश किया. उन्होंने 2021 में फिर से राष्ट्रपति का चुनाव लड़ने की कोशिश की.
हैरान करने वाले एक फैसले में, ईरान की ‘गार्जियन काउंसिल' ने लारीजानी के राष्ट्रपति चुनाव लड़ने पर पाबंदी लगा दी. इस काउंसिल में अयातोल्लाह द्वारा नियुक्त छह धर्मगुरु और संसद द्वारा स्वीकृत छह वकील शामिल होते हैं. काउंसिल ने इस रोक की कोई आधिकारिक वजह तो नहीं बताई, लेकिन चर्चा है कि लारीजानी की बेटी का अमेरिका में रहना और उनके पास ब्रिटिश पासपोर्ट होना इसका कारण बना. वहीं कुछ जानकारों का मानना है कि यह सब सरकार के पसंदीदा उम्मीदवार इब्राहिम रईसी की जीत का रास्ता साफ करने के लिए किया गया था.
अयातोल्लाह सादिक लारीजानी ने सार्वजनिक रूप से विरोध जताते हुए कहा कि उनके भाई (अली लारीजानी) को ‘खुफिया विभाग की गलत जानकारी' के आधार पर चुनाव के लिए अयोग्य ठहराया गया है. उन्होंने आरोप लगाया कि गार्जियन काउंसिल के भीतर जानबूझकर ‘झूठ' फैलाया गया, ताकि उनके भाई की छवि को नुकसान पहुंचाया जा सके और उन्हें दौड़ से बाहर किया जा सके.
ईरानी मामलों के विश्लेषक अली अफशार ने उस समय डीडब्ल्यू को बताया था कि लारीजानी को अयोग्य ठहराने की मुख्य वजह उनका बागी तेवर था. उन्होंने न केवल इब्राहिम रईसी बल्कि ‘रिवोल्यूशनरी गार्ड्स' के सदस्यों की भी खुलकर आलोचना की थी. इसके अलावा, सत्ता उनसे इसलिए भी नाराज थी क्योंकि उन्होंने विपक्षी नेताओं मेहदी करौबी और मीर हुसैन मौसवी पर कभी निशाना नहीं साधा, जिन्हें 2010 से घर में नजरबंद रखा गया था.
इब्राहिम रईसी आगे चलकर देश के राष्ट्रपति बने, लेकिन 2024 में एक हेलिकॉप्टर दुर्घटना में उनकी मौत हो गई. अली लारीजानी ने एक बार फिर राष्ट्रपति पद के लिए अपनी किस्मत आजमाई, लेकिन उन्हें फिर से चुनाव लड़ने से रोक दिया गया. हालांकि, उनके बाहर होने के बावजूद चुनाव का नतीजा चौंकाने वाला रहा और उदारवादी नेता मसूद पेजेश्कियन ने जीत हासिल की.
मॉस्को में खामेनेई का आदमी
पिछले साल की गर्मियों में राष्ट्रपति पेजेश्कियन ने लारीजानी को उनके पुराने पद ‘सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल' के प्रमुख के रूप में फिर से नियुक्त किया था. इस्राएल के साथ हुए 12-दिवसीय युद्ध के बाद लारीजानी को देश का सबसे बड़ा सुरक्षा अधिकारी बनाया गया. हालांकि, हाल के महीनों में लारीजानी का दबदबा इतना बढ़ गया है कि वे राष्ट्रपति पेजेश्कियन से कहीं अधिक ताकतवर दिखने लगे हैं. अयातोल्लाह खामेनेई तक उनकी सीधी पहुंच ने पेजेश्कियन के प्रभाव को धुंधला कर दिया है.
अली लारीजानी को पर्दे के पीछे की वह असली ताकत माना जाता है जो अमेरिका और ईरान के बीच फिर से शुरू हुई परमाणु बातचीत को आगे बढ़ा रहे थे. इसके अलावा, उन्होंने कई बार मॉस्को की यात्रा की, जहां व्लादिमीर पुतिन के सामने खामेनेई के विशेष दूत के रूप में अपनी भूमिका निभाई. माना जाता है कि इसमें उन्हें रूस में ईरान के राजदूत काजेम जलाली की पूरी मदद मिली, जो लारीजानी के बेहद करीबी और भरोसेमंद साथी हैं.
अमेरिकी और इस्राएली हमलों से कुछ ही दिन पहले अल जजीरा से बात करते हुए लारीजानी ने कहा था कि ईरान ने पिछले कुछ महीनों का इस्तेमाल युद्ध के लिए पूरी तरह "तैयार” होने में किया है. उन्होंने कहा, "हमने अपनी कमजोरियों की पहचान की और उन्हें ठीक किया. हम युद्ध नहीं चाहते और हम युद्ध शुरू नहीं करेंगे, लेकिन अगर वे हम पर जबरदस्ती करेंगे, तो हम जवाब देंगे.”


